किसानों के हितों के विपरीत है सरकार की पॉलिसी

किसानों के हितों के विपरीत है सरकार की पॉलिसी

दालें बाजार में सस्ती हो गई हैं। इसका कारण यह नहीं है कि किसानों ने दालों का ज्यादा उत्पादन कर लिया है। दालों के सस्ती होने की वजह यह है कि सरकार ने बड़ी तादाद में बाहरी देशों से दालें आयात की हैं। सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के नाम पर विदेशों से बड़े स्तर पर खाद्यान्नों का आयात करती है। इससे किसानों को अपनी पैदावार का उचित लाभ नहीं मिल पाता।
देश में दालों की बढ़ी हुई खपत का मुकाबला करने के लिए अगर दालों की खेती को बढ़ावा दिया जाता तो इससे किसानों को लाभ मिलता और सरकार को बाहरी देशों से दालों का आयात नहीं करना पड़ता। ऐसे में देश का पैसा बाहर नहीं जाता जो देश की आर्थिक हालत को मजबूत करता। ऐसा केवल दालों की खेती को ले कर ही नहीं है। बहुत सारे दूसरे खाद्यान्न हमारा देश बाहर से मंगाता है। इससे देश का पैसा बाहर जाता है और खाद्यान्नों की बढ़ती खपत का लाभ देश के किसानों को नहीं मिलता है।
सरकार चाहती है कि किसानों की आय को बढ़ावा दिया जाए मगर उनकी आय तब तक नहीं बढ़ेगी, जब तक कि उन्हें उनकी उपज का सही दाम नहीं मिलेगा। जब फसलें किसानों के खेतों में तैयार होती हैं तो बाजार में सस्ती बिकती हैं। किसानों से बाजार में पहुंचते ही फसलों की कीमतों में इजाफा हो जाता है। फसलों की महंगी कीमतों का लाभ किसानों की जगह बिचौलियों को मिलता है। किसान की आय बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादों के दाम में वृद्धि हासिल करनी होगी। इसमें शहरी उपभोक्ताओं का हित आड़े आता है। गेहूं और अरहर के दाम बढऩे दिए जाएं तो किसान की आय बढ़ेगी लेकिन शहरी उपभोक्ताओं को कठिनाई होगी।
ये जातीय संघर्ष ठीक नहीं
इसका हल निकालने के लिए सरकार ने आयातों का सहारा लिया है। इन आयातों के माध्यम से देश के किसानों को ऊंचे दाम मिलने से वंचित किया जा रहा है। सरकार की पॉलिसी किसान के हितों के विपरीत है। घरेलू दाम ऊंचे हों तो आयात करके और घरेलू बाजार में दाम नीचे हों तो निर्यातों पर प्रतिबंध लगा कर सरकार किसानों को मारती है।
सरकार तमाम तरह की योजनाएं किसानों की तरक्की को ले कर चलाती है। ये सभी योजनाएं लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की शिकार हो जाती हैं। खेती की सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंद किसानों को नहीं मिलता। सरकारी महकमे इन योजनाओं की जानकारी किसानों को सही तरह से नहीं देते। इन योजनाओं का प्रचार-प्रसार इस तरह से नहीं होता कि किसानों को सही जानकारी मिल सके।
सरकार जब विदेशों से खाद्यान्न आयात करती है तो सरकारी नौकरों को कमीशन मिलता है। ऐसे में उनकी प्राथमिकता अपने देश के किसानों के आत्मनिर्भर होने की जगह पर विदेशों से अनाज मंगाना होती है। उपभोक्ताओं को राहत देने के नाम पर देश का पैसा विदेशों में धड़ल्ले से भेजा जा रहा है।
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सरकार को चाहिए कि किसानों को वैश्विक मूल्यों का दोनों तरफ सामना करने के लिए छोड़े। विश्व बाजार में दाम नीचे हों तो आयात अवश्य होने दें परंतु जब विश्व बाजार में दाम ऊंचे हों तो किसानों को निर्यात करने की छूट भी मिलनी चाहिए। ऐसा करने से किसान को कुछ राहत अवश्य मिलेगी लेकिन ध्यान रहे कि यह भी दीर्घकालीन हल नहीं है।
विश्व बाजार में कृषि उत्पादों के दाम निरंतर गिर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार 2011 से 2016 के बीच कृषि मूल्यों का वैश्विक सूचकांक 229 से घट कर 161 रह गया है। अत: विश्व बाजार से जुडऩे से किसान को राहत नहीं मिलेगी क्योंकि विश्व बाजार ही लगातार टूट रहा है। विश्व बाजार में दाम ऊंचे हों तो किसान को निर्यात से कुछ आय होगी। ञ्च नरेंद्र देवांगन

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