खेलिये और स्वस्थ रहिये…जीवन भी एक खेल है

खेलिये और स्वस्थ रहिये…जीवन भी एक खेल है

11 मनुष्य में खेलों से उदात्त भावनाओं का जन्म होता है जिससे वह जीवन संग्राम में सफलता प्राप्त करता हुआ जीवन के वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करता है। जीवन भी एक खेल है। जय और पराजय झेलने के गुण का श्रेय भी खेलों को दिया जाता है।
स्वस्थ मस्तिष्क सदैव स्वस्थ शरीर में ही रहता है। स्वास्थ्य की श्रेष्ठता के लिये खेलना बहुत आवश्यक है। खेलने से शरीर के अंग प्रत्यंग पुष्ट होते हैं एवं शरीर में स्फूर्ति आती है। खेलने से शरीर के रूधिर का प्रवाह तीव्र होता है जिसने शरीर के अन्दर के दूषित पदार्थ पसीने आदि के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।
लम्बी और बड़ी बड़ी सांस लेने से शुद्ध वायु शरीर के अन्दर पहुंच कर फेफड़ों को मजबूत बनाती है। जिस प्रकार उपयोगी दूध को कागज की थैली में रखा जाये तो वही दूध उसे गला कर बाहर जायेगा, उसी प्रकार यदि व्यक्ति शारीरिक रूप से कागज की थैली है तो उसके सभी अन्य गुण व्यर्थ हैं। खेलों का एक महत्त्वपूर्ण लाभ है कि विद्यार्थियों के हृदय में परस्पर वैमनस्य के स्थान पर प्रेम, भेद के स्थान पर अभेदता, अनेकता के स्थान पर एकता, विषमता के स्थान पर समता की पुनीत भावनाओं का जन्म होता है। देखा जाता है कि खिलाड़ी अपने कैप्टन की आज्ञाओं का अक्षरश: पालन करते हैं, उसके संकेत पर चलते हैं। खिलाड़ी को खेल के मैदान में केवल अपना खेल और उसको प्राप्त करने का लक्ष्य एवं अपने प्रमुख की आशा प्रमुख रहती है।
आदर अनादर, मान अपमान की परिधि से ऊपर उठा हुआ जब वह खेल के मैदान में उतरता है तब विपक्ष के लोग उसके ध्यान को हटाने के लिए उसकी हूटिंग करते हैं, सीटी बजाते हैं एवं अपमानजनक बातें कहते हैं परन्तु खिलाड़ी अपनी एकाग्रता, ध्यान और सहनशीलता से विजय प्राप्त करता है।
पौष्टिक भोजन बनाता है जवान और सुंदर..सेहत और सुन्दरता का चोली दामन का साथ है
यह अखण्ड सिद्धांत अपने आम में सत्य है कि हर अच्छाई अपने साथ बुराई को लेकर उसी प्रकार चलती है जैसे व्यक्ति के साथ उसकी परछाई। उसी प्रकार खेलों से कुछ हानियां भी हैं। जब खिलाड़ी उच्चकोटि के खिलाडिय़ों में आ जाता है तो वह खेलों को जीविकोपार्जन का साधन बना लेता है। अपनी कला का चन्द चांदी के टुकड़ों हेतु प्रदर्शन करता है। जब वस्तु स्वत: सुखाय होती है तब उसमें आनन्द आता है। जब वह पर सुखाय होती है तब न आनन्द आता है और न ही मान।
किसी ने कहा है ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’। प्राय: ऐसा देखा जाता है कि बहुत से छात्र खेलों पर इतना अधिक ध्यान देते हैं कि अपनी भावी मधुर आशाओं को निराशा में बदल लेते हैं।
और कभी कभी खिलाड़ी अपनी दलगत भावना से वातावरण को दूषित कर देते हैं और गलत बात को लेकर दंगे करते हैं जो नितान्त अवांछनीय है। हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए दैनिक क्रीड़ा परम आवश्यक है परन्तु जिस प्रकार हम भोजन में संतुलन का ख्याल रखते हैं वही ध्यान यहां भी रखना चाहिये। बिना खेल के सुन्दर और स्वस्थ शरीर नहीं हो सकता और बिना स्वस्थ शरीर के खेला नहीं जा सकता।
– विजय कुमार शर्मा
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