कैसे थमे मौतों का सिलसिला ..?

कैसे थमे मौतों का सिलसिला ..?

PATNA, NOV 10 (UNI):- People waiting in queue at State Bank of India for exchanging their old 1000 and 500 currency notes,in Patna on Thursday. UNI PHOTO-81Uकेन्द्र की भाजपा सरकार ने विगत 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के मौजूदा नोटों को बंद करने का ऐलान किया था। तब नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम अपने उद्बोधन में कहा था कि हम यह कदम कालाधन और जाली नोटों का प्रवाह रोकने के लिये उठाने जा रहे हैं। केन्द्र सरकार द्वारा लोगों के पास जमा 500 एवं 100 के नोटों को सरकारी बैंकों में जमा कर नये नोट प्राप्त करने के कुछ विकल्प और समय सीमा भी निर्धारित की गई थी। लेकिन सरकार का नोटबंदी का यह निर्णय लागू होने के बाद से जगह-जगह लोगों की असामयिक मौत, बैंकों में विवाद, लूटपाट व तोड़फ़ोड़ की जो घटनाएं प्रकाश में आ रही हैं, उनसे तो यही लगता है कि नोटबंदी की मार गरीबों व मध्यमवर्गीय लोगों पर ही ज्यादा पड़ रही है वहीं जानकार यह भी मानते हैं कि कालेधन के स्वामियों ने अपना धन सफेद करने का तरीका ढूंढ़ लिया है क्यों कि सरकारी बैंकों में कुल मिलाकर 500 व 1000 के पुराने नोटों के रूप में जो धन जमा हुआ है वह सरकार के अनुमान से कहीं ज्यादा है।
http://www.royalbulletin.com/कारपोरेट-राक्षसों-के-चुं/ बैंकों में सरकार के अनुमान से ज्यादा पुराने नोट जमा किये गये हैं तो उसका आशय यही है कि इसमें से अधिकांश पैसा कालेधन के स्वामियों का ही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कोई बड़ा कदम उठाने से पहले उसके दुष्प्रभाव और आम जनों की परेशानी को ध्यान में क्यों नहीं रखा। अब तो हालत ऐसी हो गई है कि लोग नोटों को लेकर ही परेशान हैं। उनके पास रुपया है, पैसा है, धन है, दौलत है फिर भी वह तनावग्रस्त नजर आ रहे हैं। लोगों की रोज-मर्रा की जिंदगी ही सरकार के इस कदम से बाधित सी हो गई है। कहीं लोग बैंकों में कतार में खड़े रहने के दौरान ही हृदयाघात का शिकार हो रहे हैं तो कहीं कोई आत्महत्या कर रहा है। किराना दुकानों से लेकर पेट्रोल पंपों तक में पहुंचने वाले लोग नोटों संबंधी परेशानी से ही जूझ रहे हैं। पहले तो पेट्रोल पंपों में 500 व 1000 के पुराने नोट लिये जा रहे थे लेकिन अब वह भी बंद हो गया है। नई करेंसी की खेप पहुंचाने के लिये सरकार को एयरफोर्स तक की मदद लेनी पड़ रही है। देश की नोट छापने की चार यूनिटों में 24 घंटे काम चल रहा है फिर भी नये नोटों की आपूर्ति नाकाफी साबित हो रही है।
http://www.royalbulletin.com/रालोद-के-पूर्व-अध्यक्ष-मु/वहीं नोटबंदी को लेकर संसद में जो कोहराम मचा हुआ है उससे जनहितैषी अन्य मुद्दे नेपथ्य में चले गये हैं। नरेन्द्र मोदी द्वारा अगर अपने इस कदम को भ्रष्टाचार व कालाधन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है तो कोई भी निर्णय लागू करने से पहले जनमानस की परेशानी को भी तो ध्यान में रखना चाहिये था। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे गरीब व मध्यमवर्ग के हितों पर कुठाराघात करार दिया तो कुछ विपक्षी नेताओं ने नोटों का चलन बंद करने संबंधी सरकार के इस फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की। कांग्रेस द्वारा पांच सौ और एक हजार रूपये के नोटों का चलन बंद करने के सरकार के इस फैसले पर शुरुआती दौर में ही सवाल उठाते हुए कहा गया था कि यह निर्णय कारोबारियों, छोटे व्यापारियों और गृहणियों के लिए बहुत समस्याएं पैदा करेगा। कांग्रेस की ओर से कहा गया था कि वह काले धन के मुद्दे पर अर्थपूर्ण, स्पष्ट और सटीक कदमों का पूरा समर्थन करती है लेकिन आमजनों की परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उधर नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए माकपा ने भी कहा था कि इस फैसले का मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारियों की वित्तीय स्थिति पर गहरा असर होगा। पार्टी का यह भी कहना था कि हम हमेशा काले धन के मुद्दे के समर्थन में हैं। लेकिन इस मुद्दे पर ढाई साल की चुप्पी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा अचानक पांच सौ और एक हजार रूपये के नोट हटाने का अचानक फैसला किया। पार्टी द्वारा इस निर्णय को बेहूदा और छोटे कारोबारियों और मध्यम वर्ग पर बड़ा असर डालने वाला बताया गया था।
http://www.royalbulletin.com/युवी-की-शादी-में-दिखा-कोहल/ उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों को हटाने संबंधी केन्द्र सरकार के फैसले को निर्मम एवं बिना सोच समझकर किया गया फैसला बताते हुए कहा गया था कि इससे देशवासियों को वित्तीय दिक्कतें होंगी। तृणमूल कांग्रेस सांसदों की आक्रामकता संसद में भी लगातार बरकरार है वहीं पश्चिम बंगाल के कुछ टोल नाकों में आर्मी की तैनाती ने ममता बैनर्जी के तेवर और ज्यादा तीखे कर दिये हैं। संसद में नोटबंदी को लेकर गतिरोध खत्म न होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि केन्द्र सरकार अपने इस रवैये पर अडिग है कि हम न तो नोटबंदी का अपना निर्णय वापस लेंगे और न ही किसी की सुनेंगे। वैसे सडक़ से संसद तक विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं के नोटबंदी विरोधी रवैये से यह तो स्पष्ट है कि अभी नोटों के मुद्दों पर भी देश में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर आगे भी चलता ही रहेगा और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्यों कि राजनीतिक दल तो जनमानस के हितों और चिंताओं के झंडाबरदार तो हैं ही, फिर उन्हें अपनी जिम्मेदारियां तो निभानी ही होंगी। यह तो सरकार को सोचना चाहिये था कि उसका कोई भी कदम देशवासियों के लिये परेशानी व चिंता का कारण न बने। वैसे भी कालेधन या भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चाहे जितने हवा-हवाई प्रयासों को अंजाम दे लिया जाए या दावे कर लिये जाएं लेकिन यह समस्या तब तक सुलझने वाली नहीं है जब तक लोग इस मुद्दे पर स्वस्फूर्त मन से सहयोग प्रदान न करें। 5 दिसंबर को नोटबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है, उम्मीद की जा सकती है कि जो भी निर्णय होगा वह देशहित में ही होगा।
-सुधांशु द्विवेदीadd-royal-copy

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