कहानी..कहां है खुशियां

कहानी..कहां है खुशियां

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गांव में ट्रैक्टर-ट्रॉली के घुसते ही बच्चों ने शोर मचाना शुरू कर दिया, ट्रैक्टर आ गया-ट्रैक्टर आ गया। गांव में घुसते ही कीचड़ से भरी गली में ट्रैक्टर का पिछला पहिये धंस गया। ट्रैक्टर के आने के इंतजार में खड़े युवकों ने आनन फानन में ईंटों का इंतजाम जाम किया और ट्रैक्टर के पहिया के नीचे इंटों को लगा दिया ताकि इंजन का जोर लगने पर पहिए को मजबूत जमीन मिलने पर वह बाहर निकल सके। कुछ इंजन की ताकत और कुछ युवकों ने जोर लगाया तो ट्रैक्टर का पहिया कीचड़ से निकल गया।
ट्रैक्टर को सही जगह पर खड़ा करा कर उसकी ट्राली में भरे टेंट के सामान को जल्दी-जल्दी उतारा जाने लगा। कल शादी है। बारात सुबह ही आ जाएगी इसलिए सब हड़बड़ी में हैं। युवकों के झुंड में जबरदस्त उत्साह है। जिन लोगों की लड़की वालों से अनबन थी वे युवक भी सामान उतारने और काम कराने में व्यस्त हैं। कल को हमारे घर में भी बहन बेटी की शादी होगी, तब कौन साथ देगा, इसलिए सब काम में जुटे हैं।
गांव में शहरों की तरह टेंट लगाने का काम टेंट वाले नहीं करते, सो टेंट लगाने का काम घर वालों के जिम्मे ही होता है। टेंट लगाना तो दूर, टेंट हाउस का मालिक तो सामान भी नहीं निकलवाता जो आपको सामान चाहिए वह खुद निकालना होगा और वहीं रखकर जाना होगा। सामान गुम होगा या टूटेगा तो उसके पैसे देने होंगे। अगर बर्तन साफ नहीं मिले तो उसकी सफाई के पैसे भी आपको ही देने होंगे। सामान लादने और उसे ले जाने और वापस छोडऩे का जिम्मा भी आपका ही होता है। इसलिए युवक बड़ी मशक्कत के साथ युवक ट्राली से सामान उतार रहे हैं।
बूंदाबांदी का दौर जारी है। भारी बारिश की आशंका है इसलिए बारिश से निपटने के लिए बड़े वाले आंगन में 20 फुट लम्बी और 10 फुट चौड़ी तिरपाल तानने का काम जोरों पर है। कोई बांस गाड़ रहा है तो कोई तिरपाल का कोना पकड़े खड़ा है। कोई बांस बल्लियों का जाल बना रहा है जिस पर तिरपाल रुक सके। कोई सलाह दे रहा है कि ऐसा करो या वैसा करो। कोई किसी पर चिल्ला रहा है। ससुर खाली खड़ा है ये नहीं कि काम समेटवा ले।
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शाम होने को जा रही है। अंधेरा बढ़ रहा है। यूं भी बरसात के मौसम में अंधेरा ज्यादा गहरा होता है। शाम को युवकों का नाच गाना होना है जो रातभर चलना है। गांव में बिजली कम ही आती है इसलिए जनरेटर का इंतजाम सबसे पहले कर लिया गया है। नाच गाना सबसे ज्यादा जरूरी है जिससे लोगों का मन लगा रहे। यहां मनोरंजन का यही सबसे बड़ा साधन है। युवकों को ही नहीं, महिलाओं, युवतियों, किशोरियों और बच्चों को भी रात होने का इंतजार है ताकि नाच गाने का लुत्फ उठाया जा सके।
आंगन में-गलियों में गांव के हर हिस्से में कीचड़ है। इसके बावजूद सब खुश हैं। किसी को न तो बारिश से परेशानी है न कीचड़ से सबके चेहरों पर खुशी है। युवकों का झुंड अपने-अपने काम पर लगा है। शाम हो रही है लेकिन रिश्तेदारों का आने का तांता अब भी लगा है। जिस लड़की की शादी हो रही है उसके बहनोई, बहनोई के भाई, उनकी बहनें, फिर उनके रिश्तेदार सब पहुंच रहे हैं। जो दूर के रिश्ते में लगते हैं। वे भी आ गए हैं। घर में अंधेरा है। रोशनी का कोई इंतजाम नहीं। एक लालटेन थी, उसे भी कोई ले गया है। मोबाइल की रोशनी से काम चलाया जा रहा है।
जमीन पर गद्दे पड़े हैं। उन्हीं सीलन भरे गद्दों पर महिलाएं अपने चार-चार बच्चों को लेकर अंधरे में लेटी हैं। बच्चे पर बच्चा और महिला से सटी महिलाएं लेटी हैं। कहीं पैर रखने की जगह नहीं है। ऊपर से जबरदस्त उमस है। गर्मी से लोग पसीने-पसीने हो रहे हैं। अंधेरे में किसी बच्चे के रोने की तो किसी महिला के खिलखिलाने की आवाज आ रही है। अजीब तरह का घुटन भरा माहौल है लेकिन इसके बाद भी सब खुश हैं। किसी के भी चेहरे पर न अंधेरे की परेशानी है, न लेटने बैठने की चिंता है क्योंकि शादी का माहौल है। कुछ रिश्तेदार आठ दिन पहले आ चुके हैं और कुछ शादी के आठ दिन बाद जाने का इरादा रखते हैं। किसी को किसी तरह की कोई जल्दी नहीं है।
रात हो चुकी है लेकिन रिश्तेदार अभी भी आ रहे हैं। कोई रेलवे स्टेशन पर आ चुका है तो कोई शहर के बस अड्डे पर। उन रिश्तेदारों को लाने के लिए कुछ युवक तैयार हो रहे हैं। कुछ रिश्तेदार एतराज भी जता रहे हैं -अगर आना था तो घर से जल्दी चलना चाहिए था। इस तरह रिश्तेदार को परेशान करने का क्या मतलब लेकिन जिस घर में शादी है उसको तो सबको खुश रखना है। वो क्या करे, उसे उन रिश्तेदारों को लाना ही होगा।
जिस घर में शादी है, उस घर के समीप ही रेलवे लाइन है। रिश्तेदार या इस मोहल्ले के युवक बोर होते हैं तो कुछ देर के लिए रेलवे ट्रैक पर घूम आते हैं। बच्चों को विशेष हिदायत के साथ जाने दिया जाता है। वैसे भी यहां के लोगों को ट्रेनों के आने जाने का समय पता है। इसी गांव से सटा रोड है जिस पर रात दिन सवारियां चलती हैं। यही गांव का बस अड्डा है। रिश्तेदार यहां भी घूमने आ जाते हैं।
रात हो चुकी है। रिमझिम बारिश हो रही है। उधर, तिरपाल तानी जा चुकी है। अब नाच गाने का इंतजार है। युवकों में गजब का उत्साह है। डेक की आवाज तेज कर दी गई है और डांस का कार्यक्रम शुरू हो गया है। महिलाएं अपने बच्चों को अंधेरे में सुलाकर बाहर आ चुकी हैं। महिलाएं, युवतियां और बहुएं सब कुर्सियां डालकर बारिश में ही डांस देख रही हैं। युवक सत्तर और अस्सी के दशक के गानों पर डांस कर रहे हैं। कोई लड़की बनकर डांस कर रहा है तो कोई हीरो का रोल प्ले कर रहा है।
बूंदाबांदी के दौरान गजब की उमस है। बारिश में भी पसीने आ रहे हैं। जो लोग लेटे हैं, उन्हें भी नींद नहीं आ रही है। रात के तीन बज गए। किसी ने कहा – रात भर डांस करोगे तो कल की असली चुनौती से कौन निपटेगा। असली जंग तो कल की है। डांस बंद कर दिया गया और अगले दिन की तैयारियों पर विचार होने लगा, किस तरह बारात की आवभगत की जाएगी। आखिर इज्जत का सवाल है। अगर कुछ कमी रह गई तो गांव की बदनामी होगी।
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दिल्ली वाले फूफा पसीने से तर बतर हैं। उन्हें नींद नहीं आ रही है। उनके लिए जो हवाई पंखा मंगाया गया था वह वोल्टेज कम होने के कारण चला नहीं। फूफा सोच रहे हैं कि यहां लोगों में कितना संतोष है। किसी के चेहरे पर गर्मी की शिकायत नहीं है। ये लोग इतने मुश्किल हालात और कम संसाधनों में भी मनोरंजन के पल ढूंढ लेते हैं। इनके लिए गांव का छोटा सा बस अड्डा जहां गिनती की दस बारह दुकानें हैं, मनोरंजन का स्थान है। रेल की पटरी भी उनका मनोरंजन कर देती है। न कोई खाने का बेहतर इंतजाम है, न कोई ढंग की व्यवस्था, इसके बाद भी सब लोग खुश हैं। किसी को कोई शिकायत नहीं। किसी के चेहरे पर कोई गिला शिकवा नहीं। अगर शहर होता तो शायद ऐसी हालात में एक भी रिश्तेदार नहीं रुकता और दस जगह बदनामी करता सो अलग।
यहां मेहमान और घर के लोग छोटी-छोटी चीजों में खुशियां ढूंढ लेते हैं। दूसरी ओर बड़े शहरों का जीवन है जहां खुशियां काफूर हो चुकी हैं। बड़े से बड़ा फंक्शन भी उन्हें खुशी नहीं दे पाता है। बड़े- बड़े होटल, शहरों की शानदार इमारतें, चमचमाती सड़कें भी उनके चेहरे पर खुशी नहीं ला पातीं। शहरी लोग खुशियां तलाशने ऊटी, कश्मीर, मनाली, हिल स्टेशनों के अलावा विदेशों का सफर करने जाते हैं लेकिन दिली खुशी नहीं मिल पाती।
शहर का जीवन कितना टफ और समस्याग्रस्त है कि उसे खुशी ढूंढे नहीं मिल रही। लाखों रुपया खर्च करने के बाद भी शहर के लोगों के चेहरों पर संतोष का भाव नहीं होता। हम गांव से यह सोचकर शहर में आ गए कि बेहतर जीवन और खुशियों का संसार मिलेगा लेकिन यहां समस्याओं का दरिया सामने खड़ा है। यह हमने कैसे शहर बसाए हैं जहां जीवन एक संघर्ष बनकर रह गया है। फूफा को यह सब सोचते-सोचते सवेरा हो गया।
अगले दिन भी बारिश हो रही है। बारात दोपहर में आ चुकी है। बारातियों के चेहरे खुशियों से लबरेज हैं। थोड़ी देर में बारात विदा हो गई। फूफा भी सुबह होते ही दिल्ली के निकल पड़े और ट्रेन में बैठकर भी गांव के लोग छोटी-छोटी बातों में भी खुशी तलाश लेते हैं, उसी के बारे में सोचते हुए दिल्ली पहुंच गए। (अदिति) 
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