कैसे रूकेंगी हमारी रेल दुर्घटनाएं..?

कैसे रूकेंगी हमारी रेल दुर्घटनाएं..?

रेलवे हमारा सार्वजनिक क्षेत्र का सबसे बड़ा उपक्रम है और हमारे देश का एक बड़ा सा विभाग है जिसमें आमलोगों की सुविधा का खास ध्यान रखा जाता है। साथ ही इसमें अत्याधुनिक सुविधा बढ़ाने व तकनीकी सुधार के प्रयास भी किये जाते रहे हैं जो अबतक जारी हैं। जैसा कि पहले रेलवे में कोयले के इंजन का इस्तेमाल किया जाता था जिसे बदल कार डीजल इंजन व अब धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक इंजन में परिवर्तित किया जा रहा है।
इसके अलावा जहां पहले चलती हुई ट्रेन में संचार उपकरणों का पूर्णत: अभाव था, उसमें भी काफी हद तक सुधार किया गया है। पहले जहां पूरी ट्रेन में सिर्फ गार्ड के हाथ में एक वायरलेस हुआ करता था, जिसमें जब भी कोई ट्रेन बीच रास्ते में अटकती थी तो उस समय भी आगे सूचित करने के लिये उसका नेटवर्क ही नहीं काम करता था, वहीं रेलकर्मियों के पास अब आधुनिक मोबाइल व जी.पी.एस. लोकेशन की पहचान होने के कारण उस कमी को दूर करने में काफी हद तक कामयाबी प्राप्त की जा सकी है।
इसके अलावा ट्रेन में यात्रियों की सुविधा के लिये जरूरी हेल्पलाइन नम्बर भी दिये होते हैं जो सिर्फ नाम के नहीं होते और उसपर फोन करने पर मदद भी पहुंचाई जाती है जिस कारण से अब चलती ट्रेन में होने वाले अपराधों को भी कम किया जा सका है। साथ ही ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर भी यात्रियों द्वारा शिकायत व सहायता मांगी जाने लगी है और बदले में रेलवे के अधिकारियों द्वारा समय पर सहायता दी भी जाती है और निस्संदेह यह हमारे रेलवे की सतर्कता, जागरूकता व यात्रियों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता का ही परिचायक है। परंतु इन सबसे भी कहीं अधिक जरूरी हमारी जो बड़ी समस्या है, वह है हमारी सुरक्षा की समस्या यानी यात्रा के दौरान हमारी जानमाल की पूरी सुरक्षा भी उससे अधिक जरूरी है जितनी जरूरी हमारे लिये वह या़त्रा है। रेल या़त्रा के दौरान हमारी यात्रा का उद्देश्य सिर्फ इतना ही नहीं होता कि हम एक जगह से दूसरी जगह तक किसी भी तरह से पहुंच जायें जैसा कि अभी होता है।
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अभी अगर हम किसी भी तरह से अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जायें तो हमें ऐसा लगता है कि हमने अपनी जिंदगी की एक यात्रा पूरी कर ली परंतु उस यात्रा के दौरान रेलवे की लापरवाही के कारण हमारे कितने यात्रियों की जान चली जाती है और उसकी वह यात्रा उसके जीवन की अन्तिम यात्रा बन जाती है। उसके परिजन उसकी यात्रा पूर्ण होकर वापस लौटने के आस में खड़े होते हैं और अचानक उन्हें ज्ञात होता है कि ट्रेन दुर्घटना में उसकी मौत हो चुकी है।
तब क्या बीतता है उन यात्रियों के परिजनों पर उसकी हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। उस समय सरकार द्वारा मुआवजे पर मुआवजे की घोषणा की जाती है और रेलवे द्वारा इतना कह दिया जाता है कि दोषी कर्मियों के उपर कार्रवाई की जायेगी परंतु उसका क्या जिसे इस दुर्घटना में अपनी जान गंवानी पड़ी और उसके उन परिजनों व उन छोटे-छोटे बच्चों का क्या दोष जो इस दुर्घटना के बाद बेसहारा व अनाथ का जीवन जीने को मजबूर हो गये?
रेलवे में तकनीकी खराबियों का पता लगाने व उसे दूर करने के लिये हर स्तर पर कर्मचारियों व अधिकारियों की तैनाती की जाती है यह भी सच है परंतु उन सारे तकनीकी अधिकारियों व कर्मचारियों की मौजूदगी के बावजूद हम अपने यात्रियों से भरी हुई ट्रेन को दुर्घटना हो जाने से रोक पाने से नाकाम साबित हो जाते हैं, यह भी हमारी सच्चाई है। हमारी यह रेलवे जिसके कंधे पर उतने सारे यात्रियों के जानमाल की रक्षा की जिम्मेवारी होती है, उसकी इतनी सतर्कता के बाद भी आखिर हर बार इतनी बड़ी चूक उससे कैसे हो जाती है, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है।
हम या तो कभी अपने किसी कर्मचारी या अधिकारी के ऊपर इसका दोष डाल देते हैं या फिर किसी विदेशी आतंकी का इसमें हाथ होने की बात कह कर अपना फर्ज पूरा कर लेते हैं परंतु हमारे इतना कह देने से क्या इस दुर्घटना में हुई जानमाल व अन्य प्रकार की हुई क्षति की भरपाई हम कर पाते हैं ? तो फिर हम ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं विकसित कर पाते जिससे इन दुर्घटनाओं को पूर्णरूप से नियंत्रित किया जा सके ?
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हम बुलेट ट्रेन व और भी अत्याधुनिक सुविधा लगाने से की बात करने से इस बात को प्राथमिकता क्यों नहीं दे पा रहे हैं कि ट्रेन दुर्घटना होने के कारणों पर कैसे काबू पाया जाय ? अधिकांश ट्रेन दुघटनाओं में दुर्घटना का का कारण या तो रेलवे के पुराने ट्रैक का जंग लगकर खराब हो जाना या फिर ट्रेन के ट्रैक में छेड़छाड़ करके उसे छतिग्रस्त कर देना देखा गया है। आज हमारा यह आधुनिक विज्ञान इतना विकसित हो चुका है कि हम अब इस बड़ी समस्या का भी ठोस हल चाहें तो जरूर निकाल सकते हैं।
आज हमारे पास न तो संसाधनों की कमी है और न ही टेक्नोलॉजी की, फिर भी जो इतनी जरूरी है, उसे हम क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? हमें सबसे पहले अपने रेलवे के उपयोग में लगे हुए उन सारे पुराने व जंग खाये हुए सारे ट्रैक को बदलकर उसकी जगह परीक्षण किये हुए नये ट्रैक लगाने होंगे। उसके बाद हमें अपनी आधुनिक विज्ञान की मदद से ऐसी एक नई तकनीक विकसित करनी होगी जिसमें रेलवे के ट्रैक से सिग्नल का सीधा संबंध स्थापित हो सकेगा।
फिर उसकी मदद से हमारे ट्रैक में किसी भी प्रकार की तकनीकी खराबी व बाहरी छेड़छाड़ होने की स्थिति में उसका सिग्नल स्वत: लाल हो जाये और उसकी सूचना खुद व खुद स्थानीय नियंत्रण कार्यालय में भी देखी जा सके। आज हमारे देश के तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से विदेशों में एक से एक रोज नये-नये अविष्कार हो रहे हैं पर हम अपने लिये उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। वैसे यह भी सच है कि इतना कह देना जितना आसान है, उसे वास्तव में कर पाना उतना आसान नहीं है।
– अशोक कुमार झा

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