क्या आपका बच्चा बिस्तर में पेशाब करता है

क्या आपका बच्चा बिस्तर में पेशाब करता है

बच्चों में पाई जानेवाली कई तरह की बीमारियों में ‘बिस्तर पर पेशाब करना’ भी एक प्रमुख बीमारी है। दो-तीन वर्ष तक के शिशुओं द्वारा बिस्तर पर पेशाब करना एक सहज क्रिया मानी जाती है किन्तु जब यह आदत तीन-चार वर्ष बाद तक भी नहीं छूटती है, तब इसे बीमारी में शुमार किया जाता है।
बच्चों द्वारा बिस्तर पर पेशाब करना यद्यपि कोई कोई गंभीर बीमारी नहीं है लेकिन यह आदत यदि अधिक उम्र तक बनी रहे तो बच्चों में हीनता की ग्रंथि पनपने लगती है। उसके संगी-साथी भी उसे चिढ़ाते हैं और घर-परिवार में कभी-कभी डांट-फटकार भी सुननी पड़ती है। इतना ही नहीं, अज्ञानतावश बच्चा स्वयं इसे कोई गंभीर बीमारी मानकर और असाध्य बना लेता है।
बच्चों द्वारा बिस्तर पर पेशाब करने के कारणों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है।
मनोवैज्ञानिक कारण:- बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चों में जब अधीरता, असुरक्षा, डर, शोक, तनाव आदि स्थायी रूप से बैठ जाएं तो वे बिस्तर पर बहुधा पेशाब करने लग जाते हैं। माइकल्स तथा गुडमैन नामक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे बच्चे दांत से नाखून काटने, स्वर विकार, जी मिचलाने आदि की बीमारी से भी पीडि़त हो सकते हैं।
शारीरिक कारण:- कुछ चिकित्सकों के अनुसार इसका कारण बच्चों के गुर्दे का कमजोर होना है। उनके अनुसार बच्चों में मूत्र-संग्रह की क्षमता 6-24 औंस पाई जाती है। कमजोर बच्चों में यह क्षमता कम होती है जबकि मजबूत बच्चों में ज्यादा। कुछ चिकित्सकों के अनुसार बच्चों की इस बीमारी का एक शारीरिक कारण उनके पेट में कीड़े का होना भी माना जाता है। यदि बच्चे की रीढ़ में कोई विकृति हो, तब भी वे इस बीमारी से पीडि़त हो सकते हैं। यहां यह स्मरणीय है कि बिस्तर पर मूत्र त्याग करने की यह बीमारी बालिकाओं की तुलना में बालकों में 65 प्रतिशत ज्यादा देखी गई है।
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आदत संबंधी कारण:- इसमें बच्चों के सोने, खाने आदि की आदतें आती हैं। जो बच्चा सवेरे सोता एवं देर तक सोए ही रहता है, उसके बिस्तर पर पेशाब करने की संभावना ज्यादा रहती है। बच्चों द्वारा ज्यादा पानी पीना-वह भी रात में, की आदत भी इस बीमारी का एक प्रमुख कारण है। कुछ शिक्षाविद् रात्रि में बच्चों को ज्यादा जायकेदार एवं उत्तेजक भोजन खिलाने को भी इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं।
बिस्तर पर मूत्र त्याग करने की बीमारी बच्चे की उम्र बढऩे के साथ-साथ समाप्त हो जाती है परन्तु कुछ सावधानी बरतने पर इसे सहज ही नियंत्रित किया जा सकता है।
किचन टिप्स

इसके लिए अभिभावक पीडि़त बच्चे को भरपूर प्यार दें। उसे कभी भी इस आदत के लिए भला-बुरा न कहें। वे बच्चे के मन में इसकी हानियां बैठाने जैसे नकारात्मक कार्य की बजाय उससे अपने बिस्तर को सूखा तथा साफ रखने के लाभ बताएं। ऐसे बच्चों को सोने से एक घण्टा पूर्व से ही पानी पीने से रोक दिया जाए। रात्रि में भी उसे जगाकर एकाध बार पेशाब करवा दिया जाए।
कुछ चिकित्सक इसे औषधि देकर भी ठीक करने का दावा करते हैं लेकिन ज्यादातर विद्वान (शिक्षाविद्, मनोविद् व चिकित्सक) इनके लिए मनोचिकित्सक को ही ज्यादा उपयोगी मानते हैं। विदेशों में तो कई जगह इस बीमारी को दूर करने के लिए डाक्टर पीडि़त बच्चे की एक विशेष प्रकार का विद्युत झटका लगाते हैं किन्तु सर्वेक्षणों से पता चला है कि यह उपाय ज्यादा उपादेय नहीं हो पाता है। यह चिकित्सा-पद्वति बच्चे में कई अन्य भयजन्य बीमारियां पैदा कर देती है। इस बीमारी पीडि़त बच्चे की सुव्यवस्थित दिनचर्या ही सर्वोत्तम निदान है।
– विपिन कुमार

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