कहानी-एक और सीता

कहानी-एक और सीता

53514138सीता आज फिर काम पर नहीं आई। बर्तनों का ढेर, सफाई के इंतजार में, मुंह लटकाये पड़ा है। नलिनी का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। आखिर सीता या उसकी सास का इंतजार करके वह थक गई तो उसने खाना बनाने के लिए कुछ बर्तन छांटना शुरू कर दिये ताकि उन्हें वह खुद ही साफ कर खाना बनाने लगे। तभी उसके हाथ से कुकर छूटकर गिर पड़ा। मैं बोला- ‘क्या सीता का गुस्सा बर्तनों पर उतरेगा आज? नहीं बनता तो छोड़ो आज होटल में ही खा लेंगे।’
इस पर नलिनी तुनककर बोली- ‘बनता क्यों नहीं? करना ही पड़ेगा। आज सीता महारानी फिर गोता लगा गई। जानती है न कि नागा करने पर पैसे भी नहीं कटते और डांट भी नहीं पड़ती। कभी कुछ कहा भी तो साहब बीच में कूद पड़ेंगे- अरे तो क्या हुआ, बेचारी बीमार पड़ गई होगी। आखिर दु:ख-बीमारी तो सभी को लगी रहती है।’ तुम्हीं ने चढ़ाया है उसे सिर पर। मगर अब हद हो गई, मैं कल उससे साफ कह दूंगी- पहली तारीख को अपना हिसाब कर लेना। बाज आई ऐसी कामवाली से।
‘मुझे मालूम है, तुम उससे कुछ भी नहीं कहोगी। बल्कि कल जब वह अपना मुंह लटकाये, आंखों में आंसू लिये, तुम्हारे सामने आ खड़ी होगी, तो करुणा उमड़ पड़ेगी उस पर।’ मैंने कहा।
इस पर नलिनी, बर्तनों पर विम मलते-मलते ही मुझे घूरकर बोली- ‘तो क्या करूं? जब उसका आदमी मतकमाऊ, दिन-दिन भर टांगें पसार कर सोता है और रात को शराब पीने के बाद उसका अंग-अंग तोड़ डालता है, तब उस पर ममता न उमड़ेगी तो क्या होगा? फिर बेचारी को पति का दुख हो तो ही ठीक, सास भी कम नहीं है। बात-बात पर ताने मारेगी, लांछन लगायेगी। अब बताओ, जब आदमी पर सभी तरफ से दुखों की मार पड़े तो क्या हमारा भी यही फर्ज हो जाता है कि हम भी उसे ठुकरा दें?
मैं बरबस मुस्करा दिया और बोला- ‘मैं जानता हूं, तुम सीता पर कभी नाराज नहीं हो सकती, कभी उसे काम पर से हटा नहीं सकतीं, भले ही वह महीनों न आये। प्यार तुम्हारा उमड़ेगा उस पर और लांछन मेरे सिर कि मैंने उसे सिर पर चढ़ाया है। देवीजी, किया है सो भोगो, करो और उसकी एवज में काम। मैं तो नहाने चला, नौ बीस हो चुका, दस की बस पकडऩा है।’
सीता चार साल पहले अपनी सास काकुबाई के साथ हमारे क्वार्टर पर आई थी- काम की तलाश में। तब उसकी उम्र मुश्किल से 15-16 साल की रही होगी। दुबली-पतली, सांवले रंग, मध्यम कद, बड़ी-बड़ी आंखों वाली वह आकर्षक लड़की, अपने माथे पर बड़ा-सा कुंकुम का गोल-गोल लाल टीका लगाये और गले में मंगलसूत्र लटकाये, अपनी सास के साथ चुपचाप खड़ी थी। सास नलिनी से बातें कर रही थी। वैसे एक काम करने वाली हमारे यहां आती थी। मगर वह बुढिय़ा बड़ी सुस्त थी। हम खुद ही चाहते थे कि कोई फुर्तीली काम वाली मिल जाये तो हम उसे बढिय़ा तनख्वाह देंगे। मगर चौका-बासन, कपड़ा सफाई के साथ बाहर का भी कभी-कभी काम कर दिया करे। सीता हमारे क्वार्टर से दूर भी नहीं रहती थी। जयप्रकाश नगर कौन-सा दूर है हमारे यहाँ से? पहाडिय़ों की दक्षिणी ढलान पर, नाले के किनारे, पूरब से पश्चिम फैली यह झुग्गी बस्ती कुछ साल पहले ही हमारी आँखों के सामने खड़ी हो गई है। सीता की सास ने कहा कि मान लो कभी सीता न आई तो वह खुद आ जाया करेगी। इससे अच्छी कामवाली भला कहां मिलेगी?।
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उसकी बूढ़ी सास नलिनी को बता रही थी- ‘बाई साहब क्या, बोलूंगी, पेटू कू तो वजन चईये ना? जवान चोकरा है पण किस्मत अपनीच खोटी। पढ़ाने को खूब माथा-पच्ची की पण नहीं पढ़ा। अब बिना पढ़े कू कौन नौकरी दे। गुस्सा करके मजदूरी करने को भेजती तो शाम को खाली लौटकर बोलता- दिन-भर घूमता रहा, कोई मजदूरी पर नहीं रखता। ज्यादा बोलो तो बोलता है घर से भाग जाऊंगा या रेल से कट मरूंगा।’नलिनी ने टोका- ‘जब कुछ करता-धरता नहीं था तो शादी क्यों कर दी? इस बेचारी सीता ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा?’
बुढिय़ा आंखों में आंसू भरकर बोली- ‘क्या बोलूंगी बाई साब। मेरे ससुर नहीं माने। नानू आखा छोटा था तभी उसकी सगाई कर दी। बीमार पड़ गये तो बोले- मेरा जाने का टेम आ गया, जल्दी नानू का ब्याह करो मेरी आंखों के सामने। अब बाई साब, आप बताओ, घर के बूढ़े पुराने की बात कोई टालता था क्या? कर दी छोटेपन में शादी। मगर ये बेचारी सीता कब तक पीहर में रहती? पिछले महीने देस गई थी, लिवा लाई इसको।’
थोड़ी देर रुककर बुढिय़ा ने ठण्डी आह भरी और बोली- ‘मुकद्दर ही खराब है काकूबाई का तो कोई क्या करेगा? भरी जवानी में आदमी मर गया। इकलौता बेटा मतकमाऊ निकल गया तो बुढ़ापे में जूठे बर्तन तो मांजना ही पड़ेंगे, नहीं तो पेट कैसे भरेगा?’
बातों को बीच में ही छोड़ नलिनी किचन में चली गई और थोड़ी देर में चाय के दो प्याले लाकर दोनों को पकड़ा दिये। फिर मुझे और अपने लिए दो प्याले लाई। जब चाय खत्म हो गई तो सास ने सीता को इशारा किया। वह लपककर सारे जूठे कप-प्लेट उठाकर बाथरूम के दरवाजे पर रख साफ करने लगी। साफ होने पर बोली- ‘कहां रख दूं बाई साब?’
खुबसूरत पड़ोसन…!
नलिनी ने स्टेण्ड बता दिया तो उसने उसने सारे कप-प्लेट्स करीने से रख दिये और फिर सास के पास आकर बैठ गई।जब वे दोनों चलने को हुईं तो नलिनी ने पूछ लिया- ‘अच्छा काकुबाई यह बताओ कि बर्तन, सफाई कपड़े और झाड़ू-पोंछा का क्या लोगी?’ बुढिय़ा बोली- ‘बाई साब, आपकी जो मरजी हो दे देना। अभी जो बाई काम करती है,उसे जो देती हो, उससे दो पैसे कम देना। पहले काम तो देख लो। आप तो खुद काम से खुश होकर दो पैसे ज्यादा गरीब को देंगी।’
और सचमुच सीता ने कमाल ही कर दिया। उसके परिश्रम, लगन और विनम्रता से नलिनी ही नहीं, मैं और बाबा भी बहुत खुश थे। काम के लिए उससे कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी। खाने के अलावा उसने घर का सारा काम समेट लिया था। नलिनी बड़ी राहत महसूस करने लगी थी। सीता घर का काम निपटाकर सब्जी ला देगी, गेहूं साफ कर चक्की से गेहूं पिसा लायेगी। कभी बाबा की बस निकल जायेगी तो उसे स्कूल छोड़ आयेगी।
सात-आठ दिन तक जब वह एक ही धोती-ब्लाउज पहने काम पर आई तो नलिनी ने उसे अपनी पुरानी टैरीकाट की साड़ी और ब्लाउज दे दिये। दूसरे दिन वह उन्हें पहनकर आई तो उसकी शक्ल ही बदल गई। चाय-नाश्ता तो वह रोज हमारे साथ ही करती थी, मगर कभी-कभी खाना बचता तो वह भी उसी को दे देते। वह भी बहुत प्रसन्न दिखाई पड़ती थी।
पहली तारीख को नलिनी ने दो सौ रुपये देते हुए पूछा- ‘देख सीता, कम तो नहीं?’ वह सिर नीचा किये बोली- ‘मैं क्या बोलूंगी बाई साब, आप ये भी नहीं देंगी तो सीता मुंह से थोड़े ही मांगेगी।’
एक दिन सीता गेहूं साफ कर रही थी तभी नलिनी पूछ बैठी- ‘क्यों सीता, तेरी शादी को कितने साल हो गये?’ बेचारी लजाकर बोली- ‘बाई साब, बहुत से बरस हो गये। बाबा जैसी छोटी थी तभी शादी कर दी थी बापू ने।’
‘इधर ससुराल कब आई?’ नलिनी ने पूछा। ‘ये तो अभी छ: महीना पहले। मेरे बापू ने कड़ी चिट्ठी लिखी तब सासू बाई लाई मुझको वरना इन्हें तो होश भी नहीं था कि इनकी बहू अपने बाप के पास पड़ी है बरसों से। अब आप ही बताओ बाई साब, बापू मेहनत-मजदूरी करके कब तक खिलाते मुझे। फिर गांव के लोग भी तो जीने नहीं देते। बात पर बात बनाते हैं।’ उसने बताया।
घर का खर्चा पति संभाले या पत्नी
‘तेरा बापू रहता कहां है?’ नलिनी ने पूछा।‘जलगांव का नाम सुना होगा बाई साब। बम्बई के रास्ते में है।’ उसी जलगांव से पचास मील बैलगाड़ी में जाने पर बापू का गांव धूलकोट है। बाई साब, खेती-बाड़ी कुछ नहीं है। बापू खेतों में मजूरी करके हम चार बहनों और दो भाइयों को पालता था। दोनों भाई को पढ़ा भी रहा है। सासू बाई के लड़के की तरह थोड़े ही हैं मेरे भाई, खूब पढ़ेंगे आगे कूं। – सीता ने बताया।
‘अब आप बताओ बाई साब, जब तुम अपनी बहू को नहीं बुलाओगे तो बापू को तो तुम्हें याद दिलाना पड़ेगा कि नहीं। अगर चिट्ठी लिख दी तो कौन सा पाप किया बापू ने? रात-दिन मारते हैं- तेरे बापू के घर तुझे खिलाने को नहीं था, तभी तो चिट्ठी भेज दी। या कभी कहेंगे- तू जरूर बिगड़ रही होगी, तभी चिटठी लिखी।’ – वह बता रही थी।
‘क्या तुझ पर लांछन भी लगाते हैं?’ नलिनी चौंककर पूछ बैठी?
‘बाई साब, क्या बोलूंगी मैं? सासू बाई तो कोई बात नई, आई के माफक है। पण अपना मरद ऐसा बोलेगा तो क्या होगा?’ उसने बताया।
प्रात: रोज ही अपनी करुण कथाएं वह नलिनी को काम करते-करते सुनाती रहती थी। और ज्यों-ज्यों सीता पर कष्टों के पहाड़ टूटते गये, नलिनी उस पर द्रवित होती चली गई। वैसे करुणा मुझे भी द्रवित करती थी मगर मैं उसे प्रकट नहीं करता था. पता नहीं नलिनी क्या समझे? या सीता क्या समझे, आस-पास पड़ोस वाले क्या समझे? किसी की समझ पर किसी का अंकुश तो है नहीं।
वह पहला दिन था जब सीता काम पर नहीं आई और न ही उसकी सास। चिन्ता होना स्वाभाविक थी। कहां तो वह छ: बजे आ जाती और आज प्रात: आठ बजने को आ गये। नलिनी ने मुझसे कहा- ‘लगता है कुछ गड़बड़ है। जरा तुम्हीं चले जाओ उसके घर। देख तो आओ, आखिर क्या बात है। इच्छा न होते हुए भी मैं कुर्ता-पाजामा और चप्पल पहने, चल दिया जयप्रकाश नगर की झुग्गियों में सीता का घर पूछता।बॉयफ्रेंड के बावजूद लड़कियां इसलिए करती है दूसरे लड़कों के साथ फ्लर्टबिजली के खम्भे के पास उसने अपनी झुग्गी बताई थी। खम्भे के पास ही मुझे पब्लिक नल दिखा जहां झुग्गियों के मैले-कुचैले, नंगे-अधनंगे बच्चे और बूढ़ी औरतें नल से पानी भर रही थीं। मैंने एक लड़के से पूछा- ‘क्यों भाई, हमारे घर काम करने वाली सीता कहां रहती है?’लड़का थोड़ी देर तक मेरा चेहरा देखता रहा। पिर अटपटी भाषा में अपने साथियों से कुछ बोला। उत्तर में उसके साथी भी कुछ बोले फिर वह लड़का मुझे बोला- ‘यहां से, तीसरे नम्बर की झुग्गी है साब। मगर वह तो घर में होगी नहीं।’
‘क्यों कहीं चली गई है? काम पर तो आई नहीं?’ मैंने आश्चर्य से पूछा।
तभी नल पर पानी भरती एक बूढ़ी, घुटनों पर हाथ रखकर, कष्ट से उठती हुई मेरे पास आई और बोली- ‘साबजी, इन पोट्टे लोगों को क्या मालूम? आप खुद पता करो। रात कू उसके आदमी ने दारू पीकर उसे बहुत मारा था। हो सकता है घर में ही पड़ी हो बेचारी।’
‘और उसकी सास?’ – मैंने पूछा।
‘वो बेचारी बुढिय़ा क्या बोलेगी साब। दारू कुट्टा बेटा उस पै ही हाथ उठाता। अब बोलो साब, कोई संतान मां-बाप पर हाथ उठाती? कमाओ मत मगर कमाने वालों को मारो-पीटो तो मत। साले कू हराम का पैसा होना, जुआ होना, दारू होना और ऊपर से मारा-पिट्टी?’ घृणा से बुढिय़ा ने थूक दिया।
मैं बड़ा असमंजस में पड़ गया। सीता के घर जाऊं या नहीं? फिर हिम्मत करके पांव बढ़ाये। झुग्गी के सामने खड़ा हो पुकारा- ‘नानू, ओ नानू! थोड़ी देर बाद सीता की सास अपनी मुरदनी शक्ल लिये बाहर आई- ‘साब जी, आप कू आना पड़ा। क्या बोलूं अपना तो मुकद्दर ही खराब है। आप चलो मैं आती हूं।’ मैंने देखा बुढिय़ा की आंखें डबडबा रही थीं।
थोड़ी देर बाद सीता, बुरी हालत में, घिसटते-घिसटते आई। तब तक मैं सारी बातें नलिनी को बता ही चुका था। सीता की हालत देखकर नलिनी द्रवित होकर बोली- ‘कहां लगी सीता, जरा देखूं तो?’छोटी-सी तारीफ भी स्त्रियों को देती है बड़ी खुशीइसके बाद उसने सीता के अंग-प्रत्यंग देख डाले। उसकी पीठ, हाथ, पैर और मुंह, मार के कारण सूजे हुए थे। नलिनी उसकी चोटों पर हल्दी, चूना मलती जाती और उसके आदमी को कोसती जाती। अचानक उसने पूछा- ‘चाय पी?’ उत्तर में सीता के आंसू टपक पड़े।नलिनी उठी, उसने गैस पर चाय चढ़ाई और पोहों की भरी प्लेट उसके सामने रख दी। सीता के धैर्य का बांध फूट पड़ रहा था और नलिनी उसे धीरज बंधाती जा रही थी। सीता के सिर पर हाथ फेरकर बोली- ‘सीता, घबराते नहीं। स्त्री का तो जन्म ही सारे दुख सहने के लिए हुआ है। फिर royal-3तू तो सीता है। जानती है, सीता जी ने क्या-क्या कष्ट झेले थे? धरती भी एक स्त्री है, वह कितना सहती है? कितना जुल्म करते हैं लोग उस पर, मगर उसने कभी उफ् भी निकाली है मुंह से? हम तो बोलकर अपनी पीड़ा हल्की कर लेते हैं, मगर बेचारी बेजुबान धरती, क्या करे, तू मन छोटा मत कर। उठ मुंह धो, चाय-नाश्ता कर और बरामदे में दरी बिछाकर लेट और सुन, अगर तुझे वहां ज्यादा तकलीफ हो तो तू हमारे पास रह। मुझे कोई कष्टï नहीं होगा।’
आधा घंटे में सीता सामान्य हो चुकी थी। शायद करुणालेप का ही यह असर हो जो नलिनी ने उस पर किया था। ऐसा लगने लगा जैसे कुछ हुआ ही न हो। कैसी अजीब बात है, थोड़ी देर पहले कोई इतना टूटा हुआ हो कि जिसकी पीड़ा देखी न जाय और स्नेह के दो बोल, सहानुभूति के दो शब्द या करुणा के दो अश्रुकण उसे इतनी शक्ति दे दें कि उसका रोग काफूर हो जाय।
बर्तन मांझते, झाड़ू-पौंछा करते उसने रात का सारा कच्चा चिट्ठा नलिनी को सुना दिया। उसका पति नानू, रात को शराब में धुत होकर आया। सीता रोटी बना रही थी। उसकी सास बाहर ओटले पर पड़ी कमर सीधी कर रही थी। आते ही नानू के मां को दो लातें जमाईं और गाली बकने लगा। सीता उसको बचाने आई तो नानू के पास ही पड़े बांस के टुकड़े को उठाकर उसकी नस-नस तोडऩा &

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