कैलेंडर की कहानी

कैलेंडर की कहानी

 प्राचीन काल से ही मनुष्य की वह आकांक्षा रही है कि दिनों का लेखा-जोखा रखने के लिए कोई न कोई व्यवस्थित प्रणाली बनाई जाए। इसी आकांक्षा ने कैंलेंडर को जन्म दिया।
सबसे पहले कैलेंडर को तैयार करने की शुरूआत मिस्र में हुई। मिस्र में जो कैलेंडर तैयार किया गया, उसमें एक वर्ष में 12 महीने तथा एक महीने में 30 दिन रखे गए। बाद में वर्ष के 365 दिन पूरे करने के लिए 5 दिन इसमें और जोड़े गये।
इससे पूर्व मनुष्य को सिर्फ महीनों का ज्ञान था और महीने के दिनों के नाम अलग-अलग होते थे। इस कारण किसी भी कार्य के लिए कोई निश्चित दिन तय नहीं किया जा सकता था। इसलिए मिस्रियों ने इस कैलेंडर को तैयार करते समय इस बात की जरूरत समझी कि दिनों के नाम रखे जाएं ताकि किसी भी कार्य के लिए दिन निश्चित किए जा सकें।
उस समय लोग हर सातवें दिन को पवित्र मानते थे। यहूदी भी हर सातवें दिन को धार्मिक अनुष्ठान करते थे। मिस्रियों ने इस पद्धति को अपनाते हुए सप्ताह की रचना की। उन्होंने सप्ताह के दिनों के नाम चन्द्रमा, सूर्य और उसके पांच ग्रहों मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि पर रखे। सूर्य से बना रविवार, चन्द्रमा से चंद्रवार, मंगलवार की उत्पत्ति हुई मंगल ग्रह से। इसी तरह बाकी चारों दिनों के नाम पड़े।
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आजकल सप्ताह के दिनों के जो अंग्रेजी नाम प्रयुक्त होते हैं वे देवताओं के नामों पर आधारित हैं। इसके बाद कैलेंडर का संशोधित और विकसित रूप तैयार करने के लिए रोम के जूलियस सीजर ने प्रयास किए। जूलियस रोम का सम्राट था। सम्राट जूलियस की साहित्य और अंक विज्ञान में विशेष रूचि थी। इसलिए उसने कैलेंडर के बारे में अध्ययन करने का निश्चय किया लेकिन यह कार्य अकेले जूलियस के बस में नहीं था। इसलिए उसने अपने ज्योतिष शास्त्रियों को साथ लिया। उस समय यह ज्ञात था कि एक वर्ष 365-1/4 दिन के बराबर होता है। मिस्रियों ने जो कैलेंडर तैयार किया था उसमें एक वर्ष में 365 दिन रखे गए थे लेकिन शेष 1/4 दिन का कोई लेखा-जोखा नहीं था। इस त्रुटि को दूर करने के लिए जूलियस ने एक नया आयाम रखा। जूलियस ने मिस्रियों की भांति रखे तो एक वर्ष में 365 दिन। हर चौथा वर्ष जिसमें 366 दिन होंगे, उसे लीप वर्ष कहा गया। लीप वर्ष की व्यवस्था करने से जो 1/4 दिन पहले शेष बच जाता था, वह चार साल बाद पूरा हो जाता था। सप्ताह के लिए वही मिस्रियों की पद्धति अपनाई। 100 ई. पूर्व में जन्मे जूलियस सीजर ने 46 ई. पूर्व में यह महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न किया लेकिन दुर्भाग्य की बात यह रही कि इस के दो वर्ष बाद ही उनके एक करीबी दोस्त ब्रूटस ने उनकी हत्या कर दी। यह कैलेंडर करीब 1570 वर्ष तक मान्य रहा। लेकिन इसके बाद कैलेंडर की त्रुटियां भी सामने आने लगी। उसका कारण यह था कि जूलियस ने इस आधार पर कैलेंडर तैयार किया था कि पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में 365.25 दिन का समय लगता है लेकिन वास्तविकता यह थी कि पृथ्वी को इस कार्य में 365.2422 दिन का समय लगता है।
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इसमें अंतर तो बहुत ही कम था लेकिन 157० वर्षों तक यह अन्तर जमा होते-होते 12) दिन का हो गया। इस त्रुटि को दूर करने के लिए 1522 में रोम के ही मिस्टर ग्रेगरी ने प्रयास किया। अन्त में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जिस शताब्दियों की संख्या 400 से विभाजित न हो पाए, उनमें फरवरी 29 दिन की रखी जाए तो इस त्रुटि को सुधारा जा सकता है। इस तरह ग्रेगरी ने नया कैलेंडर तैयार किया जो आज भी विश्व भर में प्रचलित है। जनवरी महीने के नाम की उत्पत्ति रोमन देवता जेनस से हुई। फरवरी रोमन त्योहार फैबुआ से प्रेरित है। मार्च रोमन लोगों का युद्ध देवता था। इसी देवता के नाम पर इसे मार्च कहा गया। अप्रैल एक लेटिन शब्द एपेरिर से बना है। मई शब्द रोम की एक देवी माइमा से बना है। जून शब्द स्वर्ग की रानी जूनो से संबंधित है।
जुलाई शब्द जूलियस सीजर के नाम से बना है। अगस्त मास रोम के राजा आगस्टस से बना है। सितम्बर मास चूकि पुराने रोमन कैलेंडर में सातवां नाम था सो लेटिन शब्द सप्तम में इसे निकाला गया। अक्टूबर लैटिन ऑक्टो से प्रेरित है। नवम्बर शब्द नोवम से बना है। दिसम्बर, लैटिन शब्द डीसेम से बना है।
आशा है कैलेंडर पर इसी तरह शोध कार्य चलता रहेगा और भविष्य में कुछ-न कुछ नया देखने को मिलेगा। कैलेंडर का बुनियादी ढांचा खड़ा करने तथा उसे विकसित करके अपने मुकाम तक पहुंचाने में विशेषत: मिस्र और रोम के निवासियों ने विशेष योगदान दिया है।
– दिनेश सोनी

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