”उत्तर प्रदेश-चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा”

”उत्तर प्रदेश-चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा”

उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में घमासान मचा है। चुनाव का अंतिम चरण भी समाप्त हो गया है। सभी राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत के साथ वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने में जुटे हैं, यह तो 11 मार्च को ही पता चल सकेगा कि यूपी की सत्ता किसके हाथ में होगी तथा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन विराजमान होगा। सभी दल अपनी 300 से अधिक सीटों का दावा कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सभी दलों को पसीने आ रहे हैं और अन्दर से सभी दल घबराये हुए हैं।
सन् 2006 में बसपा की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ मायावती के नेतृत्व में बनी तो 2012 में मुलायम सिंह के नेतृत्व में सपा जीती और उन्होंने अपने पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया, लेकिन 2 वर्ष बाद ही 2014 में लोकसभा के चुनाव में पूरे देश में मोदी की ऐसी लहर चली कि केन्द्र में भी भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तथा उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 73 भाजपा ने जीतकर एक कीर्तिमान स्थापित किया। बसपा तो अपना खाता तक नहीं खोल सकी, वहीं कांग्रेस केवल अपनी दो सीट ही बचा सकी तथा सत्ताधारी सपा भी केवल अपने परिवार की 5 सीटें ही बचा सकी।
आज 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में किसी दल की लहर नहीं है। कुछ चैनल बसपा को तीसरे स्थान पर दिखा रहे हैं, किन्तु बसपा को कम आंकना भी ठीक नहीं। मायावती ने स्वर्ण, दलित एवं मुस्लिम का गठजोड करने का जो प्रयास किया है। यदि वह उसमें सफल होती है तो वह भारी पड सकती है, किन्तु मुस्लिम वर्ग अधिकांश आज भी सपा के साथ है।
इधर अखिलेश यादव ने सपा की कमान मुलायम सिंह से अपने हाथ में लेकर केवल मुस्लिम यादव के समीकरण से अपने आपको ऊपर उठाकर युवा वर्ग के प्रतिनिधि एवं विकास पुरूष के रूप में प्रस्तुत किया है तथा कांग्रेस के साथ गठबंधन करके 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी के संकेत भी दिये हैं। यद्यपि वर्तमान में कांग्रेस के पास कोई जन आधार नहीं है। फिर भी 2019 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए कि दो युवाओं के एक साथ मिलने से युवा वर्ग को आकर्षित करने में यह फायदे की रैलियां की हैं। यदि साथ में इसी प्रकार प्रियंका भी खुलकर चुनाव में पूरे प्रदेश में प्रचार करती तो इन चारों का युव वर्ग को आकर्षित करने में और अधिक असर होता। इस चुनाव में युवाओं की संख्या बहुत अधिक है और वे किसी भी दल को एक निर्णायक जीत की ओर ले जाने में सक्षम है।
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इसमें कोई संदेह नहीं की मुख्यमंत्री अखिलेश विगत 2-3 वर्षों में अपनी एक अलग छवि बनाने में सफल रहे हैं। माफियाओं एवं गुण्डों को दूर रखने की हिम्मत दिखाई है। मगर यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था बहुत खराब है, जिसके लिए अखिलेश सरकार 100 नम्बर की गाडी चारों ओर रखकर उसे सुधारने का प्रयास किया है तथा कुछ अन्य विकास के कार्य भी किये हैं। उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। इसीलिए प्रदेश का चुनाव होते हुए भी प्रधानमंत्री ने दो दर्जन के करीब रैलियां की हैं। भाजपा केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सहारे ही अपनी चुनावी वैतरणी पार करने की आशा लगाये बैठी है। यह विडम्बना ही है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास कोई कद्दावर नेता नहीं, जिसे वे मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर कसें, चूंकि राजनाथ सिंह व कलराज मिश्र जैसे लोग केन्द्र में मंत्री हैं। प्रधानमंत्री वाराणसी में लगातार तीन दिन तक डेरा लगाये रहे, चूंकि वह उनकी लोकसभा की सीट भी है। अत: वहां प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। लोकसभा सीट के अन्तर्गत आने वाली विधानसभा सीटों पर जीत पक्की करना उनके लिए सबसे बडी चुनौती है, इसीलिए केन्द्र के 15 से अधिक मंत्री भी वहां डेरा डाले हुए थे।
उत्तर प्रदेश बहुत बडा प्रदेश है यहां भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न समस्याएं हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रूहेल खण्ड, बुन्देलखण्ड, पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुकाबले पूर्वांचल में खेती भी उतनी अच्छी नहीं हैं तथा रोजगार के लिए अधिक उद्योग भी नहीं हैं। अत: हर क्षेत्र के लोग अपनी समस्याओं के आधार पर वोट करेंगे। इस चुनाव में नोटबंदी कितना प्रभाव डालती है, यह देखना होगा। चूंकि विपक्षी दल इसे भी चुनाव में पूरे जोर से प्रचारित कर रहे हैं। यद्यपि भाजपा को जनता के सामने ताल ठोककर यह कहने का मौका मिल गया है कि इसका कोई प्रभाव नहीं पडा है। उडीसा, गुजरात एवं महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनाव में उसे भारी जीत मिली है, किन्तु उत्तर प्रदेश में इसका प्रभाव पडा है या नहीं यह चुनाव परिणाम ही बतायेंगे।
इस चुनाव का दिलचस्प पहलू यह भी रहा है कि दूसरे चरण के मतदान के पश्चात ही कुछ दलों द्वारा मतों का धु्रवीकरण करने का हर सम्भव प्रयास किया गया। विकास एवं जन कल्याण मुद्दे छोडकर केवल धर्म एवं जातीय समीकरण पर अधिक जोर दिया गया। चुनावी भाषणों में कब्रिस्तान, शमशान व कसाब की चर्चा धु्रवीकरण का प्रयास नहीं तो क्या है।
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चुनाव परिणाम कुछ भी हो, कोई दल भी सत्ता में आये, किन्तु इस चुनाव के दौरान सभी दलों के दिग्गजों से जनता को जो सुनने को मिला वह राजनीति के गिरते स्तर की पराकाष्ठा थी। जिम्मेदार व्यक्तियों को अपनी वाणी पर बहुत अधिक संयम बरतने की आवश्यकता होती है। जिन लोगों ने 1952 से लेकर आज तक पूर्व में सभी दलों के नेताओं को सुना होगा तो निश्चय ही उन्हें दुख हुआ होगा। दलों के नेताओं को जनता के सामने अपने-अपने दल की क्यों प्रदेश के विकास के लिए योजनाएं हैं। युवाओं के लिए क्या कार्यक्रम है। मजदूर व किसान खेती के लिए क्या योजनाएं हैं।
शिक्षा एवं स्वास्थ्य के विषय में क्या करना चाहते हैं। इन सब बातों को छोडकर गधों पर चर्चा कर रहे हैं। एक दूसरे पर व्यक्तिगत कटाक्ष व आक्षेप लगा रहे हैं। आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं। इससे वे जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं। इससे लिए सभी दल बराबर के जिम्मेदार हैं और सभी को इस पर गम्भीर मंथन की आवश्यकता है।
इस चुनाव में मुस्लिम वोट भी बहुत महत्व रखते हैं यदि वे थोक में सपा गठबंधन पर जाते हैं, तो उसकी जीत की सम्भावना बनेगी यदि बसपा के साथ जाते हैं तो उसे फायदा पहुंचायेंगे और यदि उनका अधिक बिखराव होता है तो उसका फायदा भाजपा को मिलेगा। चुनाव इस बार त्रिकोणीय है यदि किसी गठबंधन या दल पूर्ण बहुमत मिलता है तो यह बडा चमत्कार होगा और यदि त्रिशंकु विधानसभा बनती है तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। सही पता 11 मार्च को ही चलेगा कि चुनावी ऊंट उत्तर प्रदेश में किस करवट बैठता है।
डा. विष्णु दत्त भारद्वाज, मुजफ्फरनगर

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