कथा: डूबती लड़की की प्राण रक्षा

कथा: डूबती लड़की की प्राण रक्षा

111 यह कथा है उस वीर बालक की जिसने अपने प्राणों को दाव पर लगा कर एक बालिका को पानी में डूब जाने से बचाया। यह कार्य जोखिम भरा तथा बहुत कठिन भी था। हुआ यों कि देवांग जाति की पन्द्रह वर्ष की एक कन्या नदी फाट पर कपड़े धो रही थी।
कपड़े धोते हुए उस का अचानक पांव फिसल गया। वह गहरे पानी में जा गिरी। डुबकियां लेने लगी। उस का बच पाना कठिन हो गया। आस-पास कोई था नहीं जो सहायता करता व उसे बाहर निकालता। पन्द्रह वर्ष की लड़की मौत के मुंह में जा रही थी।
पास ही एक अन्य बालक खेल रहा था। उसकी आयु मात्र दस वर्ष थी। यह बालक ‘रामाराव’ बंगलोर की पंद्रहवीं बालचर सेना का सदस्य था, अत: तैरना, खतरों से जूझना सीख रखा था। जब उसने देखा कि एक लड़की पानी में डूब रही है, वह भागा हुआ गया।
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बिना कपड़े उतारे पानी में छलांग लगा दी। जा पहुंचा उस किशोरी के पास। उसे खींच कर बाहर लाने लगा। एक तो वह आयु में काफी बड़ी थी, दूसरे बहुत भारी भी थी। तीसरे पानी में सिवार भरी थी। इस लिए उस के लिए उस भारी लड़की को खींच कर लाना कठिन हो रहा था। उस के अपने शरीर पर वो कपड़े थे, वे भी सिवार से निकलने में परेशान कर रहे थे। फिर भी वह अपने काम में जुटा रहा।
जैसे तैसे वह डूबती लड़की को बचा कर घाट पर ले आया। इस काम में वह केवल थका ही नहीं, उसे अपने प्राणों का भी खतरा था। उसने अपनी जान की परवाह किए बिना केवल दस वर्ष की आयु में जो कारनामा किया, वह सराहनीय था जिसे लोग अभी तक नहीं भूले न ही भूलेंगे।
– सुदर्शन भाटिया दैनिक रॉयल unnamed
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