क्या घटती तेल कीमतों का युग खत्म हो गया…?

क्या घटती तेल कीमतों का युग खत्म हो गया…?

 ओपेक देशों और रूस के तेल उत्पादन सीमित करने को तैयार होने और अन्य वैश्विक कारणों से क्रूड की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। साल 2०16 में क्रूड का भाव अगस्त में 39 डॉलर प्रति बैरल था जो बढ़ कर अक्टूबर में 52 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। रॉकेट की स्पीड से बढ़ी इन कीमतों का असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी हुआ।
कच्चे तेल का निर्यात करने वाले देशों के प्रमुख संगठन ओपेक ने वर्ष 2008 के बाद पहली बार तेल उत्पादन में कटौती करने का फैसला किया है। उसके इस फैसले पर रूस ने भी सहमति जताई है जो खुद तेल और गैस का बहुत बड़ा निर्यातक है।
इस फैसले के बाद कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ गया है। अभी ये 50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही हैं लेकिन आने वाले दिनों में 60 डॉलर के पार जा सकती हैं। पिछले कई वर्षों से मोटे तौर पर कहें तो केंद्र में एनडीए सरकार बनने के थोड़े समय बाद से ही तेल की कीमतें जमीन छूने लगी थीं। पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन के दाम आगे और बढ़ सकते हैं। इसके बाद परिवहन लागत में इजाफा होने की वजह से दूसरी चीजें भी महंगी हो सकती हैं।
भारत कुल खपत का करीब 80 फीसदी तेल आयात करता है। ऐसे में यदि क्रूड की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाती है तो पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों पर सीधा असर होगा। दरअसल, बीते दो सालों में कमजोर मानसून के बावजूद हमारी अर्थ व्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर रही थी तो इसमें क्रूड की कम वैश्विक कीमतें बड़ा कारण रही थीं। ऐसे में दाम बढऩे से पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2015-16 में भारत ने कुल 20.21 करोड़ टन क्रूड आयात किया था जिसके लिए कुल 4,18,931 करोड़ रूपए चुकाने पड़े थे। यह तब की स्थिति है जब क्रूड के दाम काफी कम थे। यूं कहें कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक अरसे से 30-40 डॉलर प्रति बैरल कीमत वाले तेल पर चलने की आदी हो चुकी है। ऐसे में ईंधन की लागत बढ़ कर लगभग दोगुनी हो जाना एक आम भारतीय के लिए बुरी खबर है। पिछले लगभग 3 सालों से कच्चे तेल की लगातार घटती कीमतों के कारण पेट्रोलियम उत्पादों के भारत समेत अन्य तेल उपभोक्ता देशों को भारी फायदा हुआ। घटती तेल कीमतों के चलते भारत का तेल आयात का बिल 2012-13 में 164 अरब डॉलर से घटता हुआ 2015-16 में मात्रा 83 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
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इससे हमारा व्यापार घाटा वर्ष 2012-13 में 190 अरब डॉलर से घटता हुआ 2015-16 में 118 अरब डॉलर रह गया। तेल कीमतें घटती नहीं तो यह संभव नहीं होता। इससे सरकारी खजाने को तो फायदा पहुंचा पर तेल पर कर वृद्धि से पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचा। राजस्व बढऩे से सरकार को राजकोषीय अनुशासन लाने में सुविधा हो गई और 2015-16 तक आते-आते हमारा राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.9 प्रतिशत तक पहुंच गया। हमारी विकास दर भी बेहतर हुई और मुद्रास्फीति भी घटी।
7 दिसंबर को तय हुई मौद्रिक नीति में ब्याज दरें घटाए जाने की संभावना को भी धक्का लग गया। इसका दूसरा नुकसान भारतीय अर्थव्यवस्था को पूंजी के मोर्चे पर होने वाला है। हाल तक ग्लोबल निवेशकों के पास कुछ गिने-चुने विकासशील देशों में अपना पैसा लगाने के अलावा कोई चारा नहीं था। तेल महंगा होने से उनके लिए निवेश का एक और दरवाजा खुल गया है।
ध्यान रहे, विकसित देशों के अमीर लोग और निवेशक संस्थान अपनी पूंजी कच्चे तेल, बहुमूल्य धातुओं और अमेरिकी बॉन्डों में लगाना सबसे ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि यहां उनका पैसा सुरक्षित रहता है। विकासशील देशों में उनकी पूंजी पर मुनाफा ज्यादा मिलता है लेकिन यहां पैसा डूबने का खतरा भी कम नहीं होता।
उल्लेखनीय है कि अमेरिका में शेल ऑयल के रूप में कच्चे तेल की बड़ी आवक शुरू हो जाने से दुनिया में अब तेल की स्थायी कमी जैसा कोई मामला नहीं रह गया है यानी ओपेक द्वारा तेल उत्पादन में कटौती से कच्चा तेल महंगा हो कर भले ही 60 डॉलर के पार चला जाए लेकिन वर्ष 2007-2008 की तरह इसके 140 डॉलर प्रति बैरल जैसे आसमानी स्तर तक पहुंच जाने की आशंका दूर-दूर तक नहीं है।
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इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ईंधन के मोर्चे पर कुछ समय के लिए परेशानी जरूर आएगी लेकिन फिर थोड़ी मद्धम हो कर यह 60 डॉलर प्रति बैरल वाले कच्चे तेल की भी आदत डाल लेगी। हां, यह जरूर कहना होगा कि नोटबंदी के चलते इस वित्त वर्ष में जीडीपी के अनुमान से आधा फीसदी कम रह जाने की जो बात ग्लोबल रेटिंग एजेंसियों द्वारा कही जा रही है, उसमें महंगे ईंधन और मजबूत अमेरिकी बॉन्डों के असर में थोड़ी और कमी आ सकती है।
हालांकि इस पर असमंजस बना हुआ है कि क्या घटती तेल कीमतों का युग समाप्त हो गया और भविष्य में तेल कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं? वैश्विक स्तर पर ऐसा लगने लगा है कि शायद तेल कीमतें दोबारा बढऩे लगेंगी लेकिन बाजार की खबरें इस सोच को पुष्ट नहीं करती। माना जा रहा है कि एक ओर ओपेक व गैर ओपेक तेल उत्पादक देश उत्पादन घटा कर कीमत बढ़ाने की इच्छा रखते हैं लेकिन दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ दूसरी शक्तियां तेल कीमतों को बढऩे नहीं देना चाहतीं।
अमरीका की एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन(ईआईए) का मानना है कि अगले साल भी तेल कीमतें 50 डॉलर प्रति बैरल से नीचे ही रहेंगी। ओपेक देश तेल उत्पादन घटाएंगे जरूर पर पूर्ति के आधिक्य के चलते कीमतें बढ़ेंगी नहीं। ईआईए का मानना है कि अमरीकी तेल कंपनियों के साथ गैर ओपेक देशों में भी उत्पादन बढ़ेगा जिसके चलते ओपेक देशों द्वारा तेल की आपूर्ति घटने का प्रभाव कीमतों पर नहीं पड़ेगा। फिलहाल यह तो भविष्य में ही पता चलेगा कि तेल की कीमतें घटेंगी या बढ़ेंगी?
– नरेंद्र देवांगन

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