कहानी- युवतियों में भी है आगे बढऩे की क्षमता

कहानी- युवतियों में भी है आगे बढऩे की क्षमता

girl-with-bookअमित ने घर में कदम रखते ही कहा मीना जल्दी से तैयार हो जाओ हॉस्पिटल चलना है। आदतन मैंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी क्यों? क्या हुआ? कौन बीमार है? आदि।
मिस्टर जायसवाल की लड़की ने ढेर सी स्लीपिंग पिल्स गटक ली है। हे भगवान ये आजकल की लड़कियां। अभी कुछ दिन पहले ही तो मल्होत्रा की जवान लड़की पंखे पर लटक गई थी। बात कोई ऐसी खास भी न हुई थी भाई-बहन में कुछ झड़प होने पर मां ने भाई का पक्ष लेते हुए अपनी बेटी गीता को डांट दिया था। मीना बात सिर्फ छोटी-सी ही नहीं रही होगी। बात की तह में जाकर देखों तो न जाने कितने समय से उस लड़की में क्षोभ, आक्रोश फ्रस्ट्रेशन घुमड़ रहा होगा। यह उसी का चरम परिणाम समझो। जब तक घर परिवारों में लड़कियों को बेवजह दबाया जायेगा लड़कों को लेकर उनसे पक्षपात किया जाएगा। लड़कियां दुखी होकर अपना विद्रोह यूं ही प्राणों की आहुति देकर जताती रहेंगी। फिर भी समाज के कानों पर जूं नहीं रेंगती।
अब मिस्टर जायसवाल के यहां ही देख लो। उनकी बेटी गोल्ड मेडलिस्ट, इतनी कुशाग्र बुद्धि, प्रतिभाशाली लड़की है। मेडिकल में जाने का सपना वह बचपन से देखती आई है लेकिन जायसवाल पुराने विचारों का आदमी हैं। कहता है जब पढ़-लिखकर भी बनानी रोटियां ही है तो समय और पैसे की बर्बादी क्यूं की जाए। इसी बात पर लड़की को मारा धमकाया होगा। तैश में आकर लड़की ने आत्महत्या का प्रयास किया। जायसवाल की अगर बेटी की जगह बेटा इतना कुशाग्र बुद्धि का होता या सामान्य या उससे भी कम होता तब भी वे उसे आगे पढ़ाते क्योंकि वह उनके बुढ़ापे की लाठी हो होता। आम भारतीय परिवार इसी सोच में जकड़ा हुआ है।
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बदलते समय के साथ अगर ऐसे परिवार अपनी सोच में परिवर्तन लायें तो देखेंगे कि लड़कियां भी पढ़-लिखकर योग्यता में लड़कों से कम सिद्ध नहीं होंगी। जरूरत है अपने को संकीर्ण दायरे से निकालने की। अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की।
राठौर दम्पत्ति के यहां तीन बेटियां हैं। बेटा न होने का गम मिसेज राठौर के मन में ऐसा समा गया था कि तीसरी बेटी होने के बाद वे गहरे डिप्रेशन से ग्रस्त रहने लगीं। जीवन में उन्हें जैसे किसी बात का चाव ही नहीं रह गया था। लेकिन समय बीतने पर एक लड़की एस.पी. दूसरी पायलट और तीसरी आई.एफ.एस. में आकर दूतावास में अधिकारी बन गई। बुढ़ापे में जो ऐश वे बेटियों की बदौलत कर रहे हैं क्या लड़के होते तो इससे ज्यादा करते? बल्कि कपूत निकलने पर धन के लिए अगर बेटा बाप के प्राण भी ले ले तो इस युग में कोई आश्चर्य नहीं लेकिन कभी किसी बेटी को मां-बाप का प्राण लेते नहीं सुना।
लड़की के लिए भी आज स्वावलम्बी होना उतना ही अहम है जितना लड़के के लिए। दहेज की समस्या सुलझाने के लिए भी यह कारगर उपाय है। अपने पैरों पर खड़ी लड़की सिर उठाकर जी सकती है। ससुराल में होने वाले अत्याचारों का मुकाबला कर सकती है। प्रतिभा बचपन में अपने नाम के अनुरूप प्रतिभाशली थी। उसकी योग्यता देखते हुए मां-बाप ने उसे उच्चे शिक्षा दिलवायी। उसने चंडीगढ़ में आर्किटैक्चर का कोर्स कर लिया। मां-बाप ने अमीर घर देखकर एक पुरातनपंथी व्यवसाय करने वाले संयुक्त परिवार में प्रतिभा को ब्याह दिया। हीरे-जवाहरात की चकाचौंध ने उनकी सोच को अंधा कर दिया था। छुआछूत अनेक तरह की पांबंदियां और लेन-देन को लेकर घर भर के तानों ने प्रतिभा का सुख चैन से जीना मुश्किल कर दिया। नतीजन वह उदास रहने लगी। पति ने भी साथ नहीं दिया। धीरे-धीरे उसका मनोबल गिरने लगा अपने पर जैसे उसे विश्वास न रहा। बेटी हो जाने पर उसे और भी ज्यादा प्रताडि़त किया जाने लगा।
एक दिन उसके बदचलन जेठ ने मां की झूठी शिकायतें सुनकर उस पर हाथ उठा दिया। यह घटना प्रतिभा के जीवन में मोड़ ले आई। वह उसी दिन मां-बाप के घर लौट आई। उसकी पढ़ाई काम आई। घर में ही उसने अपना ऑफिस खोल लिया। शहर में इन दिनों नई कॉलोनी बन रही थी। प्रतिभा के बनाये मकानों के नक्शें लोगों को पसंद आ रहे थे। उसका काम तेजी से चल निकला। शोहरत और पैसा दोनों थे। सुसराल वालों को अपनी गलती का अहसास हुआ। और जब पति सुनील ने उसे मॉफी मांगकर वापस लौट चलने का अनुरोध किया, प्रतिभा मान गई क्योंकि अब उसमें पूर्ण आत्मविश्वास आ चुका था। उसे मालूम था अब किसी की उसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं है।
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आज आवश्यकता है कि समाज में स्वयं लड़कियां अपनी क्षमता को पहचानें। लड़कियां अपने में आत्मविश्वास पैदा करें ईश्वर ने उन्हें लड़कों से कमजोर सिर्फ शारीरिक रूप से ही बनाया है मानसिक तौर से नहीं। अब यह कहावत कि औरतों के दिमाग की ऊपरी मंजिल खाली होती गलत सिद्ध हो चुकी है। हालांकि व्यवस्था ने उनकी भलाई के लिए कई कानून पास किए हैं। उनके अधिकारों के लिए कई महिला संगठन कार्यरत हैं। फिर भी लड़कियों की इज्जत पर हमला होता है कुछ दिन अखबारों में इधर-उधर आवाज उठाई जाती हैं और कुछ दिन बाद केस खारिज अपराधी बगैर सजा छोड़ दिये जाते हैं। कानून उन्हें क्या देता है यह देखने के बजाय युवतियां अपने अस्तित्व की ओर से सचेत हों वह उनके हक में ज्यादा ठीक होगा। खोखले कानून या उपहार प्रदत्त अधिकारों से कुछ नहीं होने वाला। लड़कियों को आगे बढ़कर अपनी क्षमता सिद्ध करके ही पुरुष वर्ग का अहम्, उनका अहंकार तोडऩा है।
ठुकराये जाने, प्रताडि़त किए जाने या प्राण लिए जाने की कोशिशें देखकर ही लड़कियों को अपनी क्षमता दिखाने की सूझती है कई बार ऐसा क्यों? क्यों नही पहले ही वे अपनी क्षमता को पहचान लेती है।
आज कौन-सा ऐसा क्षेत्र है जहां लड़कियां काम नहीं कर रहीं बल्कि वे पुरुष से ज्यादा कुशलता से कार्य कर रही हैं।
अपनी क्षमता से वे कई घरों में घर-परिवार का सारा बोझ तक उठा रही हैं। फिर कैसे अब कोई कह सकता है कि लड़कियां लड़कों से कम हैं। कई बातों मे ंवे उनसे पीछे हैं यह कहना सरासर गलत होगा। उनमें आगे बढऩे की पूर्ण क्षमता है।(प्रेम फीचर्स)
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