कहानी- महा-आत्मा की समाधि का रहस्य

कहानी- महा-आत्मा की समाधि का रहस्य

 बेचारे दीनू बन्जारे की दशा उसके नाम की भांति ही बड़ी दीन थी। एक तो भाग्य का मारा जिस्मानी रूप से पतझड़ का पौधा था, तिस पर कोई काम न धंधा। भूखों मरने की नौबत हरदम बनी रहती। मांग कर किसी शाही दिल परिवार से कभी कभार एक दो बासी रोटियां मिल जाती तो पेट भर लेता। एक दिन मंगतों जैसी अपनी जिंदगी से तंग आकर उसने मरने की सोची। तभी उसे किसी राहगीर की बातों से पता चला कि साथ के ही गांव में किसी महात्मा की समाधि है। वहां सच्ची श्रद्धा और ह्नदय से मांगने पर सभी मुरादें पूरी ही जाती हैं।
बस, वह गिरता-पड़ता पहुंच गया उस महात्मा की समाधि पर। बड़े ही रमणीक स्थान पर स्थापित थी वह समाधि…..चारों ओर लोगों का मेला लगा हुआ था। समाधि के साथ एक हट्टे-कट्टे साधु-बाबा बैठे लोगों को आशीर्वाद और बताशों का प्रसाद बांट रहे थे। सैंकड़ों की तादाद में आ रहे श्रद्धालु समाधि पर रूपये-पैसों के अलावा फल-फूल, मेवे, मिठाईयां, दूध तथा अन्य अनेकों पदार्थ चढ़ा रहे थे। जिन लोगों की मन्नतें मुरादें पूरी हो चुकी थी, वे एक संगमरमर के चौबच्चे में शराब के पव्वे, अद्धे और बोतलें उढ़ेल रहे थे। एक अजीब सा मदहोश कर देने वाला माहौल।
घबराया हुआ दीनू बन्जारा समाधि पर सिर रख कर रोता हुआ बिलबिलाने लगा कि हे प्रभु, मेरे पूर्व जन्म के सभी पाप-गुनाह बख्शो और इस जन्म की मेरी टूटी फूटी बेड़ी पार लगा दो।
श्रद्धालु आ रहे थे-जा रहे थे मगर वह था कि सिर्फ रोता ही जा रहा था। आखिर जब काफी देर बीत जाने पर भी वह वहीं जमा रहा तो साधु-बाबा ने बड़े स्नेह व अपनत्व से उसके कंधे पर अपना हाथ धरते हुए कहा, ‘बच्चे, तू सचमुच काफी दु:खी और परेशान दिख रहा है। बोल क्या कष्ट है तुम्हें……प्रभु तेरा हर संकट दूर करेंगे।
दीनू ने बिना रूके तुरन्त अपनी सारी करूणा भरी व्यथा कह सुनाई। तब साधु बाबा ने मुस्कराते हुए कहा, ‘बस, अब रो मत। समझ ले तेरा कल्याण हो गया। जा, वह सामने चर रहा गधा अपने साथ ले जा। लोगों का सामान ढो कर पैसे कमा और अपनी रोजी-रोटी चला।
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बात दीनू के पल्ले पड़ गई और वह खुशी-खुशी गधा लेकर अपने ठिकाने पर आ गया। अब वह रोज रेलवे स्टेशन जाता। यात्रियों का समान ढोता और पैसे कमाता। इस प्रकार हंसी खुशी उसके दिन बीतने लगे।
मगर हाय रे भाग्य की विडम्बना। अभी मुश्किल से दो महीने ही बीते थे कि एक दिन उसका संगी-साथी, उसकी रोजी-रोटी का एक मात्रा सहारा वह गधा बीमार हुआ और मर गया। बेचारे दीनू के एक बार फिर बेचारगी के दिन आ गए। उसके दु:ख की कोई सीमा न थी। आखिर रोते-रोते उसने कच्ची सड़क के किनारे गधे को दफनाने के लिए गड्ढ़ा खोदा। गधे को दफना कर जब वह मरियल सा जिस्म लेकर उठने लगा तो उसकी जोरदार रूलाई फूट गई और वह धड़ाम से गड्ढे पर गिर कर रोने लगा।
उसका दिल चाह रहा था कि इसी तरह पड़ा-पड़ा रो-रो कर वह अपने प्राण त्याग दे। तभी सामने से आते ही राहगीरों ने उसे इस अवस्था में देखा तो उन्होंने सोच लिया कि वह किसी महा-आत्मा की समाधि है। कहीं बिना माथा टेके निकल जाने से पाप न लग जाए, इस भय से उन्होंने बड़ी श्रद्धा से माथा टेका, कुछ पैसे चढ़ाए और आगे बढ़ गए। उनको माथा टेकते और पैसे चढ़ाते पीछे से आ रहे कुछ अन्य राहगीरों ने भी देखा। अब क्या था…..! देखा-देखी श्रद्धालुओं की संख्या दिन प्रति दिन बढऩे लगी। असमंजस भरी मनस्थिति लिए दीनू बंजारा पहले कुछ समय तक तो अवाक् रहा। फिर उसने तुरंत एक झण्डा लाकर वहां गाड़ दिया।
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बुजुर्गों का कथन है कि मनुष्य के दिन फिरते देर नहीं लगती। दीनू बन्जारे के दिन भी फिर गए। अब उसके गधे की कब्र के पास एक शानदार कुटिया थी। खाने-पीने यानी हर चीज की मौज हो गई। बस अब ठाठ और सिर्फ ठाठ थे। लोगों में अपने आप ही पता नहीं कैसे यह मशहूर हो गया कि महा-आत्मा की यह समाधि बड़ी अलौकिक है। सच्ची श्रद्धा से मांगने पर सब कुछ मिलता है, सब कुछ।
दिन बीतते गए। दीनू बंजारा अब बाबा जी महाराज हो गए थे। दीनू का पूरा विश्वास था कि सारा प्रताप उस समाधि में विलीन महा-आत्मा का है जहां उसने माथा टेका था और आशीर्वाद के रूप में उसे गधा मिला था।
एक दिन अचानक ही उस समाधि की देख-देख करने वाले साधु बाबा उधर आ निकले। दीनू देखते ही भाग कर उनके कदमों में लोट-पोट हो गया। पूछने पर उसने सारी राम कहानी साधु बाबा को कह सुनाई। सुन कर वह ठहाका मार कर हंस पड़े और हंसते ही चले गए। फिर व्यंग्यात्मक स्वर में बड़े रहस्यमय ढंग से बोले, ‘बच्चे! प्रभु की लीला बड़ी अपार है। जानते हो, जिस समाधि की मैं देख-भाल कर रहा हूं वह किस की है?
‘नहीं, महाराज।
‘सुनो, वह इस गधे की मां की है। साधु बाबा ने भेद खोला।
दीनू अवाक् था।
– गुरिन्द्र भरतगढिय़ा

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