मजदूरों के विस्थापन का मई दिवस

मजदूरों के विस्थापन का मई दिवस


जो मई दिवस दुनिया के मजदूरों के एक होने के आह्वान के साथ जुड़ा था, भूमण्लीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद वह किसान और मजदूर के विस्थापन से जुड़ता चला गया। मई दिवस का मुख्य उद्देश्य सामंती और पूंजी के शिकंजे से मजदूरों के बाहर आने के साथ उद्योगों में भागीदारी भी था। इससे किसान-मजदूरों को राज्यसत्ता और पूंजी के षडयंत्रकारी कुचक्रों से छुटकारा मिल सके। लेकिन भारत तो क्या वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी ऐसा संभव हुआ नहीं। यही कारण है कि करीब पौने दो सौ जिलों में आदिवासी व खेतिहर समाज में सक्रिय नक्लवाद भारतीय-राज्य के लिए चुनौती बना हुआ है।
हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के हमला बोलकर 26 जवानों को हताहत कर दिया। इसके पहले भी छत्तीसगढ़ में हुए दो हमलों में करीब एक सैकड़ा से ज्यादा जवान मारे जा चुके हैं। कुछ साल पहले ओडि़सा में भाजपा विधायक और छत्तीसगढ़ में कलेक्टर का अपहरण करके नक्सलवाद ने संविधान के दो स्तंभ विधायिका और कार्यपालिका को सीधी चुनौती पेश कर दी थी। दरअसल कथित औद्योगिक विकास के बहाने वंचित तबकों के विस्थापन का जो सिलसिला तेज हुआ है,उसके तहत आमजान आर्थिक बदहाली का शिकार तो हुआ ही, उसे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के भी संकट से जूझना पड़ रहा है। मसलन एक ओर तो उसकी अस्मिता कुंद हुई जा रही है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक नीतियों ने उसकी आत्मनिर्भरता को परावलंबी बनाकर आजीविका का संकट पैदा कर दिया है।
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फिरंगी हुकूमत के पहले भारत में यूरोप जैसा एकाधिकारवादी सामंतवाद नहीं था और न ही भूमि व्यक्तिगत संपत्ति थी। भूमि व्यक्गित संपत्ति नहीं थी, इसलिए उसे बेचा व खरीदा भी नहीं जा सकता था। किसान भू-राजस्व चुकाने का सिलसिला जारी रखते हुए भूमि पर खेती-किसानी कर सकता था। यदि किसान खेती नहीं करना चाहता है तो गांव मे ही सामुदायिक स्तर पर भूमि का आंवटन कर लिया जाता था। इसे मार्क्स ने एशियाई उत्पादन प्रणाली नाम देते हुए किसानी की दृष्टि से श्रेष्ठ प्रणाली माना था। किंतु अंग्रेजों ने भारत में वर्चस्व के बाद भू-राजस्व व्यवस्था में दखल देते हुए भूमि के साथ निजी स्वामित्व के अधिकार जोड़ दिए। भूमि के निजी स्वामित्व के इस कानून से किसान भूमि से वंचित होने लगा। इसके बाद किसान की हालात लगातार बदतर होती चली गई। वामपंथी मार्क्सवादियों ने दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा दिया, इसके उलट राष्ट्रीय स्वयं सेवक संगठन के आनुषांगिक संगठन भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी ने नारा दिया था कि आओ दुनिया को एक करें। इस नारे में जहां विश्व एकता की झलक मिलती है, वहीं मार्क्स के नारे में वर्ग संघर्ष का भेद स्पष्ट नजर आता है। यही वजह रही कि मजदूरों के एक होने के अभियान के दौरान एक बड़े पड़ाव जिस सोवियत संघ कई टुकड़ों में विभाजित हो गया।
आजादी के बाद सही मायनों में खेती, किसानी और मजदूर के वाजिब हकों को इंदिरा गांधी ने अनुभव किया। नतीजतन हरित क्रांति की शुरूआत हुई और कृषि के क्षेत्र में रोजगार बढ़े। 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा निजी बैकों और बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इस व्यवस्था में किसानों को खेती व उपकरणों के लिए कर्ज मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। शिक्षित बेरोजगारों को भी अपना लघु उद्योग लगाने के लिए सब्सिडी के आधार पर ऋण दिए जाने की मुकम्मल शुरूआत हुई। परिणामस्वरूप आठवें दशक के अंत तक रोजगार और किसानी के संकट धरातल पर हल होते नजर आए। लिहाजा ग्रामीणों में न तो असंतोष देखने को मिला और न ही शहरों की ओर पलायन हुआ। नरेन्द्र मोदी सरकार स्टार्ट अप और डिजीटल इंडिया के माध्यम से युवाओं को रोजगार के यही उपाय कर रही है।
इंदिरा गांधी के बाद ग्राम व खेती- किसानी को मजबूत किए जाने वाले कार्यक्रमों को और आगे बढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन उनकी हत्या के बाद उपजे राजनीतिक संकट के बीच राजीव गांधी ने कमान संभाली। उनके विकास का दायरा संचार क्रांति की उड़ान में सिमटकर रह गया। बाद में पीवी नरसिंह राव सरकार के वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के बहाने अमेरिकी नीतियों से उपजी नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करके किसान व मजदूर के हितों को पलीता ही नहीं लगाया, औद्योगिक और प्रौद्योगिक विकास के बहाने किसान मजदूर और आदिवासियों को विस्थापन के लिए विवश भी कर दिया। इसके चलते भूमिहीनता बढ़ी और सीमांत किसान शहरी मजदूर बनकर रह गया। आज उसके पास अपनी आवाज बुलंद करने के लिए किसी मजबूत संगठन की छत्रछाया ही नहीं बची रह गई है। बहुराष्ट्रीय उद्योगों में न तो उसकी नौकरी की गारंटी बची है और न ही काम करने के घण्टे तय हैं। मजदूरों के काम करने की जो कानूनी सीमा 8 घण्टे की है, उसके बदले में लोग 12 से 14 घण्टे तक काम करने को मजबूर हैं। उच्च शिक्षित भी अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बंधुआ मजदूर दिखाई देते हैं। यह स्थिति बेरोजगारी का भी एक बड़ा कारण बन रही है। क्योंकि एक व्यक्ति जब दो लोगों का काम करेगा तो नये लोगों को रोजगार कैसे मिलेगा? सरकार को इस बाबत सख्त कानूनी उपाय अमल में लाने की जरुरत है।
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महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई केवल सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं, व्यवस्था परिवर्तन के लिए लड़ी थी। अंग्रेजों द्वारा बनाई गई प्रशासनिक, शैक्षाणिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था भारत को कमजोर करके भारतीयों पर राज करने के लिए बनाई गई थी। इस नाते 1935 में भारत शासन अधिनियम को वजूद में लाकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई जो ‘‘बांटों और राज करो’’ के कुटिल सिद्धांत को अमल में आने वाली थी। इस व्यवस्था ने सामाजिक समरसता को तोड़ते हुए, समाज की परस्पर जोड़ऩे वाली कडिय़ों को दुर्बल बनाते हुए शासन-प्रशासन को शक्तिशाली और निरकुंश बना दिया है। नतीजतन लोकतंत्र की जिस व्यवस्था से भी हम नेता चुनते हैं, वह कुर्सी पर बैठते ही अंग्रेजों जैसा व्यवहार करने लग जाता है। जनता को बांटता है, लूटता है और सिर्फ राजनीति करता है। अधिकारी और कर्मचारी इसी लूट प्रणाली को औजार बनाकर जनता के शोषण में भागीदार बनते हैं। इसी कारण उससे जल, जंगल और जमीन छीनने में आसानी तो हुई ही, जो शिक्षित तबका था, उसे भी सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरियों में संविदा कर्मचारी बनाकर उसे बंधुआ मजदूर बनाने का काम करती है। वैश्वीकरण के बाद ये हालात इतने नाजुक हो गए कि शोषण से जुड़ा कोई भी वर्ग अपने हितों के लिए आवाज भी बुलंद नहीं कर पा रहा है। आज वे सभी राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठन नदारद हैं, जो कभी मजदूरों के हितों के लिए लाल झंडा उठाये फिरते थे। गोया समय की पुकार है कि किसान एवं मजदूर को फिर से जल जंगल और जमीन से जोड़ा जाकर प्राकृतिक संपदा के दोहन के आधार पर विकास की अवधारणा पर लगाम लगाई जाए।
-प्रमोद भार्गव

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