क्या आप खाली समय में अपनों को बोर करते हैं..?

क्या आप खाली समय में अपनों को बोर करते हैं..?

 अक्सर कभी देखा या किया भी होगा कि जब हमारा खाली समय रहता या कोई काम नहीं होता तो हम अचानक बिना बताये किसी भी मित्र या रिश्तेदार के यहां पहुंच जाते हैं, बिना कोई सूचना दिए और फिर हम यह भी नहीं सोचते कि जिस मित्र या रिश्तेदार के यहां हम गए, वो फ्री हैं या व्यस्त हैं। यदि वो हमें समय नहीं देता तो हम नाराज हो जाते हैं। अक्सर ऐसे में कई रिश्ते टूट या बिखर जाते हैं।
आप फुर्सत में हैं तो यह न सोचें कि सामने वाला भी फुर्सत में है। सबका अपना लाइफस्टाइल होता है। हमें एक हद तक ही उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए नहीं तो वर्षों पुराने संबंधों में छोटी सी बात पर खटास आ सकती है।
जानिए क्या करें हम जब किसी से मिलने जाएं: –
– यदि किसी मित्र के यहां जा रहे हैं तो उसको फोन पर सूचित करें कि हम किस समय आ रहे हैं।
– यदि किसी के यहां बैठे हैं तो समय का पूरा ध्यान रखिये।
– ध्यान रखें किसी को अपनी बातों से बोर मत कीजिए।
– किसी से भी मजाक कैसे और किस सीमा तक हो इसका ध्यान रखें।
– यदि खाने का प्रबंध पहले से नहीं है तो उसके बोलने पर तुरंत हां नहीं कीजिए।
– किसी के यहां पर जरूरत से ज्यादा नहीं जाएं।
– अपने बच्चों को समझायें कि किसी के घर की वस्तुओं को बेवजह हाथ नहीं लगायें।
– मेजबान से बिना वजह फालतू बातें नहीं छेडं।
– यदि आपके मित्र का कोई पहले से बना कार्यक्रम हो और आप अचानक पहुंच भी गए तो उनको यह मत कहें कि हम आपके यहां के लिए ही आये हैं बल्कि यह कहकर टाल दीजिये कि यहां से गुजर रहे थे, सोचा 5 मिनट मिलकर निकल जाते हैं और पानी पीकर निकल जाएं।
– जब हम कब किसी मित्र के यहां जाते हैं और मित्र काफी पुराना भी हो लेकिन बिना कारण उसके फ्रिज या घर की अलमारी से बिना पूछे सामान नहीं निकालें। एक बार मेरे मित्र ने मेरे घर आकर नई शर्ट निकालकर पहन ली जो मेरी पत्नी ने मेरी शादी की सालगिरह के लिए रखी थी। उस समय तो नहीं, हाँ बाद में हम दोनों में काफी मनमुटाव हुआ।
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अत: हमेशा किसी के घर जाएं तो एक मर्यादा में रहें। कहीं आपको कोई किसी बात को लेकर जलील न करें। ताने न कसे कि रोज-रोज आ जाती है इसलिए हमेशा आपसी संबंधों में एक दूरी बनाये रखें चाहे वो सहेलियां हो या आफिस के मित्र हों या पास-पड़ोस के या अपने पति के मित्र का घर, हमेशा एक सीमा में रहिए, जिससे संबंध हमेशा मधुर बने रहेंगे। ठीक है आप फुर्सत में हैं लेकिन सामने वाला फुर्सत में है या नहीं, उसका पूरा-पूरा ध्यान रखिए। कहीं ऐसा न हो कि फुर्सत के क्षण मुसीबत में बदल जाएं और आपसी संबंध खराब हो जाएं।
गरीब आदमियों की अपेक्षा अमीर स्त्री-पुरुषों के पास फालतू समय अधिक होता है। एक तो उनके पास विशेष काम नहीं होता। जो होता भी है वह अधिकतर नौकर-चाकर ही किया करते हैं। उन्हें पैसे की इतनी आवश्यकता भी नहीं होती जिसके लिये वे मगज और शरीरमारी करें। तब भी स्वास्थ्य, कार्यक्षमता तथा विविध प्रकार की बुराइयों तथा व्यसनों से बचने के लिए उन्हें अपने फालतू समय में कुछ न कुछ काम करना ही चाहिये। ऐसे लोग अपने मनोरंजन के लिए बागवानी कर सकते हैं, निरक्षरों को नि:शुल्क साक्षर बना सकते हैं। समाज सेवा तथा परोपकार के बहुत से काम कर सकते हैं।
इस प्रकार शेष समय में पढ़े-लिखे, अनपढ़ तथा गरीब अमीर पुरुष सभी कुछ न कुछ अपने योग्य काम कर सकते हैं। फिर वह चाहे आर्थिक हो अथवा अनार्थिक। इस कार्य को करने में जितना महत्त्व समय के सदुपयोग का है, उतना पैसे का नहीं। फालतू समय में काम करते रहने वाले अनेक रोगों तथा बुराइयों से बच सकते हैं, इसलिए ठल्लेनवीसी करने के बजाय कुछ न कुछ काम करना चाहिये।
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जहाँ तक फालतू समय का प्रश्न है, उसका अनेक प्रकार से सदुपयोग किया जा सकता है। जैसे कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति बच्चों की ट्यूशन कर सकता है। किसी नाइट स्कूल में काम कर सकता है। किसी फर्म अथवा संस्थान में पत्र-व्यवहार का काम ले सकता है। अर्जियाँ तथा पत्र टाइप कर सकता है। खाते लिख सकता है, हिसाब-किताब लिखने-पढऩे का काम कर सकता है। ऐसे एक नहीं बीसियों काम हो सकते हैं जो कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपने फालतू समय में आसानी से कर सकता है और आर्थिक लाभ उठा सकता है। बड़े-बड़े शहरों और विशेष तौर से विदेशों में अपना दैनिक काम करने के बाद अधिकाँश लोग जगह-जगह ‘पार्ट टाइम’ काम किया करते हैं।
पढ़े-लिखे लोग अपने बचे हुये समय में कहानी, लेख, निबन्ध, कविता अथवा छोटी-छोटी पुस्तकें लिख सकते हैं। इससे जो कुछ आय हो सकती है, वह तो होगी ही, साथ ही उनकी साहित्यिक प्रगति होगी, ज्ञान बढ़ेगा, अध्ययन का अवसर मिलेगा और नाम होगा। कदाचित् पढ़े-लिखे लोग परिश्रम कर सकें तो यह अतिरिक्त काम उनके लिए अधिक उपयोगी, लाभकर तथा रुचिपूर्ण होगा।
अपनी छवि खुद बनायें। हम कुछ ऐसा व्यक्तित्व बनायें ताकि सामने वाला खुश हो जाए कि आप आये बहार आई, यह नहीं कि अतिथि तुम कब जाओगे और अब कभी नहीं आओगे।
– विशाल दयानंद शास्त्री

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