एक गंभीर रोग भी है चिंता

एक गंभीर रोग भी है चिंता

अक्सर लोग किसी न किसी बात को लेकर चिंता करने लगते हैं और इस संबंध में वे कहते हैं कि चिंता व्यक्ति की मनोवृत्ति है लेकिन यह सत्य नहीं है। चिंता व्यक्ति की मनोवृत्ति नहीं है, बल्कि एक मानसिक रोग है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे चिंता मनस्ताप कहते हैं और उचित इलाज के द्वारा ही इससे छुटकारा पाया जा सकता है। चिंता से पीडि़त व्यक्ति आपसी संबंधों के विषय में बहुत अधिक संवेदनशील होता है और छोटी-छोटी बातों में तनाव का शिकार हो जाता है। उसका मन एक स्थान पर केन्द्रित नहीं रहता तथा वह जीवन के महत्त्वपूर्ण मामलों में निर्णय नहीं ले पाता। ऐसे में व्यक्ति अकारण ही भयभीत रहता है। वह हर समय बेचैनी व निराशा से घिरा रहता है। रोगी को रात को ठीक से नींद भी नहीं आती। यदि नींद आ भी जाये तो वह नींद में भी चिंता से मुक्त नहीं होता। उसे नींद में भी बुरे सपने दिखायी देते हैं जो चिंता को बढ़ा देते हैं। ऐसे रोगी सपने में देखते हैं कि कोई व्यक्ति उन्हें मार रहा है या उनका पीछा कर रहा है और वे भागने का प्रयास करते हैं किंतु असफल रहते हैं। चिंता मनस्ताप के रोगी में आत्म-विश्वास का अभाव होता है। वे दूसरों की सलाह के बिना कोई भी निर्णय नहीं ले सकते और उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता है कि कहीं उनका निर्णय गलत न हो जाये। कुछ बच्चों को चिंता का रोग माता-पिता से प्राप्त होता है। मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के बाद पाया है कि यदि माता या पिता में से कोई चिंता से पीडि़त रहता है तो यह चिंता बच्चों के व्यवहार में स्थानांतरित हो जाती है और बाद में भी निरंतर बनी रहती है।
सहनशीलता निखारती है आपका व्यक्तित्व
 कुछ व्यक्तियों में पहले के दु:खद अनुभव भी चिंता का कारण बन जाते हैं। जब किसी व्यक्ति के प्रियजन की समय पूर्व मृत्यु हो जाती है तो वह इतना अधिक उदास हो जाता है कि दुबारा किसी की मृत्यु की खबर सुनने पर चिंता से ग्रस्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त अधिक से अधिक पैसा कमाने की होड़, निम्न जीवन स्तर, पति-पत्नी के टूटते रिश्ते आदि ऐसे अनेक कारण है जो चिंता मनस्ताप को जन्म देते हैं। ‘चिंता मनस्ताप’ का इलाज संभव है। गंभीर रूप से पीडि़त व्यक्ति को हल्के टैन्क्यूलाइजर्स दिये जाते हैं किंतु स्थायी उपचार की दृष्टि से मनोचिकित्सा ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। मनोचिकित्सक रोगी के मन में विश्वास उत्पन्न करता है। वह रोगी को चिंता के वास्तविक और काल्पनिक कारण समझाता है। फिर वह रोगी को उन परिस्थितियों से समायोजन करना सिखाता है जिनके कारण रोगी के मन में भय और चिंता का जन्म हुआ।
बच्चे का शुरु से ही करें सही मार्गदर्शन
  रोगी के शारीरिक लक्षणों को दूर करने के लिए मनोचिकित्सक औषधि के रूप में टैन्क्यूलाइजर्स का प्रयोग करते है। इससे धीरे-धीरे भावनात्मक तनाव में भी कमी आती है। इस तरीके से मनोचिकित्सक रोगी में आवश्यक धैर्य, साहस, विश्वास और सहनशक्ति का विकास करता है। स्वस्थ होने के पश्चात भी रोगी को नियमित रूप से मनोचिकित्सक से परामर्श लेते रहना चाहिए। इस प्रकार चिंता मनस्ताप से छुटकारा मिल जाता है।
-विक्रम सिंह भण्डारी

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