एड्स की रोकथाम क्यों जरूरी..?

एड्स की रोकथाम क्यों जरूरी..?

 पिछले 25 वर्षों से लाइलाज एड्स दुनियां भर के चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है। इससे निजात पाने की यूं तो पूरी दुनियां कोशिश कर रही है किंतु एड्स आज भी एक गंभीर चुनौती है।
इसे सिवाए विडंबना के और कुछ नहीं कहा जा सकता कि जनता अभी भी गंभीर नहीं हो पायी है। अवैध शारीरिक संबंधों का चलन बढ़ रहा है। अब तो स्कूली बच्चे भी मोबाइल के दुरूपयोग से बहक रहे हैं। जहां सावधानियां बरती जानी चाहिए, वहां लापरवाहियां बरती जा रही हैं। रक्त देते एवं लेते समय, इंजेक्शन लगाते समय, पॉर्लर में, होटलों में भी छोटी-छोटी असावधानियां एड्स का कारण बन सकती हैं। एड्स यानी एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशियेंसी सिंड्रोम किसी एक रोग का नाम नहीं है बल्कि कई तरह के संक्रमणों का संयोग है। वेश्यालय जाने वाले कितनी सावधानियां बरतते हैं और कितनी सावधानियां वेश्याएं बरतती हैं, कहने की जरूरत नहीं।
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एड्स के कारक एचआईवी वायरस की खोज 1980 के दौरान हुई थी। यही वायरस मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित करता है और शरीर इतना दुर्बल हो जाता है कि जिंदगी मौत से भी भयावह लगने लगती है। जरूरत है चिकित्सा सेवा एवं आत्मिक बल द्वारा चुनौती से लडऩे की। बदनामी के डर से इलाज न करवाना एड्स का प्रकोप फैलाना ही है।
सेक्स संबंधित समस्याओं का समाधान सस्ती किताबों और सड़क पर दुकान लगाने वाले तथाकथित नीम, हकीम, खानदानी वैद्यों से प्राप्त करने की बजाए गुप्त रोग विशेषज्ञ के परामर्श से करना चाहिए। सावधानियां बरतनी चाहिएं। सावधानियों से ही इसके बढ़ते प्रभाव को कम किया जा सकता है।
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अफ्रीकी देशों में एड्स पीडि़तों की संख्या दुनियां में सबसे ज्यादा है। ट्रांसपोर्ट पेशे से जुड़े लोगों खासकर ट्रक ड्राइवर्स, क्लीनर्स, कंडक्टर्स, ठेकेदर ज्यादातर घर-परिवार से बाहर रहने वाले लोगों के अवैध शारीरिक संबंध ही एड्स की वजह भी बनते हैं। अत: अप्राकृतिक सेक्स संबंधों से बचने का सभी को प्रयास करना चाहिए। एड्स प्रभावित लोगों से घृणा करना उचित नहीं कहा जाएगा। परिवार के सदस्यों, मित्रों से सहयोग न कि सहानुभूति की आवश्यकता है।
एड्स पीडि़त व्यक्ति को एड्स से बचाया जा सकता है लेकिन सलाह यही दूंगा कि सावधानी बरतें एवं अपना व अपने परिवार का भविष्य सुनिश्चित एवं सुरक्षित रखें। सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाएं। अपने इर्दगिर्द भी जागरूकता लाएं।
-राजेन्द्र मिश्र ‘राज’

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