कैसे रहें आखिर सास-बहू प्रेम से

कैसे रहें आखिर सास-बहू प्रेम से

saas-bahuसास का व्यवहार अपनी बहू के प्रति सरल होना चाहिए। उसे अपनी बेटी की तरह प्यार दें। जिस तरह बेटी कोई गलती करती है तो मां उसे प्यार से समझाती है, सलाह देती है, उसे हर अच्छे-बुरे का बोध कराती है, उसी तरह बहू की गलती पर उसे प्यार से उसकी गलती का अहसास कराएं न कि गुस्से से। तब आप स्वयं देखेंगे कोई ऐसी चीज नहीं है जो सास-बहू के रिश्तों की नाजुक डोर को तोड़ सके।
घर के मामलों में सास को बहू से तथा बहू को सास से सलाह मशविरा लेना चाहिए। छोटी-छोटी बात पर एक दूसरे को टोकना व ताने देना ठीक नहीं होता। इससे एक दूसरे के प्रति कटुता बढऩा, खीज बढऩा स्वाभाविक है। प्यार से ही प्यार बढ़ता है।
बहू का रिश्ता एक नाजुक डोर से बंधा होता है। यदि यह डोर टूट जाए तो डोर तो जुड़ जाएगी परन्तु उसमें एक गांठ पड़ जायेगी। यदि प्रत्येक सास बहू के दुर्गुणों को छोड़कर उसके गुणों को देखने समझने लगे तो उनके संबंधों में मधुरता और प्रगाढ़ता होगी।
नई नवेली शिक्षित बहू के मन में अपने नये परिवार के प्रति कुछ समर्पण भाव होते हैं। नए नए सपनों को दिल में संजोए जब पिता का घर छोड़ पिया के घर की दहलीज पर वह कदम रखती है तो उसके दिल में एक चाह होती है, एक सपना होता है जिसमें वह एक अच्छेे पति, सास, श्वसुर, ननद, जेठ व देवर की कल्पना को संजोए रखती है। उसके इस उमंग, उत्साह को जब उसके ससुराल में समर्थन नहीं मिलता तो उसकी इच्छाएं, सपने, अरमान सब चकनाचूर होने लगते हैं आरै व कुंठा जन्म लेती है। आगे चलकर इसी कुंठा के कारण पारिवारिक कलह का वातावरण बनने लगता है।
सास-बहू का पहला कर्तव्य यह है कि वे एक-दूसरे की भावनाओं, अपेक्षाओं को जाने-पहचानें तथा उसके अनुरूप कार्य करें। अच्छे गुणों को प्रोत्साहन दें एवं दुर्गुुणों को दूर करें। सास को बहू के तथा बहू को सास के विचारों, व्यवहार के साथ आपसी सामंजस्य बिठाना आवश्यक है। आज की सास-बहू के झगड़े मात्र इसलिए ही होते हैं क्योंकि वे अपने विचारों व व्यवहारों में तालमेल नहीं बैठा पाती। दूसरी बात, सास अपनी बेटी के मामले में स्वतंत्र रहना चाहती है पर बहू के मामले में चाहे वह खरीदारी का मामला हो, घूमने-फिरने, सजने-संवरने अथवा घरेलू कार्य करने का मामला हो, वह उदासीन तथा दोहरी नीति प्रणाली अपनाती है। ऐसा क्यों? बहू-बेटी में असमानता आखिर किस लिए? यह गंभीर विचारणीय विषय है। हर सास को यह सोचना समझना चाहिए कि जैसे अपनी बेटी है, वैसे ही बहू भी किसी न किसी की बेटी है। उसकी मां भी उसे उतना ही प्यार-दुलार करती थी जितना आप अपनी बेटी को करती हैं। आज समय की मांग है कि हर सास अपनी बहू को बेटी के रूप में माने और उसे प्यार दे। तब बहू स्वयं सास को मां से भी ज्यादा प्यार तथा सम्मान करने लगेगी।
– मीना जैन छाबड़ा

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