उत्तर प्रदेश में बहुत वर्षों से रूका पड़ा है विकास का रथ…उम्मीद से देख रहे किसान.!

उत्तर प्रदेश में  बहुत वर्षों से रूका पड़ा है विकास का रथ…उम्मीद से देख रहे किसान.!

 चुनाव के समय सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी प्राथमिकताएं गिनाते हुए घोषणा पत्र जारी करते हैं। इस बार जब उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं तो उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों ने अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र जारी किये। किसी पार्टी ने प्रेशर कुकर देने का वादा किया तो किसी ने बेरोजगारी भत्ता और बच्चों को देशी घी। यह सब सुनने में अच्छा लगता है लेकिन एक अंग्रेजी कहावत हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए जिसका तात्पर्य है कि आप मुझे मछली खाने के लिए मत दीजिए बल्कि मुझे मछली पकड़ना सिखा दीजिए ताकि मैं उम्र भर मछली पकड़कर खुद खाऊं ओर दूसरों को भी खिलाऊं। इस कहावत का सार यदि समझा जाए तो ये है कि हम लोगों की मदद करें ताकि वह इतना सक्षम हो जाए कि दूसरों की भी मदद कर सके। इसके विपरीत यदि हम किसी को बिना मेहनत के सुख-सुविधा देते हैं तो उसे काहिल, अकर्मठ बना देंगे और वह हमेशा मदद मिलने की अपेक्षा करता रहेगा। उत्तर प्रदेश के लिए भाजपा ने जो संकल्प पत्र जारी किया है उससे लगता है कि वह लोगों को मछली खाने के लिए नहीं दे रही बल्कि लोगों को मछली पकड़ना सिखाना चाहती है।
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उत्तर प्रदेश में विकास का रथ बहुत वर्षों से रूका पड़ा है। गंगा-यमुना के दोआबे में बसा यह प्रदेश, बुंदेलखण्ड और पूर्वांचल को छोड़ा जाए तो कृषि के मामले में सबसे धनाढ्य है। इसके बावजूद यहां खेतों से अमूमन दो ही फसलें ली जाती हैं। किसानों को समय पर खाद-पानी नहीं मिलता और फसल जब तैयार होती है तो उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। गेहूं और धान के खरीद केन्द्र खोले जरूर जाते हैं लेकिन वहां किसानों की उपज नहीं खरीदी जाती बल्कि बिचौलिये किसानों से औने-पौने दाम पर उपज खरीद कर सरकारी न्यूनतम मूल्य प्राप्त कर लेते हैं। गन्ना किसानों की बदहाली जितनी उत्तर प्रदेश में हुई उतनी कहीं नहीं हुई होगी। इसका नतीजा यह हुआ कि गन्ने की खेती अब कम की जाती है। गन्ना किसानों को अब तक पुराना बकाया नहीं मिल सका है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में कृषि, किसान और खेतिहर मजदूर-तीनों के विकास के लिए हर स्तर पर प्रयास करने का वादा किया है। किसानों के लिए कहा गया है कि सभी लघु एवं सीमांत किसानों को फसली ऋण से मुक्ति दे दी जाएगी। इस तरह के किसानों को आगे से ब्याजमुक्त फसली ऋण दिया जाएगा। बड़े किसानों के सामने उतनी समस्या नहीं होती है जितनी लघु सीमांत किसानों को क्योंकि बड़े किसानों के पास अपने संसाधन होते हैं और दैवी आपदा से यदि उनकी एक फसल बर्बाद हो गयी तो कोई बड़ा झटका नहीं लगता लेकिन जिसके पास थोड़ी जमीन है और उसमें अच्छी फसल उगाने के लिए उसने कर्ज लेकर खाद डाली, सिंचाई के पैसे दिये और वही फसल सूख गयी अथवा बारिश-ओलों की भेंट चढ़ गयी तो वह किसान तो पूरी तरह बर्बाद ही हो जाता है। ऐसे ही किसान कभी-कभी परेशान होकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। सरकार यदि ऐसे किसानों के बारे में सहानुभूति रखे तो उनका कष्ट कुछ कम किया जा सकता है।
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प्रदेश में गन्ना किसान अर्से से असंतुष्ट हैं और उनकी नाराजगी जायज भी है। गन्ना बोने से पूरे वर्ष के लिए खेत फंस जाता है लेकिन किसानों के लिए यह नकदी फसल मानी जाती है। बच्चे गन्ना खाते हैं, रस पीते हैं और गुड़ बनाकर रख लिया जाता है। इसके साथ ही चीनी मिल वालों को गन्ना बेचा जाता है। इसकी कमायी उतनी हो जाती है जितनी वर्ष में दो फसलें उगाकर की जा सकती हैं। इस प्रकार किसान को संतोष हो जाता है कि ज्यादा झंझट भी नहीं करना पड़ा, कमायी भी हो गयी। समस्या तब खड़ी होती है जब किसान को गन्ने का मूल्य नहीं मिल पाता। खर्चे तो रूकते नहीं हैं लिहाजा किसान को महाजन से कर्ज लेना पड़ता है और अधिक दर पर ब्याज चुकाना होता है जबकि उसका अपना पैसा चीनी मिल मालिको ंके पास पड़ा हुआ है जिस पर कोई ब्याज भी नहीं मिलना है। इसी कोफ्त में कितने ही किसानों ने गन्ना बोना छोड़ दिया। इससे उनको भी तकलीफ है क्योंकि बच्चे गन्ने के रस, गुड़ को तरस जाते हैं। किसान के लिए ये चीजें खरीदना बहुत महंगा और अजीबो गरीब भी लगता है। क्योंकि जो चीज किसान स्वयं पैदा करे उसे ही बाजार से खरीदने का मन नहीं होता। गन्ना किसानों की इसी समस्या को समझते हुए भाजपा ने अपने संकल्प पत्र मेेें कहा है कि गन्ना किसानों को फसल बेचने के 14 दिन अर्थात दो सप्ताह के अंदर ही पूरा भुगतान सुनिश्चित करने की व्यवस्था सरकार द्वारा लागू की जाएगी। यह भी कहा गया है कि भाजपा की सरकार बनने के 120 दिनों के भीतर अर्थात तीन महीने के अंदर ही बैंकों और चीनी मिलों के समन्वय से गन्ना किसानों की वर्षों पुरानी बकाया राशि का पूर्ण भुगतान कराया जाएगा। इससे प्रदेश के पश्चिमी भाग और पूर्वांचल जहां गन्ने की बम्पर खेती होती है, वहां के किसानों को राहत मिली होगी क्योंकि अब तक उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। गन्ना किसानों को गन्ने का समर्थन मूल्य पाने के लिए भी आंदोलन करना पड़ता है। इस तरह एक तरफ गन्ना उगाने वालों का जहां उत्साह बढ़ेगा वही जिन किसानों ने गन्ना उगाना बंद कर दिया है उन्हें गन्ना उगाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
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भाजपा ने किसानों की आमदनी 2022 तक दो गुनी करने की रणनीति बनायी है। इसके लिए सिंचाई व्यवस्था को दुरूस्त किया जाएगा और उपज को सरकारी खरीद मूल्य पर खरीदा जाएगा। मौजूदा समय में कितने ही किसानों का धान घरों में रखा हुआ है क्योंकि सरकारी खरीद मूल्य 1400 रूपए पर क्रय केन्द्र खरीद नहीं रहे और गांवों में व्यापारी सात-आठ सौ से ज्यादा दे नहीं रहे हैं। कुछ मजबूर किसानों ने सस्ते में धान बेच भी दिया है अब भाजपा का यह आश्वासन कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की धान की खरीदारी की व्यवस्था करेगी इससे किसानों का धैर्य बढ़ा है और वे सस्ते दाम पर धान नहीं बेच रहे हैं भाजपा कृषि का बुनियादी ढांचा ही बदलने की बात कह रही है जिससे एक नई हरित क्रांति की उम्मीद की जा सकती है।
कृषि के साथ ही पशुपालन और दुग्ध विकास को बढ़ावा देने की बात भी गांवों के विकास के लिए जरूरी है। पहले गांवों में दिन ढलने के समय चारागाहों से लौटती गाएं और भैंसें एक मनमोहक दृश्य उपस्थित करती थीं। अब गांवों में पशुओं की संख्या सीमित हो गयी है। उत्तर प्रदेश में पशुधन की संख्या में अभूत पूर्व गिरावट आयी है। इसका एक कारण पशुओं की अवैध तस्करी भी है। भाजपा ने अवैध कत्लखानों को पूरी तरह से बंद करने की घोषणा की है। इस प्रकार यह उम्मीद की जा रही है कि उत्तर प्रदेश में किसानों के हालज्ञत बेहतर होंगे और गांवों की वही रौनक फिर से लौटेगी जिसके बारे में किसी कवि ने कहा था-
अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न यहां सबका मन भाए। (हिफी) 

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