कार्यस्थल का तनाव, न लाएं घर में

कार्यस्थल का तनाव, न लाएं घर में

husband-hates-and-dislikes-meएक कॉल सेंटर में प्रॉजेक्ट मैनेजर नेहा अग्रवाल ऑफिस वर्क को लेकर गहरे तनाव में रहने लगी थी। उसे घर में किसी का आना जरा नहीं सुहाता था। सास ससुर कभी दो चार दिन को आते तो वो उनकी ऐसी उपेक्षा करती कि वे अपमान महसूस कर चार दिन की जगह दो दिन में ही लौट जाते। पति उसे चाहते थे लेकिन गहरे तनाव के कारण नेहा चाहते हुए भी गर्भ धारण नहीं कर पा रही थी।
लेकिन तान्या मिश्रा जो एक बड़ी कंपनी में एक्जीक्यूटिव थीं, लंबे समय तक काम करने के बावजूद कभी तनावग्रस्त नजर न आतीं। कारण था उनका हंसमुख स्वभाव और घर बाहर को मिक्स अप न करना। घर आकर वे पति और बच्चे के साथ मस्त रहतीं। उनका कहना था ऑफिस की सारी प्रॉब्लम्स, डैडलाइन, टारगेट आदि का प्रेशर मैं वहीं ऑफिस के कमरे के साथ ही लॉक कर आती हूं।
तान्या की तरह हर कोई नहीं कर पाता जो काम के बोझ का बैग घर तक कैरी ना करे। ज्यादातर लोग ऑफिस की टेंशन घर लेकर ही लौटते हैं। वे ‘स्विच ऑन एंड स्विच ऑफ’ का गेम खेलना नहीं जानते। मैनेजमेंट गुरू श्याम जी भगत के अनुसार हम एक संपूर्ण मानव हैं, केवल बॉडी पार्ट्स नहीं। अपनी संपूर्णता सहित ही हम काम से घर लौटकर आते हैं। हम घर की परेशानियां ऑफिस में और ऑफिस की परेशानियां घर लेकर लौटते हैं।
साइकोथिरेपिस्ट्स की मानें तो यह दोहरा दबाव कई तरह के मनोरोगों को जन्म दे रहा है। यही नहीं, बढ़ती इनफर्टिलिटी का भी यह एक कारण है।
रिसेशन के दौर में जॉब असुरक्षा का भय भी व्याप्त है, साथ ही टारगेट, डैडलाइन का निरंतर बढ़ता दबाव जीवन का सुख चैन छीन रहा है।
एच. आर. डी. में एडवाइजर शीनी नरूला के अनुसार कंपनियों की अपनी मुश्किलें हैं क्योंकि दोहरे दबाव के कारण काबिल लोग भी अपना ‘बेस्ट रिजल्ट’ नहीं दे पा रहे हैं। पूरा वर्क कल्चर ही इस दुष्चक्र की गिरफ्त में आ गया है।
बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इनसे निपटने के लिए प्लानिंग शुरू कर दी हैं जिसके चलते ‘ध्यान और योग’ शिविर तथा कई तरह के कोर्सेज का आयोजन होने लगा हैं। रेडिफ्युजन, इनफोसिस, पेप्सी, जीई जैसी बड़ी कंपनियां इस मामले में काफी सतर्क और एक्टिव हैं। तनाव और मानसिक दबाव कम करने के लिए वे प्रतिमाह कोई न कोई सेमिनार आयोजित करती हैं।
अगर दफ्तर में बॉस खड़ूस हो, तब हालात मुश्किल हो जाते है। दस- विदानिया (अलविदा) फिल्म में इसे बखूबी दर्शाया गया है। सबऑर्डिनेट हमेशा टेंशन में रहकर दिवास्वप्न देखा करता है कि वो बॉस का कैसे प्रतिकार करता है। इससे काफी हद तक व्यक्ति चैन और सुकून पा लेता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।
जापान में इसी थ्योरी पर काम करते हुए कई दफ्तरों में बॉस के पुतले कमरे में लगाकर रखे हैं जहां जाकर कर्मचारी घर जाने से पहले उन पर घूंसे बरसाकर मन का गुबार निकाल लेते हैं। इससे वे बिना दबाव के घर पहुंचते हैं। उनका पारिवारिक जीवन दफ्तर के कार्यबोझ के तनाव के कारण उथल पुथल से नहीं गुजरता। यह वास्तव में एक चौंकानेवाला तथ्य है लेकिन है काफी पॉजिटिव रिजल्ट देनेवाला इसमें शक नहीं।
जेट सी तेज रफ्तार और आपा धापी के इस माहौल में भी कई ऐसे लोग हैं जो परिवार और काम के बीच बेहतर प्रबंधन को अंजाम देते हुए अधिक प्रेशर और टेंशन से बचे रहते हैं।
अब एडवेंचर ट्रैवल एजेंसी के निदेशक सर्वेश मेहता को ही लीजिए। उन्हें अपने काम से लम्हे भर को आराम नहीं मिलता लेकिन वे फिर भी दो तीन महीने में कुछ दिन की छुट्टी अपने परिवार के साथ जरूर बिताकर परिवार के साथ अपनी भी बैट्री रिचार्ज कर लेते हैं जो कि उनके अनुसार आगे कस कर काम करने के लिए मस्ट है।
परिवार के जो लोग अंडरस्टैंडिंग होते हैं, काम के दबाव को समझते हुए व्यक्ति के मनोविज्ञान व मनस्थिति की जानकारी रखते हैं, वे शिकायतों का बंडल नहीं बनाते। उनके घर में कलह नहीं होती। फिर भी उनकी चाहतों का तथा अपना भी भला देखते हुए कुछ मौज मस्ती उनके साथ टाइम टू टाइम रेग्युलरली जरूरी है।
ञ्च उषा जैन ‘शीरीं’

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