क्या आपके पतिदेव भी हर बात पर कहते हैं ‘नो…!

क्या आपके पतिदेव भी हर बात पर कहते हैं ‘नो…!

111कहते हैं मिल जाये अगर कोई साथी मस्ताना तो जीवन हंस खेल कर कैसे व्यतीत हो जाता है, पता ही नहीं चलता मगर दुल्हन जब पिता का घर छोड़ पिया के घर हजारों क्या अनेकों सपने संजोये पहुंचती है तो उसके सुख का आकाश न जाने कितना वृहत् होता है। मन में लड्डू पल रहे होते हैं और आतिशबाजियां छूट रही होती हैं मगर जब वह बात बात में पतिदेव से ‘ना’ सुनती है तो उसके सब्र की इन्तहा होने लगती है।
यह बात दिखने में कितनी भी मामूली क्यों न लगे पर होती परेशानी वाली ही है। ऐसे में खुद का व्यक्तित्व बौना, सारहीन व अस्तित्वहीन सा प्रतीत होने लगता है। जब जीवन रूपी रथ के दोनों पहियों पति-पत्नी में सामंजस्य व एका ही नहीं रहता तो परिवार टूटते व रिश्ते बिगड़ते देर ही कितनी लगती है।
पति जब पत्नी की बात या सलाह नहीं सुनना चाहते, इसका मतलब यह होता है कि कहीं पत्नी और उसका व्यक्तित्व उस पर हावी न हो जाये। अपना महत्त्व दर्शाने और रौब बरकरार रखने हेतु वे पत्नी की बात सुनने समझने, कहने के पहले ही ‘ना’ करना शुरू कर देते हैं और सुन भी लेते हैं तो ‘ना’ की स्पष्ट मुहर लगा देते हैं जैसे पत्नी की बात का विरोध करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। ऐसे व्यक्तियों के मुंह से ‘हां’ कहलवाने हेतु पत्नियों को नाना प्रकार के पापड़ बेलने पड़ते हैं।
पतियों की इस आदत के पीछे उनका मनोविज्ञान काफी जिम्मेदार होता है। बचपन में मिली माता पिता, संगी साथियों से उपेक्षा उन्हें इतना हीन भावना से ग्रस्त कर देती है कि वे एक प्रकार से डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में जब उनकी शादी होती है, तब वे पत्नी पर अपना सारा रौब छलकाना चाहते हैं। वे यह सिद्ध करने में जुट जाते हैं कि उनका भी अस्तित्व है। पत्नी उनकी ही सुने और माने।
ऐसे पतियों की शिकार पत्नियों को अत्यन्त धीरज एवं संयम से काम लेने की जरूरत होती है। ऐसी पत्नियों को चाहिये कि सर्वप्रथम येन केन प्रकारेण पति का विश्वास जीतें। पतिदेव को यह जताये कि वे उनपर कतई हावी नहीं होना चाहती मगर अपना पक्ष रखना उनका भी तो अधिकार है। हां, आपकी मांगें गलत नहीं बल्कि समयानुसार वजनदार हैं तो उन्हें किसी तरह प्रेम व्यवहार से ‘हां’ कहने हेतु प्रेरित करें। इसमें आप झिझक महसूस न करें।
अक्सर स्वभावगत् पुरूषों को यह महसूस होता है कि अगर वे पत्नी की सब बातें मानने लगेंगे तो वह उनको जीवन में भाव नहीं देंगी, साथ ही लोग उन्हें जोरू का गुलाम कहेंगे। बस इतनी सी बात को लेकर उनके मन में छुपा अहंकार रूपी सर्प फन उठाने लगता है।
ऐसी हालत में वे बात-बात में व्यंग्य के तीर चुभो कर या पत्नी की हर बात का इंकार में उत्तर देकर उनका मन छलनी करते रहते हैं।
ऐसे में पत्नी भले ही प्रत्यक्ष में विरोध न करे मगर उसके मन में वितृष्णा और घृणा के भाव पनपते देर नहीं लगती। सामाजिक मर्यादा का निर्वाह भले ही वह सतही और सरसरी तौर पर करती रहे मगर मन में सदा ही बगावत का बिगुल बजता रहता है, अत: मौका मिलते ही वह भी विद्रोह का झण्डा गाडऩे में पीछे नहीं रह पाती।
कुछ पतियों की आदत होती है कि पहले तो वे ना-ना करते रहेंगे, फिर उसी बात को आसानी से मान भी लेंगे। शायद वे यह दर्शाना चाहते हैं कि वे आसानी से सरण्डर करने वालों में से नहीं। जिंदगी को भी वे युद्ध की तरह समझते हैं लेकिन यह अवस्था भी पत्नियों के लिए असहनीय होती है। उनके सब्र का थर्मामीटर कभी भी टूटकर ढह जाता है।
ऐसी स्थिति निर्मित न होने पाये, इसके लिये पत्नियों को अपने तरकश से तर्क के तीर साथ-साथ लेकर ही अपनी बात या मांग पतिदेव के समक्ष रखनी चाहिये न कि प्रत्यक्ष ही अपना पक्ष रखना चाहिये। इसके लिये हो सकता है आपको फेवरेबल माहौल ही क्यों न बनाना पड़े।
यह बात कभी भी नहीं भूलनी चाहिये कि बच्चों के सामने ऐसा कुछ भी न प्रस्तुत करें कि बच्चे जाकर आगे चलकर वैसा ही अपने जीवन में दोहरायें और उनका भी जीवन नारकीय बन जाये, न ही ऐसा कुछ करें कि उन्हें समाज में लाक्षित, ताडि़त या प्रताडि़त होना पड़े मां या पिता के नाम को लेकर।
अत: जरूरी है लड़ें या बहस करें मगर कमरे में बंद होकर, किंतु प्यार न्यौछावर करें सबके सामने। आपस में विश्वास का इजहार करें दूसरों के सामने। हर ‘ना’ को हां में आपस में बदलने की कोशिश करें। जीना इसी का तो नाम है और जियें तो जि़ंदादिली से। एक दूसरे का सम्मान करना सीखें। अगर ऐसा हो जाता है तो हर ‘ना’ को ‘हां’ में बदलते देर ही कितनी लगेगी।
-पूनम दिनकर

Share it
Top