काबू में करें खांसी

काबू में करें खांसी

khansiयूं तो खांसी किसी भी मौसम में हो सकती है किंतु बरसात में होने वाली खांसी कुछ अधिक ही कष्टदायी हुआ करती है। शैशवावस्था से वृद्धावस्था तक के किसी भी व्यक्ति को यह हो सकती है। अगर देखा जाय तो खांसी स्वयं में कोई बीमारी न होकर ऐसी कई बीमारियों की लक्षण हो सकती है जो गले, फेफड़ों या वायुनलिकाओं को प्रभावित करती हैं।
जब श्वांस नली पर कोई बाधा या संक्र मण (निमोनिया एवं श्वास नली शोथ) श्वास में धूल, रसायन, बहुत शीतल या गरम वायु जाये तो भी खांसी होने लगती है। वर्षा में अधिक भीग जाने के कारण भी गले में खराश उत्पन्न होकर खांसी प्रारंभ हो जाती है।
खांसी की वजह क्या है, यह जानना सबके लिए जरूरी है। इसके बारे में पूरी बातें जानने के लिए निम्नांकित प्रश्नों को जवाब जानकर हम स्वयं उसके मूल तक पहुंच सकते हैं।
– क्या खांसी का जोर अधिक है अथवा वह थोड़ी-थोड़ी देर बार उठ रही है?
– क्या खांसी के साथ बुखार भी है?
– क्या खांसी के साथ थूक या बलगम भी आता है? इसका रंग-गंध कैसा है?
– क्या थूक के साथ खून भी आता है?
सर्दी, जुकाम या फ्लू के कारण खांसी हो रही हो, फेफड़ों से कृमि गुजर रहे हों तो खांसी के साथ बलगम या तो नहीं आता है या फिर थोड़ा बहुत आता है। श्वासनली शोथ (ब्रांकाइटिस) निमोनिया, फेफड़े का व्रण, या ब्रांकाइएकटैसिस के कारण होने वाली खांसी में बलगम अवश्य ही निकलता है।
दमा, काली खांसी, डिप्थीरिया, हृदयरोग, गले में अटकन, वात स्फीति (एम्फीसीया) के कारण होने वाली खांसी में घरघराहट या खाय-खाय की आवाज या सांस लेने में कठिनाई होती है। तपेदिक, धूम्रपान, दीर्घकालीन श्वासनली शोथ, दमा आदि की खांसी को दीर्घकालीन, खांसी माना जाता है। सर्दी, जुकाम, पानी में भीगने, वातावरण की आर्द्रता के कारण होने वाली खांसी को साधारण खांसी माना जाता है।
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आमतौर पर देखा जाता है कि लोग प्राय: खांसी होते ही दवाइयां लेनी शुरू कर देते हैं। प्राय: वे ऐसी दवाइयां लेते हैं जो बाहर निकलने वाले बलगम को सुखा देती हैं। यह एक हानिकारक उपाय हो सकता है। इतना ध्यान अवश्य रखें कि जो दवाइयां खांसी को शांत करती हैं, वे लाभ पहुंचाने के बजाय नुक्सान भी पहुंचा सकती हैं क्योंकि वे बलगम और जीवाणुओं को शरीर से बाहर नहीं निकलने देती हैं, इसलिए खांसी होते ही ऐसी दवाइयां लेनी चाहिए जो कफ को ढीला करके बाहर निकालने में सहायता करे। अगर खांसी होते ही पानी की मात्रा अधिक बढ़ा दी जाए, तो बलगम ढीला होकर निकलने लगता है। बलगम निकालने का इससे बेहतर कोई उपाय या दवा हो ही नहीं सकती। पानी में भीगने से अगर खांसी हो गई हो तो कुर्सी पर बैठ कर गर्म पानी से भरी बाल्टी को पांवों के पास रखें। अगर चाहें तो इस उबले पानी में विक्स, टिंचर बेजाइन या पुदीने के पत्तों को भी कुचलकर डाल सकते हैं। वैसे गर्म पानी की भाप ही स्वयं में काफी होती है। अपने सिर पर एक पतला सूती कपड़ा रख लें जो बाल्टी के मुंह को भी ढक सके। बाल्टी से उठने वाली भाप सीधे आपकी नाक और मुंह तक पहुंचेगी। लगभग पंद्रह मिनट तक इसी प्रकार बैठे रहकर गहरी-गहरी श्वांस लें ताकि भाप श्वांस द्वारा अंदर तक पहुंचकर बलगम को ढीला कर दे। इस क्रि या को दिन में दो-तीन बार तक किया जा सकता है। अगर दमा के मरीज इस भाप को ग्रहण कर रहे हों तो उन्हें पानी में विक्स आदि नहीं डालना चाहिए अन्यथा उनकी हालत और अधिक बिगड़ सकती है।
अगर ऐसी सूखी खांसी हो रही हो जो रात में सोने न दे तो इस स्थिति में शहद एक चम्मच में नींबू का रस एक चम्मच मिलाकर दिन में पांच बार तक किसी भी आयु के रोगी को दिया जा सकता है। गले में खसखसाहट होने पर इसमें आधा चम्मच अदरक का रस गर्म करके मिलाया जा सकता है। अगर खांसी कुकुर खांसी (हूपिंग कफ) का रूप ले ले तो एक पके हुए अमरूद को गर्म रेत या राख में रखकर सेंक लें और सिंकने के बाद गर्म-गर्म रोगी को खाने को दें। इससे कुकुर खांसी अवश्य ही रूक जाएगी।
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अदरक के रस को बराबर मात्रा में नींबू, तुलसी एवं शहद के साथ मिलाकर रोगी को दिन में तीन बार तक देते रहने से खांसी, सर्दी, बुखार के साथ शरीर के दर्द में भी राहत मिलती है। अगर पानी में भीगने के कारण आने वाला बुखार न उतरे तो तुलसी, काली मिर्च (गोलकी) तथा नींबू का रस मिलाकर काढ़ा बनाकर रोगी को गर्म-गर्म पिला दें। पुदीना और अदरक का काढ़ा पिलाने से भी बुखार उतर जाता है। काढ़ा पिलाने के बाद रोगी को लगभग एक घंटे तक बिस्तर पर लेटकर आराम करना चाहिए।
फ्लू के बुखार में प्याज का रस एक चम्मच की मात्रा में दिन में तीन-चार बार तक पिलाना चाहिए। लहसुन की कली पाच से दस ग्राम तक काटकर तिल के तेल या घी के साथ तलकर सेंधा नमक मिलाकर दिन मे एक बार ही खिला देने से वर्षा के बुखार से राहत मिल सकती है। अगर आंखें लाल-लाल हो जाएं और नाक से पानी निकलने के साथ ही बुखार भी हो तो तुलसी और सूर्यमुखी के पत्तों के रस को दो चम्मच की मात्रा में दिन में एक बार तीन दिनों तक लेते रहने से शर्तिया लाभ होता है।
– आनंद कुमार अनंत

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