ऐसा हो बच्चों का कमरा

ऐसा हो बच्चों का कमरा

children-room  हर माता-पिता को अपने बच्चों को अच्छा बनाने की चिंता रहती है। बच्चों के पालन पोषण में कुछ लोग आहार को महत्व देते हैं और कुछ लोग सही पाबन्दी और अच्छी देखभाल पर जोर देते हैं। किसी एक चीज को प्रधान मानना उचित नहीं। सभी बातें समान रूप से महत्त्वपूर्ण होती हैं।
बच्चों के संपूर्ण विकास में खान-पान, घरेलू वातावरण तथा उसे दी जाने वाली शिक्षा समान रूप से आवश्यक हैं। समय की बंदिश, पौष्टिक आहार, सफाई, व्यायाम के साथ ही मानसिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण भी जरूरी है। वह प्रथम कुछ वर्षों में घरेलू वातावरण से बहुत कुछ सीख लेता है। बच्चों का अधिकांश समय घर में ही बीतता है। इसका उन पर सीधा असर पड़ता है। बच्चों की समझ बहुत साफ होती है। उनकी आंखें सीधा-सादा देखती हैं। बच्चे सबसे पहले मां-बाप की नकल करते हैं। इस सदी में मां-बाप को इतनी फुर्सत नहीं है कि बच्चों की रूचि, चाहत का पूरा-पूरा ध्यान रखें। बच्चों के सामने क्या करें, क्या न करें, दोनों बातों पर ध्यान देना जरूरी है। बच्चों को चिपकाये रखना या एकदम से दूर कर देना दोनों ही ठीक नहीं। जहां तक संभव हो, उन्हें एक अलग दायरे में रखकर भरपूर प्यार दें और उन पर नियंत्रण रखें जिससे उन्हें कोई कमी न महसूस हो और साथ ही उनमें आत्मविश्वास जागे।
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बच्चों की परिवर्तनशील आवश्यकताओं के अनुसार उनके रहने के कमरे को व्यवहारिक एवं लचीला होना चाहिए। व्यवहारिक इसलिए कि बच्चे अपने कमरों में अधिक वस्तुओं को तोड़-फोड़ सकते हैं और लचीला एवं समायोज्य इसलिए कि बच्चे हर सप्ताह अपनी रूचि एवं इच्छा बदलते हैं। बड़े होने के साथ ही उनकी आवश्यकताएं भी बदलती जाती हैं। इन सभी बातों के अनुरूप बच्चों के रहने के स्थान में सुधार करते रहना चाहिए। जहां तक हो सके, 5-6 वर्षों के बाद बच्चों को अलग कमरा दिया जाना चाहिए। यदि संभव न हो तो बड़े कमरों में पार्टीशन लगा कर अलग कमरा बनाया जा सकता है। यह सुविधा न हो पाये तो कमरे में बच्चों के सोने, सामान रखने तथा खेलने की जगह अलग से निर्धारित कर दें और बच्चों को उसी जगह ठीक से सामान रखने की आदत डलवायें। इससे वे काम करने का तरीका सीखेंगे और उनमें आत्मविश्वास की भावना भी पैदा होगी।
अलग स्थान न होने से मां-बाप और बच्चे दोनों को अड़चनें होती हैं। बच्चों के सामने अक्सर आप अपने को स्वतंत्र नहीं महसूस करते और बच्चे भी। सभी बातें खुलकर नहीं कह पाते। बच्चे सामने रहेंगे तो बात-बात पर आप उन्हें टोकेंगे जिसका उन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में बच्चे स्वयं एकांत ढूंढना प्रारंभ कर देते हैं। बच्चों का कमरा बहुत एकांत में नहीं होना चाहिए। कमरा ऐसी जगह हो जहां उस पर घर के लोग आते जाते समय ध्यान दे सके। इससे बच्चों पर पर्याप्त निगरानी रखी जा सकती है। कमरों की योजना में सुरक्षा की व्यवस्था बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सभी विद्युतीय उपकरण जैसे पंखे, लैम्प, स्विच, ट्यूब आदि बच्चों की पहुंच से दूर रहें तथा उन्हें सदैव ऊंचाई पर लगाये। दरवाजे बाहर की ओर खुलने वाले हों। उनकी कुण्डी ताले स्वत: बंद न होने वाले हों। ऊपर के तल पर कमरा हो तो खिड़की, दरवाजों में इस प्रकार की व्यवस्था हो ताकि बच्चा गिर न सके। 
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आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार अधिक से अधिक बच्चों की रूचि की सामग्री रखनी चाहिए लेकिन ध्यान रखें, किसी चीज की अधिकता भी न होने पाये अन्यथा बच्चों की रूचि घटने लगती है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है,उसे एक ड्राइंग कागज लगा बोर्ड दें ताकि यह उस पर अपने सपनों के चित्र को साकार कर सके। बड़े बच्चों की आवश्यकताएं कुछ अधिक जटिल होती है। उन्हें मनोरंजन करने तथा पढऩे के लिए सामानों की जरूरत हो सकती है इसलिए हो सके तो इसकी भी व्यवस्था कर दें। इसके साथ ही आपको दोहरी सतर्कता बरतनी पड़ेगी। बड़े बच्चे कुछ ज्यादा ही निजी ढंग से रहना चाहते हैं और उन्हें इसका अवसर देना चाहिए। यदि कमरा छोटा है तो फोल्डिंग बेड लगायें ताकि उसे उठा देने पर खेलने की जगह हो जाये। बच्चों पर आवश्यकता से अधिक निगरानी करना भी अहितकर होता है। इससे बच्चे अपने पैर पर खड़े नहीं हो पाते। उन्हें तो केवल एक मार्गदर्शन देना चाहिए। उनके लिए वातावरण पैदा कर देना चाहिए जो सुरक्षित भी हो और ज्ञानवर्द्धक भी।
– विनय कुमार यादव आप ये ख़बरें अपने मोबाइल पर पढना चाहते है तो दैनिक रॉयलunnamed
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