एचटीओ से घुटनों के प्रत्यारोपण से बच सकते हैं

एचटीओ से घुटनों के प्रत्यारोपण से बच सकते हैं

कानपुर । ढलती उम्र में गठिया के कारण खराब हो रहे घुटनों के प्रत्यारोपण की सलाह आमतौर पर चिकित्सकों द्वारा दी जाती है मगर कम ही लोगों को पता होगा कि हाई टाइबल ओस्टियोटामी (एचटीओ) के जरिये घुटनों की शल्य चिकित्सा से प्रत्यारोपण के महंगे खर्च से बचा जा सकता है। चिकित्सक इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि एचटीओ तकनीक भारतीय परिवेश में जीवनयापन करने वाले आम लोगों के लिये मददगार है। इस तकनीक से किये गये अॉपरेशन के बाद मरीज को असहनीय दर्द से निजात मिलती है बल्कि वह बीमारी से पहले की तरह अपनी नित्य क्रिया को आसानी से कर सकता है। हालांकि यह विधि 55 साल तक के मरीजों के लिये बेहद कारगर मानी गयी है। मध्यम और अल्प आयवर्ग के लिये यह तकनीक बेहद लाभप्रद है क्योंकि एचटीओ के जरिये किये गये अॉपरेशन में घुटना प्रत्यारोपण की तुलना में पांच गुना कम खर्च आता है और संक्रमण का भी कोई खतरा नही होता।एचटीओ विधि से किये गये आपरेशन के एक से डेढ महीने बाद स्वस्थ मरीज वजनी चीजों को उठा सकता है जबकि कृत्रिम घुटने के मामले में ताउम्र वजनदार वस्तुओं को उठाने में परहेज बरतने की सलाह दी जाती है। लाला लाजपत राय अस्पताल में अस्थि रोग विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक रोहित नाथ ने बताया कि एचटीओ तकनीक में गठिया के कारण खराब हो रहे घुटने के पास एक छोटा सा चीरा लगाया जाता है और हड्डी में फ्रैक्चर कर उसका सरेंखण (एलाइनमेंट) किया जाता है।
इससे पैर के दोनो ओर पड़ने  वाला भार एकसमान हो जाता है और गठिया के कारण लंगड़ा कर चलने वाला व्यक्ति बीमारी से पहले की अवस्था में अर्थात सीधे चल सकता है। चिकित्सक ने बताया कि जब हम टहलते है तो शरीर के भार के तीन से आठ गुना ज्यादा वजन “फीमर” (जांघ की हड्डी) और टीबिया (पिंडली की हड्डी) पर पड़ता है। यह भार संधि उपास्थि द्वारा घुटने के अंदरूनी और बाहरी हिस्से में बराबर बराबर बंट जाता है।
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अगर किसी कारण अस्थि में गठिया के लक्षण उभरते हैं तो संधि उपास्थि कमजोर होती है और भार एकसमान नही रहता।
इस हालत में मरीज को हल्का दर्द होता है और वह इससे बचने के लिये पैर के एक तरफ ज्यादा झुक कर चलना शुरू कर देता है। मरीज की यह आदत घुटने के खराब होने की प्रक्रिया में न/न सिर्फ तेजी लाती है बल्कि इससे रीढ की हड्डी में भी विकार की संभावनाएं बढ़ जाती है। नाथ ने बताया कि घुटने को खराब होने से बचाने के लिये एचटीओ तकनीक से उपचार करना बेहद कारगर होता है। इसके आपरेशन से पहले घुटने की हालत को एक्सरे के द्वारा परखा जाता है और संरेखण के लिये जरूरी शल्य चिकित्सा में टीबिया में मामूली फ्रैक्चर किया जाता है। फ्रैक्चर के बाद हड्डी को दोनो ओर फैला दिया जाता है अौर उन्हे टाइटेनियम प्लेट से कस दिया जाता है जिससे घुटनों में पड़ने वाले भार एकसमान हो जाता है।उन्होंने बताया कि अॉपरेशन के बाद मरीज को कम से कम एक महीने तक आराम की सलाह दी जाती है। इसके बाद उसे रोजमर्रा के जरूरी काम करने को कहा जाता है जबकि छह महीने में मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर सभी काम निपटा सकता है।
चिकित्सक ने बताया कि इस विधि से हुयी शल्य चिकित्सा के बाद मरीज को कम से कम आठ से दस साल तक घुटनों के प्रत्यारोपण कराने से छुटकारा दिलाया जा सकता है और यदि मरीज सावधानी बरते तो वह पूरी जिंदगी बिना किसी प्रत्यारोपण के बसर कर सकता है। डॉ नाथ ने कहा कि घुटना प्रत्यारोपण के बाद मरीज कामोड मे ही नित्यक्रिया करने के लिये स्वतंत्र होता है जबकि एचटीओ के जरिये की गयी शल्य चिकित्सा के बाद मरीज देशी विधि से निर्मित शौचालयों में भी नित्यक्रिया के लिये जा सकता है।ऐसा इस कारण है क्योंकि वह अपने घुटनों को पूरी तरह मोड़ सकने में स्वतंत्र है। उन्होने कहा कि एचटीओ विधि से शल्य चिकित्सा में खर्च 20 हजार रूपये लेकर 80 हजार रूपये के बीच आता है। स्वदेश में निर्मित टाइटेनियम प्लेट बाजार में 10 हजार रूपये में उपलब्ध है जबकि आयातित प्लेट की कीमत करीब 40 हजार रूपये है। बाकी खर्चो में अस्पताल,दवायें और अन्य सामान शामिल हैं। चिकित्सक ने कहा कि एचटीओ तकनीक कम उम्र के मरीजों पर अधिक प्रभावी है। मरीज में गठिया के शुरूआती लक्षण देखकर तुरंत चिकित्सक से संपर्क साधना चाहिये। लंबे समय तक दर्द निवारक दवाओं का सेवन मरीज की सेहत पर न/न सिर्फ प्रतिकूल असर डाल सकता है बल्कि टेढ़ा चलने की प्रवृत्ति घुटनों को और खराब करने में मददगार होगी। अॉपरेशन पर जल्द जाने से इसके सफल रहने की संभावना 99 फीसदी तक रहती है।

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