कहीं आपका बच्चा अंतर्मुखी तो नहीं…?

कहीं आपका बच्चा अंतर्मुखी तो नहीं…?

मनुष्य का व्यक्तित्व उसके बचपन में ही बन जाता है और बाद में उसका केवल विकास ही होता है। व्यक्तित्व के विकास में बाल्य अवस्था के संस्कारों व आदतों आदि का इतना अधिक महत्त्व होने के कारण पारिवारिक स्थिति का बड़ा महत्त्व होता है। बालक परिवार से बहुत कुछ सीखता है। तरह-तरह के कामों को वह परिवार के बड़े सदस्यों का अनुकरण करके सीख जाता है।
माता पिता बालक के सामने आदर्श के रूप में होते है। वे ही बालक को संरक्षण देते हैं। विशेषकर पिता अधिक शक्तिशाली समझे जाते हैं और कामों को भली प्रकार कर पाते हैं, इसलिए बालक अचेतन अवस्था में ही पिता से तादातम्य कर लेता है। वह पिता जैसा बनना चाहता है। देखा जाता है कि छोटा लड़का अपने पिता के कपड़े पहनकर या उनकी छड़ी लेकर उनकी तरह चलने का नाटक करता है। इस प्रकार माता पिता को स्वयं अनैतिक कार्य में लिप्त रहते हुए बालक को उस काम से रोकना बड़ा कठिन होगा क्योंकि बालक यह समझता है कि जब माता पिता उस काम को करते हैं तो वह अवश्य किया जाना चाहिए। कभी-कभी माता-पिता बच्चों के प्रति व्यवहार में भेदभाव दिखलाते हैं। वे किसी बालक को तो अत्यधिक प्यार करते हैं और दूसरों को झिड़कते रहते हैं। सुंदर बालक प्यारा होता है और कुरूप को सदैव झिड़का जाता है। इस भेदभाव के चाहे जो भी कारण हों, इससे बालकों के मन में एक दूसरे के प्रति द्वेष उत्पन्न हो जाता है। जब बालक देखता है कि उसकी अपेक्षा उसके भाई या बहन को अधिक लाड़ प्यार मिलता है तो उसमें निराशा व असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो जाती है। इसके अतिरिक्त पति पत्नी के आपस में क्लेश झगड़े आदि से घर में असुरक्षा का वातावरण बनता है जो बालक के व्यक्तित्व के विकास के लिए बड़ा ही घातक है। पति पत्नी के आपस के संबंध अच्छे होने से बालकों के सामने अच्छा आदर्श उपस्थित होता है और वे स्वयं अच्छे बनने का प्रयास करते हैं। माता पिता के नैतिक विचारों और आचारों का भी बालक के व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे उसके सामने आदर्श के रूप में होते हैं। मिस इलियट के अध्ययन के अनुसार यदि परिवार में माता वेश्यावृत्ति में लिप्त हो तो उसकी लड़कियों को भी उसका अनुकरण करने में संकोच न होगा और वे भी व्यभिचार की ओर बढ़ेंगी। ये सभी पारिवारिक कारण व्यक्तित्व के विकास में पर्याप्त भूमिका निभाते हैं, अत: इन कारणों को दूर करके आप अपने बच्चे को एक दिशा प्रदान कर सकते हैं।
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बच्चों को नैतिक बनाने के लिए सबसे पहले माता-पिता को उसके सामने अपने व्यवहार द्वारा आदर्श उपस्थित करने चाहिए। स्वयं अनैतिक कार्यो में लिप्त रहते हुए भी बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना दिवा स्वप्न के समान होगा। व्यक्तित्व के विकास के लिए अनुशासन का भी पर्याप्त योगदान होता है, लेकिन बालक में अनुशासन उत्पन्न करने के लिए बड़ी समझदारी की जरूरत है। इसके लिए सही संतुलन और माहौल का होना अति आवश्यक है। माता पिता के अतिरिक्त अन्य सदस्यों का व्यवहार भी बच्चों का व्यक्तित्व निर्धारण करता है। यदि घर के लोगों का व्यवहार बच्चों के प्रति स्नेहिल है तो उसके व्यक्तित्व पर भी इन गुणों का असर निश्चित रूप से होगा। घर परिवार के अतिरिक्त पास पड़ोस,गांव मुहल्ला, कॉलेज तथा समाज का भी प्रभाव बच्चों के व्यक्तित्व पर पड़ता है। यदि सामाजिक माहौल उत्तम है तो बालक सामाजिक, मिलनसार तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व का होगा परन्तु यदि सामाजिक माहौल अच्छा नहीं है तो बालक अत्यधिक आत्मकेन्द्रित, एकान्तप्रिय तथा अंतर्मुखी व्यक्तित्व का हो जाता है।
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कभी-कभी तो वह अपराध की ओर से उन्मुख हो जाता है। यदि बच्चों को उपर्युक्त माहौल मिल रहा है तो समझिए कि उसकी विकास प्रक्रिया सही है। इस प्रकार यह माता पिता के ऊपर पूरी तरह से है कि वह जैसे बच्चों की देखभाल करेंगे, उसी तरह से उनका व्यक्तित्व भी विकसित होगा। अत: माता पिता को यह चाहिए कि वह बच्चों को हर तरह का चाहे वह पारिवारिक माहौल हो या पास पड़ोस का या फिर स्कूल या समाज का, ऐसा स्वस्थ माहौल दें जिसमें बच्चा रहकर स्वयं को कुंठित न महसूस करे और हर तरह की आवश्यकता, स्वतन्त्रता एवं स्वच्छन्दता उसे मिले जिससे वह समाज में अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर सके।
– उमा शंकर

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