उपभोक्ता की सेहत पर एफडीआई का दंश…मिलावटखोरी का धंधा जारी है

उपभोक्ता की सेहत पर एफडीआई का दंश…मिलावटखोरी का धंधा जारी है

fdiकहानी मशहूर है, राजा साहब के पेट में दर्द हुआ तो राजवैद्य को बुलाया गया। जब राजवैद्य ने राजा साहब की पिछली खुराक मालुम की तो कहा गया कि उन्होंने चने का सेवन किया था। दुकानदार को तलब किया गया तो उसने कहा आड़त से खरीदे थे। आड़त वाले ने भी बताया कि किसान से खरीदे थे। बाद में किसान ने बताया कि चने का बीज खरीदकर जमीन से चना का पौधा उगाया गया था और फसल मंडी में बेची गई।  कुछ इसी तरह उपभोक्ता कानून और अवसरवादिता की भूल-भुलैया में जीवन कट रहा है। खाद्य पदार्थों में मिलावट का धंधा चल रहा था अब इसमें तरक्की हो चुकी है। दूध, घी में तो सप्लाई से अधिक मांग होने से मिलावट करनी पड़ रही है, लेकिन जो कंपनियां जमीन से पानी खींचकर पेयजल शीतलपेय बनाकर बेचती हैं। उन्होंने तो कमाल कर दिया है। पानी से मुनाफा कमाने के साथ जनजीवन से खिलवाड़ करने में कसर नहीं छोड़ी है। सरकार न तो मिलावट, जहरीले तत्व जो पेय पदार्थों में मिलाये जाते हैं उनपर लगाम लगा पा रही है और न इनकी कीमतों का ग्राफ नीचे ला पा रही है। जिंदगी की भागम-भाग, खेलकूद की स्पर्धा, सभाओं, बैठकों में सफाई स्वच्छता के लिहाज से विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादित पेय पदार्थों से मेजबानी करके हम गौरवान्वित हो रहे है।
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देश में एक समय आया था जब मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में 1977 में केंद्र में सरकार बनी थी, स्वदेशी पेय की लाबी ने इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेय को देश निकाला देने की हिम्मत की थी लेकिन उसका दुखद हश्र सभी को पता है कि थम्सअप की बोतलों का विकल्प तैयार जरूर हुआ लेकिन वह बदलाव स्थायी नही बन सका। स्वदेशी पेय की कल्पना की भ्रष्ट हत्या हो गई। स्वदेशी जागरण मंच ने बहुत जोर मारा, लेकिन जैसी की कहावत है कि खोटा सिक्का असल सिक्का को बाजार से बाहर कर देते हैं स्वदेशी पेय ज्यादा दम नहीं मार सके। लेकिन यह कहना भी सही नहीं है कि सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है। सरकार के बारे में माना जाता है कि जो सरककर (मंद गति से) चलती है वहीं सरकार होती है।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक जांच में पेप्सी, कोक, सेवनअप, स्प्राईट में जहरीले पदार्थ पाये गये। इनमें एंटीमनी, लेड, कैडमियम, क्रोमियम, डीएचईपी बहुतायत में पाये गये। जांच निष्कर्ष लंबे समय तक चर्चा में रहे कि इन जहरीले तत्वों का घातक प्रभाव तापमान बढऩे पर कई गुना बढ़ जाता है। फिर भी देखने में आता है कि इन पेय पदार्थों की शीशियां दुकानों के सामने जमें क्रेटों की शोभा बढ़ाती हैं। लिहाजा इनका घातक प्रभाव सभी की नजरों के सामने है, लेकिन सब चर्चा में ही रहा इसका कोई तर्क संगत जवाब नहीं मिला। ऐसा क्यों? बाद में 2006 में एक रिपोर्ट सेंटर फार इन्वायरमेंट ने जारी की जिसमें पुष्टि की गई कि कोकाकोला और पेप्सी में जहरीले तत्वों की प्रचुरता है। इस रिपोर्ट में तो बताया गया कि जहरीले पदार्थों की तादाद निरन्तर बढ़ती जा रही है। 57 से अधिक जो सेंपल लिये गये थे उनमें तीन से पांच कीटनाशकों की तादाद 24 गुना अधिक है। सेन्टर फार साईंस एंड इन्वायरमेंट की रिपोर्ट पर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात की सरकारों ने प्रशासनिक पाबंदी लगाते हुए कहा कि इन पेय पदार्थों के परोसे जाने पर सेहत को खतरा है। शैक्षणिक संस्थाओं की केन्टीनों से भी ये बाहर कर दिये गये। वणिक उत्साह से प्रेरित फिक्की इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पैरोकारी में आगे आ गई और उसने केंद्र और राज्यों से कहा कि यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों पर इस तरह प्रतिबंधात्मक कार्यवाही जारी रही तो विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर असर पड़ेगा। विदेशी निवेश के लिए सभी पलक पावड़े बिछाने में लगे है। फिक्की ने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी। जिस कमेटी के सामने इन पेय पदार्थों में जहरीले तत्वों की मिलावट की समीक्षा करने का दायित्व था उसकी अध्यक्षता शरद पवार ने की थी।संसदीय समिति ने रिपोर्ट दी थी कि शीतल पेयों में कीटनाशकों के अवशेष हैं। इस समिति की रिपोर्ट को झुठलाने का कंपनियों ने साहस दिखाया था और कहा कि खामी इन पेयो में मिलाई गई चीनी की है जो मेड इन इंडिया है। उत्पाद में कतई खामी नही है, इस पर किसी ने अपने स्वाभिमान को आहत नहीं पाया।सवाल यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने पेय पदार्थों की गुणवत्ता सुधारने का कष्ट क्यों गंवारा नहीं किया उल्टा दोष भारतीय चीनी पर डाल दिया। भारतीय उद्यमिता पर भी सवाल उठता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन के साथ देशी कंपनियां स्पर्धा से बाहर क्यों हो जाती हैं? साफ्ट ड्रिंक के बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार चल रहा हैं सरकार उदासीन है उद्यमिता हारी थकी सी लगती है। स्वदेशी का राग अलापना हमारा शगल है, लेकिन भारतीय उद्यमिता न तो भारतीय पेयों की ओर जनता को आकृष्ट कर पा रही है और न उपभोक्ताओं में स्वदेशी की प्रतिबद्धता विदेशी पेयों को देश निकाला दे सकती हैैं। प्रामाणिकता दूर की बात है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि दुग्ध उत्पादों में धड़ल्ले से मिलावट चल रही हैं हमारी निगरानी व्यवस्था लकवा ग्रस्त है। उदाहरण के तौर पर पानी में दूध मिलाने के अपराध में जब कभी मिलावट का मामला पकड़े जाने की खबर भी आ जाती है। तीज त्यौहारों पर नकली मावा पकड़े जाने की खबरे सुर्खियों में मिलेगी लेकिन इसका उत्पादन करने वालों को  न तो हम दंडित कर पा रहे हैं और इस न ही इस गौरखधंधे को रोक पा रहे हैं। सेहत, देश और समाज को लेकर यह हमारी प्रतिबद्धता पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
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 नीम पर चढ़ा करेला- विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यह बात जानता है कि कोल्ड ड्रिंक सेहत के लिए खतरनाक है। जाहिर है कि उसे यह भी मालूम है कि ये कोल्ड ड्रिंक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई करने की उपज है। आम के आम गुठलियों के दाम। इनका एक ही सरोकार है कि विकासशील देशों में विज्ञापन से ग्राहकों में आकर्षण पैदा करना। खिलाडिय़ों, सिने स्टारों को एम्बेसडर बनाकर भावनात्मक दोहन करना। बदले में विकासशील देशों के उपभोक्ताओं की सेहत से खिलवाड़ करना। कोल्डड्रिंक्स के सेवन से मोटापा बढ़ता है। डायबिटीज का खतरा बढ़ता है। डब्ल्यू एच ओ ने मर्ज की जड़ को उखाडऩे के बजाय राय दी है कि कोल्ड ड्रिंक्स को महंगा कर दिया जाये जिससे बच्चे और अन्य को खरीद पाना कठिन हो जायेगा।कोल्ड ड्रिंक्स के सेवन से जो दुष्परिणाम सामने आये हैं उनमें कहा गया है कि 1980 के मुकाबले मोटापे के शिकार उपभोक्ताओं की संख्या दो गुना बढ़ी है। 30 प्रतिशत मधुमेह, 40 प्रतिशत स्ट्रोक, इतने ही हार्टअटेक, 50 प्रतिशत किडनी की खराबी से परेशान हुए हैं। 1980 में जहां मधुमेह की शिकायत 10.8 करोड़ लोगों को थी वह बढ़कर 2014 में 42.2 करोड़ हो गई है। डब्ल्यूएचओ ने कोल्ड ड्रिंक्स की कीमत में 20 प्रतिशत इजाफा कर कारपोरेट की समृद्धि बढ़ाने की सिफारिश कर जन स्वास्थ्य की चिंता का ढोंग किया है। मिलावटखोरी का धंधा जारी है। निवेश से विकास का पहिया घूम रहा है और हम पीछे से आगे बढ़ रहे है। (विनायक फीचर्स) आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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