किस्म-किस्म के पेय

किस्म-किस्म के पेय

अभी तक समझा जाता था कि चाय का पता सबसे पहले चीन वालों को लगा पर अब इतिहासकारों ने खोज की है कि चीन से भी पहले भारत में लोग चाय के बारे में जानते थे। यहां से बौद्ध भिक्षुओं के साथ चाय चीन पहुंची। यहां से वह दुनिया के लगभग सभी देशों में पहुंची। हर कहीं उसके शौकीन और उसे पसंद करने वाले नजर आने लगे।
भारत में अंग्रेजी राज में चीन से पौधे ला कर बंगाल और असम में चाय उगाने की कोशिशें की गईं। तभी अंग्रेज अधिकारियों को पता चला कि भारत में असम के कई ऐसे इलाके हैं जहां प्राचीन काल से उम्दा चाय पैदा होती है। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने बंगाल और बिहार के कुछ इलाकों में चाय उगाने की कोशिश की। असम के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जैसे स्थानों पर चाय बहुतायत से पैदा होने लगी। फिर धीरे-धीरे अन्य स्थानों पर भी चाय का उत्पादन होने लगा। डिब्बाबंद चाय भारत से इंग्लैंड भेजी जाने लगी। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक देशों में से एक है।
आज की दुनिया में किस्म-किस्म के स्वाद और जायकेदार पेयों की कमी नहीं पर इनमें चाय आज भी शायद नंबर वन है। आज दुनिया में असंख्य लोगों की सुबह चाय के साथ होती है और शाम के हल्के नाश्ते या गरमागरम पकौड़ों के साथ भी चाय का कोई जवाब नहीं। इस लिहाज से दुनिया के सबसे ज्यादा पसंदीदा पेय के रूप में बेशक चाय की गिनती की जा सकती है। कोई चाहे तो कह सकता है कि दुनिया के तमाम तरह के पेयों में चाय को आज भी महारानी का पद हासिल है। खास कर सर्दियों में तो किस्म-किस्म के पेयों में चाय की पुकार ही सबसे अधिक सुनी जाती है।
चाय की तरह कॉफी भी ताजगी और स्फूर्ति देने वाला अनोखा पेय है। सबसे पहले इथोपिया के लोगों को इसके बारे में पता चला। इथोपिया के काफा प्रांत की पहाडिय़ों पर छोटी-छोटी बेरियों वाला यह पौधा पैदा होता था। काफा में पैदा होने के कारण यह पौधा कॉफी कहलाया। बाद में कॉफी अरब देशों में पहुंची। वहां से यूरोप और फिर धीरे-धीरे सारी दुनिया में पहुंच कर अपनी धूम मचाई।
कहते हैं कि कॉफी की खोज सबसे पहले एक गड़रिए ने की। उसने देखा कि उसकी बकरियों ने घास चरते हुए एक खास पौधे की छोटी-छोटी, गोल बेरियों को चबा लिया। उसके बाद घर लौटने पर उसने यह आश्चर्यजनक चीज नोट की कि बकरियां रात में बजाए सोने के देर तक उछलकूद करती रहीं। जब उसने खुद उस पौधे की बेरियों को खाया, तो उसे अनोखी फुर्ती महसूस हुई।
धीरे-धीरे कॉफी के गुणों के बारे में औरों को भी पता चला। फिर कॉफी को सुखा कर, देर तक संरक्षित रखने का तरीका भी खोज लिया गया। उसे उबाल कर पिए जाने वाले पेय को भी कॉफी ही कहा गया।
एक दिलचस्प बात यह है कि शुरू में बगैर चीनी के ही कॉफी पी जाती थी पर एक बार अरब के कहवाघर में किसी ने मजाक-मजाक में कॉफी के प्याले में चीनी मिला दी। इसका स्वाद पीने वाले को इतना भाया कि उसने औरों से भी इसकी चर्चा की। फिर देखते-देखते लोग मीठी कॉफी के शौकीन होते चले गए। शुरू में गरम कॉफी ही पी जाती थी पर धीरे-धीरे ठंडी कॉफी का भी प्रचलन बढ़ा।
किस्म-किस्म के पेयों में स्वादिष्ट और जायकेदार शरबतों का उल्लेख भी जरूरी है। यों तो सारी दुनिया में शरबत पीने का रिवाज है, पर अपने देश में तो एक से एक उम्दा शरबतों का जवाब नहीं। कई तरह के फल-फूलों से स्वादिष्ट शरबत तैयार करने की परंपरा हमारे यहां प्राचीन काल से है। खास कर बेल, जामुन, फालसे, लीची, तरबूज तथा गुलाब, केवड़े आदि के शरबत बहुत स्वादिष्ट और गुणकारी माने गए हैं पर इनमें बेल के शरबत का तो कहना ही क्या। यह तन-मन को ठंडक और ताकत देने वाला माना गया है।
सेहत अच्छी रखनी हो तो—

आजकल लीची, सेब, अनन्नास आदि के डिब्बाबंद जूस भी मिलते हैं। इन्हें पीने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। बढिय़ा जायकेदार शरबतों के अलावा संतरे, मौसमी, नींबू, गन्ने, सेब, अनार आदि के रस भी स्फूर्ति और शक्ति देने वाले हैं। इन्हें पीते ही थकान गायब हो जाती है पर इन्हें ताजा ही पिया जाना चाहिए। देर से रखा हुआ रस नुकसान पहुंचा सकता है।
इसके अलावा गर्मी के मौसम में खस व बादाम की ठंडाई बड़ी जायकेदार और उपयोगी है। आजकल ठंडाई बाजार में बनी-बनाई भी मिलती है। उसमें थोड़ा दूध और बर्फ मिलाइए और लीजिए ठंडाई तैयार। इसी तरह आम का पना अपने ढंग का अनूठा पेय है। भारत के पारंपरिक पेयों में इसकी प्रमुखता से गिनती की जाती है। सदियों से इसे पसंद किया जाता रहा है और आज भी यह घर-घर बनता है। इसमें अद्भुत पाचक गुण है।
इसी तरह जलजीरा भी बहुत पाचक और जायकेदार पेय है। आजकल मैंगो शेक और बनाना शेक का प्रचलन भी बढ़ा है। बहुत सादा और आसानी से तैयार हो जाने वाले पेयों में नींबू की शिकंजी का भी जवाब नहीं। इसी तरह सत्तू ऐसा देसी ढंग का पेय है जिसकी खूब चर्चा लोकगीतों और लोककथाओं में मिलती है। समुद्र के किनारे पाए जाने वाले पेड़ों पर उगने वाले नारियल का नारियल पानी आज पूरे देश में मिलता है।
चोकर बहुत उपयोगी है शरीर के लिए

भारत के सबसे पुराने और स्वादिष्ट पेयों में भला लस्सी का जिक्र कैसे न किया जाए। कहा जा सकता है कि लस्सी के गुणों का सारा भारत दीवाना है। इसी तरह भैंस या गाय का दूध भी प्राचीन काल से घर-घर में पिया जाता है। दूध में प्रोटीन काफी मात्रा में होने के कारण, इससे ताकत आती है। पढऩे-लिखने वाले बच्चों को दूध जरूर पीने की सीख बड़े-बुजुर्ग देते आए हैं। देर तक पढऩे या खेलने-कूदने के बाद दूध पीना काफी फायदेमंद है। गर्मियों में ठंडा दूध भी पिया जा सकता है।
आज हमारी दुनिया में अलग-अलग स्वाद और जायके वाले किस्म-किस्म के पेयों की कोई कमी नहीं है। इनमें कुछ खट्टे हैं, कुछ मीठे, कुछ खट्मि। कुछ ठंडे, कुछ गरम। ये शीतल और गरम पेय आजकल इतने किस्म-किस्म के स्वाद और रंग-रूपों में मिलते हैं कि अचरज होता है।
एक से एक बढिय़ा और स्वादिष्ट पेयों के मामले में हम वास्तव में आज कितने खुशकिस्मत हैं।
-नरेंद्र देवांगन

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