किताबों का नायाब संसार

किताबों का नायाब संसार

कई व्यक्ति किताबी कीड़े कहलाते हैं। यह प्रशंसा भी है और कहने वाले की ईष्र्या का भी प्रदर्शन करती हैं। किताबें आदमी की सबसे अच्छी साथी, मित्र व सहयोगी होती हैं। बेकन का वह लेख जिसमें अच्छी और बुरी किताबों का विश्लेषण किया था, इस तथ्य को दर्शाता है कि किताबें पढऩे वाले ज्यादातर लोग खराब अर्थात अनुपयोगी या दिमाग को विकसित नहीं करने वाली पुस्तकें पढ़कर समय बर्बाद करते हैं। यही बात अखबार और मैगजीन पढऩे वालों के लिए भी सही है।
मुश्किल यह है कि बिना पढ़े यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन सी किताब अच्छी है या बुरी है। दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाया जा सकता है किंतु दूसरे का अनुभव या दृष्टिकोण अन्य पाठकों से भिन्न हो सकता है। कई बार जो पुस्तक एक व्यक्ति को बहुत अच्छी या महत्त्वपूर्ण लगती है, दूसरे को बेकार की माथा-पच्ची लगती है।
अधिकांश: किताबों को सरसरी निगाह से पन्ने उलटकर तय किया जा सकता है कि पुस्तक सारगर्भित है या नहीं है। ज्यादातर अनुमान सही होते हैं किन्तु फिर खराब किताब के भी कुछ अंश अच्छे हो सकते हैं तथा अच्छी किताब के भी कुछ अंश बुरे या पढऩे योग्य नहीं हो सकते।
पुस्तकें बहुत सीमित मात्रा में ही पढ़ी जा सकती हैं क्योंकि हर विषय पर अनगिनत किताबें हैं, अनेक भाषाओं में हैं और अनेक लेखकों द्वारा लिखी गई हैं। भारत के कानूनों को ही पढ़ा जाय तो सौ पृष्ठ रोज पढऩे पर भी सौ साल में पूरा नहीं पढ़ा जा सकता।
कुछ किताबें इतनी सार्थक और चतुराईपूर्ण तरीके से लिखी होती हैं कि उनको पढ़कर भी समझना आसान नहीं होता। कुछ पुस्तकें एक बार शुरू करने के बाद छोड़ी ही नहीं जा सकती। कुछ किताबें ऐसी होती हैं कि उनमें बुद्धिमता टपकती है। कुछ को पढ़ते समय पाठक की सांसें थम जाती हैं। कुछ पुस्तकें लेखक को उखाड़कर रख देती हैं और कुछ पाठक को। शब्द ही प्रभावशाली नहीं होते, कई बार किताबों की सच्चाई विस्मयकारी होती है।
प्राय: पुरूषों और महिलाओं, जवान और वृद्धों की पसंद अलग-अलग होती है। उम्र के साथ अच्छी, बुरी की व्याख्या भी बदल जाती हैं एक शोध में बताया गया है कि युवा लड़के भी फैशन के बारे में पढ़ते हैं। लड़कियों के फैशन के बारे में और अपने स्त्री जानकारों का फैशन के अनुसार विवेचन करते हैं।
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डरावनी पुस्तकें पढऩे वाले कम होते हैं, रहस्य-रोमांच की पुस्तकें चाव से पढ़ी जाती हैं। जासूसी उपन्यास तो बड़े-बड़े गंभीर विद्वान भी पढऩा पसंद करते हैं। एम.एन.राय भी इनमें से एक थे। आइंस्टीन भी जासूसी उपन्यासों से नव सोच का रिश्ता जोड़ते थे। कार्ल माक्र्स भी जासूसी उपन्यासों के शौकीन थे।
यात्र में बहुत से लोग फिल्मी और जासूसी पुस्तकों को पढऩा ही उत्तम मानते हैं। कई बार लोगों को पढऩे का मेनिया होता है। श्री लालचन्द कोठारी हर वक्त पढ़ते ही रहते थे। रास्ते में चलते हुए भी, मंदिर जाते समय भी, विवाह समारोह में भी। उन्हें अच्छी या बुरी किताब से कोई सरोकार नहीं होता था पैम्फलैट टाइप किताब हो या गीता या अन्य कोई धार्मिक ग्रंथ, कविता की पुस्तक हो या कहानियों की, दस-बीस पृष्ठ की हो या पांच सौ पृष्ठों की। उनके कनिष्ठ पुत्र ने मुझे लासएंजल्स में बताया कि उन्होंने अपने जीवन में पचहतर हजार पुस्तकें पढ़ी। यह पूरा सही न भी हो तो इसमें मुझे संदेह नहीं हैं कि उन जैसा किताब का कीड़ा दुनियां में ढूंढना आसान नहीं है।
बर्नाड शॉ कहते थे कि हर लेखक की अपनी आंखें होती हैं। ‘प्लेजेंट अनप्लेजेन्ट की भूमिका में उन्होंने लिखा कि मुझे हर वस्तु दूसरों से कुछ भिन्न दिखाई देती है। मैं कई बार दु:खी हो जाता था। मैं डॉक्टर से आंखों की जांच कराने गया तो डॉक्टर ने कहा कि मेरी आंखें बिलकुल ठीक थी। इतनी ठीक देखने वाली आंखें लाखों में एक आदमी की होती है।
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हर लेखक का अपना दृष्टिकोण भिन्न होता हैं। कविता अलग तरीके से अभिव्यक्त होती है। व्यंग्यकार से तो कई लेखक तौबा करना बेहतर समझते हैं। अरनेस्ट हैमिंग्वे का दिमाग समुद्र की गहराई तक पहुंचता था। मार्क ट्वेन हर जगह अपना विषय खोज लेते थे। प्रेमचन्द ने ग्रामीण जीवन की बारीकियों को और शरत बाबू ने शहरी जीवन तथा मध्यम वर्ग को अपनी दृष्टि से पहचान दी थी। कई लेखक हर चीज को हर बार अलग तरीके से वर्णित करते हैं। एक भाव एक बार ही आता है और खो जाता है।
इससे प्रमाणित होता है कि किताबें नहीं होती तो मस्तिष्क, उसके कार्यकलापों, इच्छाओं, उसकी अपेक्षाओं और विविधताओं की संभवत: पहचान ही नहीं होती। हर ज्ञान की अपनी सीमायें होती हैं और ज्ञान का सही रूप जानने के लिए एक-एक विषय पर कई-कई किताबें पढऩी पड़ती है। कंप्यूटर या इंटरनेट या कहीं भी यह उतना आसान और दत्तचित करने वाला मामला नहीं होता जितना किताब के सहारे संभव होता है।
किताब मनुष्य की अमूल्य धरोहर है। यदि अच्छी जिंदगी जीनी है तो किताबें पढ़ते रहिये, उनके संपर्क में रहते रहिये, उनसे कुछ न कुछ प्राप्त करते रहिये। आपकी प्यास तो बढ़ती जायगी और उसका बराबर बुझना भी जारी रहेगा। जिंदगी कभी सूखेगी नहीं, अन्तिम समय में भी नहीं।
– उपाध्यान चन्द कोचर

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