क्यों डरते हो…

क्यों डरते हो…

1 जब इरादे बुलंद हों और तैयारी अच्छी होती है तो खिलाड़ी को सबकुछ सकारात्मक या फिर यों कहें कि अपने ही पक्ष में दिखता है। उसे लगता है कि उससे अच्छा न तो कोई खिलाड़ी है और न ही किसी खिलाड़ी ने उसके जितनी या उससे ज्यादा तैयारी ही कर रखी है।
कुछ ऐसे ही इरादे लेकर वह किसी भी प्रतियोगिता में शिरकत करता है परन्तु जैसे ही वह प्रतियोगिता स्थल में पहुंचता है और उसे लगने लगता है कि दूसरी टीम या फिर उसका कोई खिलाड़ी ज्यादा अच्छ खेल रहा है तो उसका आत्मविश्वास खुद-ब-खुद ही डग मगाने लगता है। ऐसे में उसका संयम टूटने लगता है। फलत: वह दूसरे रास्ते अपनाने लगता है। उसका मानसिक संतुलन छिन्न-भिन्न होकर बिखरने लगता है। उसने जितनी भी तैयारी की होती है, वह भी बिखरने लगती है। ऐसी स्थिति में जब खिलाड़ी मैदान में उतरता है तो वह अजीब सी हरकतें करने लगता है। ऐसा लगता है जैसे कि वह पहली बार उस खेल को खेल रहा है या फिर उसकी तैयारी बिलकुल ही नहीं है। वह दूसरी टीमों के बीच जाकर या तो उनके खिलाडिय़ों को तोडऩे की कोशिश करता है या फिर अपनी कामयाबी के झूठे पुलिंदे खोलने का प्रयास करता ही रहता है। इस प्रकार की हरकतें स्पष्ट कर देती हैं कि या तो वह खिलाड़ी अधूरा है या फिर उसकी तैयारी कम हुई है। ऐसी स्थिति में उसका धैर्य बड़ी ही आसानी से टूट जाता है। उसका अपने पर से ही विश्वास उठने लगता है। उसने खेल को जितना भी सीखा होता है वह भी न के बराबर हो जाता है। उसे हाथ-पैरों में भी स्वत: ही कंपन होने लगता है जो उसकी आवाज या उसके कृत्यों से स्पष्ट झलकने लगता है जबकि ऐसी स्थिति का पूर्ण फायदा उठाता है उसके विपक्ष में खेलने वाली टीम का शातिर खिलाड़ी अर्थात वह अपने ही द्वारा बुने गए जाल में खुद व खुद फंसता जाता है और इसका उसे जरा भी अहसास नहीं होता। यह स्थिति केवल खेल जगत या खिलाड़ी के साथ ही नहीं होती है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में आती है। ऐसी परिस्थितियों में खिलाड़ी को चाहिए कि वह केवल अपने अभ्यास क्षेत्र-सत्र और काबिलियत पर विश्वास रखें। इनके अलावा उसे कुछ और सोचना ही नहीं है। यदि अपनी प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाडिय़ों के साथ बात भी करनी है तो वे बातें केवल खेल के तकनीकी पहलुओं पर या फिर खेल से हटकर हों। इससे उसका चित शांत रहेगा और उसका आत्मविश्वास भी बरकरार रहेगा। उसे किसी भी प्रकार की कठिनाई नहीं आयेगी और न ही उसके शरीर में किसी भी प्रकार के संवेग उत्पन्न होंगे जो कि उसके खेल को नकारात्मकता की तरफ प्रभावित कर सकें।
नकारात्मक या फिर उत्तेजक बातें यदि खिलाड़ी मैच से ही पहले करता है तो उसके अपने ही स्वभाव और खेल-भावना में अंतर आने लगता है जिसका सीधा प्रभाव उसके खेल पर पड़ता है और वह मैदान में स्पष्ट रूप से दिख जाता है इसलिए तैयारी अच्छी करके स्वयं पर और अपने साथी खिलाड़ी पर पूरा भरोसा रख कर मैदान में उतरना चाहिए।
– नरेश सिंह नयाल ‘राज’ add-royal-copy

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