कहानी: चतुरा ने बनाया चोरों को मूर्ख

कहानी: चतुरा ने बनाया चोरों को मूर्ख

एक गांव में जगन नाम का नाई रहता था। उसे अपना काम ठीक से करना नहीं आता था। बाल काटते समय कभी कान काट देता तो कभी गाल। इसलिए उससे कोई हजामत नहीं बनवाता था। जब काम ही नहीं, तो आमदनी भी नहीं। जगन की भूखे रहने की नौबत आ गई।
यह देख कर जगन की पत्नी चतुरा बहुत नाराज हुई। उसने जगन के हाथ में एक कटोरा पकड़ा दिया। कहा, ‘जाओ, भीख मांगो। कम से कम यह काम तो ठीक से करो।’
जगन कटोरा ले कर घर से निकला। वह राजमहल के पास जा कर भीख मांगने लगा। तभी राजा ने उसे देखा। जगन की दशा देख कर, राजा को हंसी आई और एक मजाक सूझा। राजधानी के बाहर एक बंजर पथरीली जमीन पड़ी थी। राजा ने एक कागज पर उस जमीन का पट्टा लिख कर जगन को दे दिया।
जगन यह भीख ले कर घट लौटा। उस कागज को देख कर चतुरा जमीन देखने गई। उसे देख, कहने लगी, ‘आपको तो भीख भी मांगनी नहीं आती। भला राजा के पास कोई भीख मांगने जाता है? अब इस बंजर, पथरीली और कांटे वाली जमीन का क्या करें?’
थोड़ी देर बाद जब गुस्सा ठंडा हो गया, तो चतुरा ने जगन से कहा, ‘अब जैसा मैं कहती हूं, वैसा ही करते जाओ। कल सुबह सूरज उगने से पहले हम दोनों इस जमीन पर जाएंगे। दिन भर सिर झुका कर जमीन की ओर देखते हुए चलते रहेंगे।’
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दूसरे ही दिन दोनों जमीन पर इस तरह घूम रहे थे, जैसे कुछ खोज रहे हों। दोपहर के समय चोरों की एक टोली जंगल से गुजर रही थी। उन्हें जगन और चतुरा का इस तरह घूमना कुछ अजीब-सा लगा। उस टोली का मुखिया चतुरा के पास आ कर पूछताछ करने लगा। चतुरा ने उसे समझाया, ‘हमारे ससुर ने इस जमीन में सोने के सिक्कों से भरे हुए दो घड़े गाड़ दिए थे। ससुर जी उस जगह की निशानी बताने से पहले ही गुजर गए। हम उन्हीं घड़ों को ढूंढ रहे हैं।’ यह सुन कर चारों की आंखें चमक उठीं।
शाम को जगन और चतुरा थके-हारे घर लौटे। उधर चोरों ने रात को ही दो-चार जगह पर जमीन खोद कर देखी। जब कुछ हाथ नहीं लगा, तो उन्होंने सारी की सारी जमीन खोद डाली। उन्हें उम्मीद थी कि कहीं न कहीं तो घड़े अवश्य मिलेंगे। बस रातोंरात पत्थर- कंकर हट गए। घास-फूस दूर हो गई और बंजर जमीन एक खेत की तरह दिखने लगी। निराश हो कर चोर खाली हाथ चले गए।
अगले दिन जब जगन ने जमीन को देखा तो चकित हो गया। चतुरा ने जैसा सोचा था, वैसा ही हो गया था। बरसात के दिन दूर नहीं थे। चतुरा ने फसल बोने की सारी तैयारियां पूरी कर लीं। बारिश के आते-आते ही चतुरा ने अपने खेतों की बुवाई की। उस साल बरसात अच्छी हुई तो फसल भी अच्छी हुई। चतुरा और जगन को काफी आमदनी हुई। उन्होंने अपने खेत में एक कुआं भी खुदवा लिया। चोरों को इस बात का पता चल गया। वे चतुरा के पास पहुंच गए।
एक सप्ताह बाद जब चतुरा और जगन रात को सो रहे थे, तो उन्हें घर में किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। जगन ने घबरा कर कहा, ‘शायद चोर आ गए। धन लूट कर ही जाएंगे।’
चतुरा ने कहा, ‘चोरों के हाथ तो कुछ नहीं लगेगा। मैंने पैसे घर में रखे ही नहीं हैं। यहां से उत्तर दिशा में दस मील दूर, बहुत बड़ा इमली का एक पेड़ है। मैंने एक हांडी में सारे पैसे रख कर, पेड़ की सबसे ऊपरी डाल पर लटका रखी है।’
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जगन और चतुरा की बातें सुन कर चोर खुश हुए। वे खुशी-खुशी उत्तर की ओर चल पड़े। उन्हें वहां इमली का पेड़ और हांडी नजर आ गई। जल्दी-जल्दी में चोरों ने हांडी नीचे उतारी। ऊपर का कपड़ा हटाया। अंदर हाथ डाला तो सारा हाथ गोबर से भर गया। हांडी के अंदर कंकड़ों और गोबर के सिवा कुछ नहीं था। चतुरा ने चोरों को फिर एक बार मूर्ख बनाया था। इस बार से चोर आग-बबूला हो उठे। उन्हें लगा, जब तक चतुरा रहेगी, पैसे हाथ नहीं आएंगे। पहले उसे ही खत्म कर देना होगा। बाद में जगन से तो आसानी से पैसे मिल जाएंगे।
एक रात जब चतुरा और जगन गहरी नींद में थे, चोर वहां आ पहुंचे। उन्होंने चतुरा की खाट उठाई और तेजी से जंगल की ओर चल दिए। गांव के बाहर आ कर खाट एक पेड़ के नीचे रख दी और सुस्ताने लगे। थकान से उन्हें भी नींद आ गई।
अचानक चतुरा की आंखें खुल गईं। वह घबरा गई परंतु क्षण भर में ही सारी बात उसकी समझ में आ गई। वह चुपचाप खाट से उतरी। आसपास पड़े हुए दो-चार पत्थर खाट पर रख कर ऊपर चादर डाल दी जैसे कोई सो रहा हो। फिर भाग कर घर आ गई।
सवेरा हुआ तो चोरों की नींद खुली। उनके मुखिया ने अपनी तलवार बाहर निकाली और चादर हटाई। वहां से चतुरा को गायब देख कर उन्हें रोना आ गया। वे फिर मूर्ख बन गए थे।
आखिर चोर उस जगह को छोड़ कर चले गए और कभी वापस नहीं आए। चतुरा और जगन सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे।
– नरेंद्र देवांगन

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