कहानी-बहरूपिया

कहानी-बहरूपिया

लाला पीतांबरलाल धरमपुरा रियासत के वैसे ही धुरंधर बुद्धिमान और हाज़िर जवाब विद्वान थे जैसे कि अकबर के दरबार में बीरबल और कृष्णदेवराय के दरवार में तेनालीराम। उनकी तुलना नाना फड़नवीस से भी की जा सकती है। रियासत के राजा शिवपाल बड़े ही धार्मिक प्रवृत्ति के राजा थे। याचक को यथा शक्ति दान देना उनके कर्तव्य में शुमार था। किसी को वे निराश अपने दरवार से वापिस नहीं जाने देते थे।
एक आर एक गरीब सा दिखने वाला आदमी दरवार में आया और कहने लगा मुझे खाना चाहिये। राजा ने अपने सिपाही से कहा कि इसे राज भोजनालय में ले जाकर खाना खिलवा दें। वह व्यक्ति बोला “राजन मैं ऐसा खाना नहीं खाता,मुझे अपने देश का ही खाना चाहिये।
“आप किस देश से पधारे कृपया बताने का कष्ट कर्रॆं। “राजा ने पूछा।
“यह में आपको नहीं बताऊंगा,यह तो आपको मालूम करना है। “वह व्यक्ति रहस्यमय लग रहा था। उस दिन उसने भोजन न‌हीं किया और राजकीय विश्राम गृह में भूखा ही सो गया। उसके हाव भाव और रहन सहन से यह पता लगाना संभव नहीं था कि वह कहां से आया है। वह बहुत सी भाषायें जानता था। कपड़ों के नाम पर एक लंबा चोंगा पहने था, जो गले से पैरों तक सारे शरीर को ढके था। एक दिन और बीत गया। राजा शिवपाल परेशान, दरबार में एक संत सा दिखने वाला व्यक्ति भूखा पड़ा है और वह उसे भोजन‌ भी नहीं करा पा रहे थे।
लाला पींतांबर लाल को इस बात का पता चला तो कहने आज इस बात का पता लगा कर ही रहूंगा कि यह आदमी कौन है। आधी रात बीत जाने के बाद लालाजी ने अपने घर से एक नंगी तलवार उठाई और दो सिपाहियॊं को लेकर विश्राम गृह जा पहुँचे जहाँ वह आदमी सो रहा था। सिपाहियों को कुछ निर्देश देकर वे कमरे के अंदर गये और सोते हुये उस व्यक्ति की छाती पर चढ़ बैठे और नंगी तलवार उसकी गर्दन पर रख
कर नोक जोरों से दबा दी। इस अप्रत्याशित कार्यवाई से वह् आदमी घबरा गया और ‘बाप रे मार डाला बचाओ बचाओ’ चिल्लाने लगा। लालाजी ने समझ लिया कि यह आसपास के क्षेत्र का कोई धूर्त है,उसकी गरदन दबोच दी और‌ बाहर खड़े सैनिकों को बुलाकर उनके हवाले कर दिया। उसे दिन के समय दरबार में पेश किया गया तो मालूम पड़ा कि वह पड़ोसी राजा के द्वारा भेजा गया जासूस था। लालाजी की सूझ बूझ से वह पकड़ा गया। उसे जेल में डाल दिया और लालाजी की सूझ बूझ के लिये राजा साहब ने उन्हें धन्यवाद दिया।[साभार-रचनाकार]–
प्रभु दयाल श्रीवास्तव 

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