‘खादी’ को गांधी और मोदी नहीं….बाजार चाहिए : प्रभुनाथ शुक्ल

‘खादी’ को गांधी और मोदी नहीं….बाजार चाहिए : प्रभुनाथ शुक्ल

खादी ग्रामाद्योग के कैलेंडर पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर पर बेवजह बावेला मचा है। यह सिर्फ प्रचार और व्यक्तिवादी राजनीति को बढ़ावे के अलावा कुछ नहीं है। जमीनी सच्चाई यही है की राजनीति वैचारिक रूप से अक्षम और विकलांग हो चुकी है। उसमें वैचारिक शून्यता हो चली है। उसकी नीति और नीयति बदल गई है। वह केवल पब्लिक स्टंट और मदारीवाली बात कर भीड़ जुटाना चाहती है। जहां बहस होनी चाहिए वहां राजनीति मौन धारण कर लेती है, जहां आवश्यकता नहीं है वहां विवाद खड़ा किया जाता है। राष्टपिता महात्मा गांधी सिर्फ एक व्यक्तित्व या मूर्तिपरक आस्था का केंद्र नहीं हैं। गांधी पर विवाद खड़ा करने वालों को इस पर विचार करना चाहिए। गांधी और उनकी खादी एक विचाराधारा हैं। उन्हें सिर्फ कैलेंडर और डायरी के दायरे में रख कर हम इंसाफ नहीं कर सकते हैं। आधुनिक भारतीय राजनीति में गांधी नाम केवल प्रतीक बन गया है। हम गांधी को लेकर अगर इतने चिंतित हैं तो उसके लिए हमने क्या किया। स्वाधीन भारत के इतिहास में गांधी एक विचारधारा और आंदोलन के रुप में आए। उन्होंने देश को आजादी दिलाने में हिंसा का रास्ता नहीं चुना।
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 अहिंसा के माध्यम से गांधी ने वैचारिक आंदोलन खड़ा किया। उस विचारधारा का फैलाव भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका और यूरोप तक हुआ। उन्होंने नशा मुक्ति के साथ कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए क्या नहीं किया। भारत की ग्रामीण आबादी को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए नारा दिया- खादी एक वस्त्र नहीं विचार है। यहीं कारण रहा कि वे खुद के चरखे से काते गए सूत और उससे बुने कपड़े का ही उपयोग करते थे। चरखा एक प्रतीक नहीं एक स्वावलंबी भारत की विचारधारा रहा। उन्होंने देश को बदलने के लिए सिर्फ नारों का सहारा नहीं लिया। इसके लिए खुद आगे आए और उसे अपनाया। मैला ढोने की प्रथा को वे खुद कलंक मानते थे ,जिसका उन्होंने जमकर विरोध किया। नशा मुक्ति के खिलाफ वैचारिक विचाराधारा को बढ़ावा दिया। स्वदेशी खादी को बढ़ावा देने के लिए विदेशी कपड़ों की होली जलवाई। इस तरह कैलेंडर में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चरखा चलाते तस्वीर प्रकाशित की गयी है तो कोई बुरी बात नहीं है। खादी एवं वस्त्र मंत्रालय मानता है कि मोदी जाकेट की वजह से खादी की सेल में 14 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। मोदी विरोधियों को यह बात कैसे पचती कि जो व्यक्ति दस लाख का सूट पहनता है वह सूटबूट वाले प्रधानमंत्री हैं, फिर गांधी का चरखा और उनकी खादी से भला क्या वास्ता। खैर राजनीति का अपना तर्क भी जायज है। फिर भी तस्वीर प्रकाशित करने भर से गांधी और उनकी विचाराधारा का नाम खत्म नहीं किया जा सकता है। गांधी बनाम मोदी का द्वंद्व बेमतलब है। दोनों की विचारधाराएं अलग हैं। एक विचारधारा डिजिटल इंडिया, प्लास्टिक मनी और कैशलेस की बात करती है।
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दूसरी तरफ गांधी खादी, चरखा और कुटीर उद्योग, गांव, गरीब और किसान की बात करते थे। फिर दोनों में बड़ा फासला है। इसकी वजह भी बदली हुई परिस्थितियां हैं। इस पर राजनीतिक बखेड़ा नहीं किया जाना चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या पीएम मोदी ने कभी यह कहा होगा कि कैलेंडर से गांधी बाबा की तस्वीर हटाकर मेरी यानी मोदी की लगा दी जाय। खादी के कैलेंड पर ही सवाल क्यों उठ रहे हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय के कैलेंडर में तो बारहों पेज पर ‘परिधानमंत्री’ की तस्वीर लगी होने की बात है। सवाल गांधी की बुतपरस्ती का नहीं है। मोदी की तस्वीर पर सवाल उठाने वाले लोगों से हम यह पूछते हैं कि आप गांधी की विचारधारा को कितना अपनाते हैं। पुण्य तिथियों पर केवल पुष्प अर्पित करने के बाद क्या गांधी और उनकी विचाराधरा को याद किया जाता है। उस पर कभी बहस की जाती है या सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए गांधी का उपयोग किया जाता है। समय के साथ दुनिया बदल रही है। हम किसी विचारधारा के साथ नहीं चिपके रह सकते हैं। यह जरूर है कि उसे बदलाव के साथ अपना कर चल सकते हैं। गांधी ने सिर्फ चरखे के बल पर मैनचेस्टर की सूती कपड़े की मिलों को हिला दिया था। क्या वह कूबत हमारे पास है। गांधी पर हरियाणा सरकार के स्वास्थ्यमंत्री अनिल विज ने जिस तरह बचकाना बयान दिया वह बेहद शर्मनाक और चिंतनीय है। यह मोदी भक्ति भी नहीं कहीं जा सकती है, केवल मीडिया की सूर्खियां बटोरने के लिए यह सब किया गया। गांधी की विचाराधरा में विज कहीं टिकते ही नहीं हैं। इसके पहले अवाम के कितने लोग जानते थे कि अनिज विज कौन हैं। उधर,गांधी को तो बच्चा-बच्चा जातना है।
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उन्होंने यहां तक बयान दे डाला कि भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन गांधी की तस्वीर लगी होने से हुआ। खादी की स्थिति के लिए गांधी को जिम्मेदार बता रहे हैं। अब उन्हें कौन बताए, इस बड़बोली राजनीति का मकशद क्या है। यह मोदी भक्ति है या प्राचार पाने का नजरिया और जरिया। आज चरखा, खादी और गांधी जी को छोडि़ए, सूत्री वस्त्र उद्योग और खादी की क्या दुर्गति है, किसी से छुपा नहीं है। खादी सरकार की कृपा कर जीवित है। उसे मोटी सब्सिडी उपलब्ध करायी जाती है। इसलिए मोदी और सरकार की भक्ति तो खादी विभाग को करनी ही है। इसके पहले भी इस तरह की कोशिश की गयी थी। यहां सवाल है कि हम खादी को ब्रांड बना कर क्या आम भारतीय की बात कर सकते हैं। आज भारत में रहने वाले आम आदमी की क्रय क्षमता में खादी कितनी करीब है, इस पर भी विचार करना होगा। देश में आजादी के बाद स्थापित खादी संस्थाएं दमतोड़ चुकी हैं। वहां काम करने वाले लोग बेहाल हैं। सरकार और विभाग को उनकी भी चिंता करनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने कभी खुद कहा था कि खादी का एक वस्त्र हमें जरूर अपनाना चाहिए लेकिन क्या आज वह स्थिति है। यह बात दीगर है कि मोदी जैकेट युवाओं का ब्रांड बन गया है। इससे खादी की मांग उठी है लेकिन यह आम लोगों तक कब पहुंचेगी, इस पर भी विचार करना होगा। कुछ संस्थाओं ने बाजार पर पकड़ बनाने के लिए खादी को ब्रांड के रूप में लांच किया, लेकिन सरकारी स्तर पर इसका विकास नहीं हुआ। इसके लिए केवल मोदी सरकार नहीं, पूर्व की कांग्रेस सरकार सबसे अधिक जवाबदेह और जिम्मेदार रही है। यह विवाद खत्म होना चाहिए। तभी हम खादी और गांधी की विचारधारा का मूल्य समझ सकते हैं। गांधी और मोदी के तस्वीर विवाद के बजाय हमें खादी की तस्वीर सुधारने का प्रयास करना चाहिए, जिससे खादी आधुनिक भारत की एक विचारधारा बन जाए।

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