कारपोरेट राक्षसों के चुंगल में फंसती जा रही है मोदी सरकार

कारपोरेट राक्षसों के चुंगल में फंसती जा रही है मोदी सरकार

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भारत सरकार ने केशलेस व्यवस्था लागू करने कमर कस ली है। सैकड़ों वर्षों में नगद लेन-देन की व्यवस्था को नोटबंदी के एक झटके से बदलने का काम केन्द्र सरकार करना चाहती है। इसके परिणामों को लेकर शायद सरकार ने गंभीरता से विचार नहीं किया है। यदि विचार किया होता तो इसे लागू करने के लिए सरकार इस तरह का हठ नहीं करती। आदतों को बदलना आमान नहीं होता है। वर्षों जिस तरह की जीवन शैली में व्यक्ति जीवन-यापन करता है। यह उसके नशे में परिवर्तित हो जाती है। यह आदत आसानी से छूटती नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नगद लेन-देन की आदत रातों-रात छुड़ाना चाहते हैं, यह संभव नहीं है। सरकार ने वर्तमान में केशलेस व्यवस्था के लिए जो दबाब बनाया है। सही मायने में सरकार ने भी इसके लिए तैयारी नहीं की है। केन्द्र सरकार की जल्दबाजी से जैसे नोटों को लेकर लाइनें लग रही है। उसी तरह भुगतान और लेन-देन में आम आदमी को भविष्य में इसी तरह की परेशानी हुई तो जनता का आक्रोश सड़कों पर विकराल रूप ले सकता है।
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देश में इंटरनेट की व्यवस्था काफी दयनीय स्थिति है। जिस रिलायंस जियो की दम पर केन्द्र सरकार ने हुंकार भरी है। उस रिलायंस जियो का 4 जी नेटवर्क जगह-जगह बैठ गया है। इसकी स्पीड धूप-छांव की तरह घटती-बढ़ती रहती है। अन्य टेलीकाम आपरेटरों की भी लगभग यही स्थिति है। इंटरनेट नेटवर्क को बेहतर बनाए बिना सरकार ने करोड़ों लोगों के लेन-देन इंटरनेट के माध्यम से कराने का जो सपना संजोया है। उसे आम जनता मजबूरी में भले स्वीकार भी कर ले। किन्तु टेलीकाम कंपनियों की इंटरनेट स्पीड के कारण स्थिति विकराल हो सकती है। अभी भी बैंक और एटीएम के सर्वर कई-कई घंटो बंद रहते हैं। रेलवे के रिजर्वेशन पोर्टल आईआरटीसी को छोड़ दें तो केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के पोर्टल दिन में कई बार बंद हो जाते हैं। इस स्थिति में यदि सभी लेन-देन इंटरनेट के माध्यम से होंगे तो इसके लिए इंटरनेट की स्पीड और कम्प्यूटर हार्डवेयर और साफ्टवेयर बेहतर स्थित में होना चाहिए थे। जो वर्तमान में नहीं है। देश के लाखों गांवों तक अभी भी इंटरनेट की सुविधा नहीं पहुंची है। इस स्थिति में प्रधानमंत्री यह जोखिम उठा रहे हैं। जो यह उनका दुःसाहस की कहा जाएगा।
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भारत पिछले 50 वर्षों से यूरोप की नकल कर रहा है। इन 50 वर्षों में सबसे ज्यादा असर पिछले 20 वर्षों में देखने को मिला है। वैश्विक व्यापार संधिकरण के बाद सारी दुनिया की सोच में भारी परिवर्तन आ गया है। किन्तु यह सोच कार्यरूप में भारत में 15 फीसदी इसका असर नहीं है। टेलीविजन और इंटरनेट की चकाचोंध ने युवा पीढ़ी की सोच और नकल को अपनाने प्रेरित जरूर किया है। किन्तु भारतीय सामाजिक, आर्थिक धार्मिक व्यवस्था की सोच और आदतों में ज्यादा फर्क नहीं आया है। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने भी पिछले 15 वर्षों में बढ़ी हुई आय और कर्जों से सपने देखने और दिखना शुरू कर दिया है। किन्तु यह सपने आसानी से पूरे नहीं हो सकते हैं। केन्द्र एवं राज्य सरकारों की सोच और कार्यप्रणाली कई दशकों पुरानी है। आज भी जो नियम कानून प्रचलित है वह भ्रष्टाचार एवं कालेधन का सृजन करने वाले हैं। नोट बंद होने के बाद भी जिन कारणों से रिश्वत भ्रष्टाचार और कालेधन का खेल चल रहा था। वह बंद भी होगा। उसमें मोदी जी की कार्यप्रणाली से कारपोरेट जगत अब सफेद धन को काले धन में परिवर्तित करने का काम करेंगे। निचले स्तर का भ्रष्टाचार जरूर कम हो सकता है। कारपोरेट भ्रष्टाचार दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा जो नियम एवं कानून बनाये गए हैं। उनमें पग-पग में आम आदमी की जीवन शैली और आर्थिक बदहाली सरकार नियम कानूनों के बंधन में जनता कसमसा रही है।
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रिलायंस जियो, पेटीएम बैंक, स्क्राइप मशीनों के माध्यम से करोड़ों लोगों की नियमित जीवन शैली में पल-पल प्रभाव पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इन कंपनियों से अपने आपको प्रत्यक्ष रूप से जोड़ लिया है। यह देश में पहली बार हुआ है। नोटबंदी के पूर्व भी बैंक के ग्राहक एटीएम और बैंकों के सर्वर ठप्प होने से परेशान थे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली किसी भी राज्य में सफलतापूर्वक संचालित नहीं हो रही है। जिसके कारण आम जनता परेशान है। टेलीकाम कंपनियां वर्ष 2004 से ब्राड बेंड और इंटरनेट में 256 केबीपीएस की स्पीड देने का वादा कर रही हैं। 12 वर्ष के सफर में 2जी, 3जी, और 4जी के बाद भी इंटरनेट पर एमबी तो छोड़े केबीपीएस पर भी इंटरनेट की स्पीड नहीं मिलती है। इस स्थिति में करोणों लोगों के द्वारा दिन में कई बार भुगतान करने से देश इंटरनेट नेटवर्क तथा अर्थव्यवस्था के ठप्प होने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। पिछले 20 वर्षों में केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने खरबो रूपया ई कामर्स, ई-गर्वमेंट और डिजिटल इंडिया बनाने के कार्यक्रमों पर खर्च कर दिए है। किन्तु आज भी सरकारी सेवाओं का भगवान मालिक है। सर्वर अधिकांश समय बंद रहते है। किसी सरकारी अधिकारी या विभाग की कोई जिम्मेदारी नहीं है। रिलायंस जियो जैसी कंपनियां ग्राहकों से धोखाधड़ी करती है। 4जी नेटवर्क पर वायदा तो 15 से 20 एमबी की स्पीड देने का दावा करती है। आधा एमबी की स्पीड भी नहीं मिलती है। ऐसे में जब करोड़ों लोग रोजाना कई बार डिजिटल भुगतान के लिए इंटरनेट से जुड़ेंगे। तब क्या स्थिति बनेगी। मोदी जी जरा इस स्थित पर निष्पक्ष तकनीकि विशेषज्ञों से राय ले लें। कारपोरेट जगत राक्षस की तरह है। इसकी भूख कम होने के स्थान पर दिनों-दिन बढ़ती है। पिछले एक दशक में आम आदमी की आर्थिक स्थिति कम हो रही है। वहीं कारर्पोरेट जगत की आर्थिक स्थिति दिन दूनी और रात चौगुनी की गति से बढ़ रही है। जितना ज्यादा कारर्पोरेट जगत खाता है। उतनी ही उसकी भूख बढ़ने लगती है। मोदी सरकार को कारर्पोरेट राक्षसों से स्वयं बचते हुए आम जनता को बचने की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
-सनत जैनadd-royal-copy

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