ईवीएम में नहीं, खुद की खोट तलाशें राजनीतिक दल

ईवीएम में नहीं, खुद की खोट तलाशें राजनीतिक दल


उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में राजनीतिक चमत्कार हो गया है। सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए यह बड़ी बात है। असंभव संभव कैसे हो सकता है? यही सवाल, यही चिंता विपक्ष को अंदर तक खाए जा रही है। उसका विश्वास ही नहीं, आत्मविश्वास भी टूटा है। जिन परंपरागत मतों को उन्होंने अपनी जागीर समझ लिया था, वे भी उनसे छिटक जाएंगे, इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। कांग्रेस के पास तो जीतने के लिए अपना कुछ था ही नहीं। सपा से गठबंधन ने उसकी थोड़ी साख बचा दी। उसके सात विधायक तो चुन ही लिए गए। शून्यता से यह स्थिति तो बेहतर ही है। चिंता अखिलेश को हो सकती है, मायावती को हो सकती है। अखिलेश के पास प्रदेश का यादव मत था और मायावती के पास दलित मत। एक ने यादवों को महत्व दिया और दूसरे ने दलितों को लेकिन यादवों और दलितों को लाभान्वित करते वक्त वे इन जातियों के वर्गीकरण में नहीं गए। यादव तो लाभान्वित होते रहे लेकिन डंड़होरों को आजादी के बाद से आज तक कोई सुविधा नहीं मिली। अहीरों को ही राजनीतिक वरीयता मिली। भाजपा ने इस बार डंड़होरों को भी साधा। यही हाल मायावती का भी रहा, उन्होंने अपने शासन में जाटवों को ही महत्व दिया। शेष दलित बिरादरियों का कोई पुरसाहाल नहीं रहा। वे खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे। अति दलितों और अति पिछड़ों को राजनीतिक महत्व देकर, उनके बीच काम करके भाजपा ने महा जीत का यह मुकाम हासिल किया है। अपनी हार का कारण मायावती भी जानती हैं और अखिलेश भी लेकिन मायावती को यह बात पच नहीं पा रही है कि दलित उनके खिलाफ कैसे जा सकते हैं? वे शायद भूल जाती हैं कि जिसकी उपेक्षा होती है, वह कुछ भी कर सकता है।
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‘ जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देई।’ यही बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। अखिलेश और मायावती इस मुगालते में रहे कि मुसलमानों का मत उन्हें ही मिलेगा लेकिन यह मत बंट गया और भाजपा मुसलमानों के सापेक्ष हिंदू मतों के एकीकरण में कामयाब रही। सपा और बसपा ने यादव मुस्लिम और यादव दलित कार्ड खेले जबकि भाजपा ने इसके इतर समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया। उसने अति दलित और अति पिछड़ा कार्ड खेला और इस दिशा में तीन साल पहले से ही उसने तैयारी शुरू कर दी थी। इसका भी उसे विधानसभा चुनाव में भरपूर लाभ मिला। बसपा प्रमुख मायावती अगर यह कह रही हैं कि ईवीएम ने बसपा को चुनाव हरवा दिया तो यह उनकी गलतफहमी है या फिर खिसियाहट ही है। लोकसभा चुनाव में तो कांग्रेस सत्ता में थी। अगर ईवीएम में गड़बड़ी संभव होती तो वह भाजपा को चुनाव जीतने ही क्यों देती? जो लोग ईवीएम में गड़बड़ी की बात कर रहे हैं, वे या तो इस बहाने जनता को गुमराह कर रहे हैं या फिर उनका खुद पर से विश्वास उठ गया है। अन्यथा वे इस तरह बिना सिर- पैर की बातें तो नहीं ही करते। मोदी सरकार अगर ईवीएम में छेड़छाड़ करती तो पंजाब में कांग्रेस की सरकार कैसे बनती? मणिपुर और गोवा में कांग्रेस के विधायकों की तादाद उससे ज्यादा क्यों हो जाती? क्या वह चाह रही थी कि कांग्रेस वहां बड़ी पार्टी बने और भाजपा छोटे-छोटे दलों से समझौता कर सरकार बनाए और विपक्ष खासकर कांग्रेस का विरोध झेले? मायावती और उनकी पार्टी भले ही ईवीएम को अपनी हार के लिए दोषी ठहराएं, इसके खिलाफ आंदोलन करें लेकिन यह बात जनता के गले उतरने नहीं जा रही है। अखिलेश यादव भी विरोध की गोमती में लगे हाथ डुबकी लगा लेना चाहते हैं। उनका मानना है कि अगर मायावती कह रही हैं कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है तो ईवीएम की जांच करा लेनी चाहिए। दिल्ली नगर निगम के चुनाव मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईवीएम से नहीं कराना चाहते। उन्होंने मुख्य सचिव को निर्देशित किया है कि वे चुनाव आयुक्त से बैलेट पेपर से चुनाव कराने के बारे में आदेश प्राप्त करें। कांग्रेस नेता अजय माकन भी कमोवेश इसी राय के हैं।
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गिरगिट को देखकर गिरगिट रंग बदलता है, यह कहावत तो सुनी थी लेकिन राजनीतिक दल भी अपनी सुविधा के संतुलन के लिहाज से रंग बदलते हैं, ईवीएम पर आरोप के मामले ने यह बात साबित भी कर दी है और राजनीतिक दलों की खोट का भी पर्दाफाश कर दिया है। ईवीएम से छेड़छाड़ की बात इसलिए भी गलत है कि ईवीएम के साथ कोई इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता। इसलिए ऑनलाइन उसे हैक किए जाने का सवाल ही नहीं उठता। किस बूथ पर कौन सा ईवीएम जायेगा, यह भी अचानक तय होता है। सभी ईवीएम को पहले लोकसभावार फिर विधानसभा वार और सबसे अंत में बूथवार निर्धारित किया जाता है और पोलिंग पार्टी को एक दिन पहले ही पता चल पाता है कि उसे किस सीरिज का ईवीएम मिला है। प्राथमिक तौर पर ईवीएम में दो मशीन होती है, बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट। फिलहाल इसमें एक और यूनिट वीवीपीएटी भी जोड़ दी गई है जो सात सेकंड के लिए मतदाता को एक पर्ची दिखाती है, इस तरह यह बताती है कि मतदाता ने अपना वोट किस अभ्यर्थी को दिया है। ऐसे में अभ्यर्थी बूथ पर ही आश्वस्त हो सकता है कि उसका वोट सही पड़ा है या नहीं। मतदान से पहले सभी ईवीएम की गोपनीय जांच की जाती है और सभी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही ईवीएम का इस्तेमाल किया जाता है। मतदान से पूर्व मतदान केन्द्र की पोलिंग पार्टी द्वारा सभी उम्मीदवारों के मतदान केन्द्र प्रभारी या पोलिंग एंजेट के सामने मतदान शुरू करने से पहले मॉक पोलिंग की जाती है और सभी पोलिंग ऐजेंट से मशीन में वोट डालने को कहा जाता है ताकि यह जांचा जा सके कि सभी उम्मीदवारों के पक्ष में वोट गिर रहा है कि नहीं। ऐसे में यदि किसी मशीन में टेंपरिंग या तकनीकी गड़बड़ी होगी तो मतदान आरंभ होने के पहले ही पकड़ में आ जाएगी। मॉक पोल के बाद सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट मतदान केन्द्र की पोलिंग पार्टी के प्रभारी को सही मॉक पोल का सर्टिफिकेट देते हैं और इसके मिलने के बाद ही संबंधित मतदान केन्द्र में मतदान आरंभ होता है। इतने सबके बाद भी अगर विपक्ष को लगता है कि ईवीएम मशीन में गड़बड़ी संभव है तो यह उनके दिमाग का दिवालियापन ही है। उन्हें किसी भी तरह का आरोप लगाने से पूर्व अपने चुनाव अभिकर्ताओं से तो तस्दीक कर लेनी चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर माॅक पोल की सत्यता का प्रमाण दिया था। एक भोजपुरी गीत है-‘ रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे।’ रेल अपने साथ उसी को ले जाती है, जो उस पर सवार होता है। स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुंचा व्यक्ति भी अगर ट्रेन में चढ़े नहीं या चढ़कर डिब्बे से उतर जाए तो उसे ट्रेन अपने साथ नहीं ले जा सकती। कमोवेश यही बात इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन पर भी लागू होती है। मशीन में वही वोट पड़ते हैं जो डाले जाते हैं। मशीन पक्षपात नहीं करती। जो भी पार्टी हारती है, उसे मशीन के सही और गलत होने पर संदेह हो सकता है लेकिन सारी मशीनें गलत ही हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। ईवीएम के इस्तेमाल से चुनाव कराना कितना आसान हो गया है। चुनाव खर्च घटा है। परिणाम आने में भी सहूलियत होती है। इसमें गड़बड़ी की संभावना नहीं के बराबर होती है। जो भी राजनीतिक दल ईवीएम के इस्तेमाल का विरोध कर रहे हैं, वे इसकी उपयोगिता को समझ नहीं पा रहे हैं। देश इक्कीसवीं सदी में जी रहा है और नेता बाबा आदम के जमाने के दौर से उबरना ही नहीं चाहते। उत्तर प्रदेश में भाजपा अपार बहुमत के साथ विधानसभा चुनाव जीत चुकी है लेकिन विपक्ष को यकीन नहीं हो पा रहा है कि ऐसा कैसे हो सकता है। उसने नोटबंदी से बैकों में कतारबद्ध भीड़ देखी है। उसने लोगों को परेशान होते देखा है। इतनी परेशानी झेलकर भी क्या कोई भाजपा को मत दे सकता है, यह सवाल विपक्ष को अंदर तक खाए जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की निर्बाध जीत का वह अभी तक कारण नहीं तलाश पाई है। मुस्लिम मतों का विभाजन हो गया, यह बात तो समझ में आती भी है लेकिन मुस्लिम मत भाजपा को भी मिल सकते हैं, यह तो किसी ने सोचा भी नहीं था।
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मुस्लिम मतदाता भी परेशान हैं कि उनके अपने घर में भाजपा ने तीन तलाक पर प्रतिबंध के हथियार से कैसे सेंध लगा दी। मुस्लिम मतदाताओं को पता भी नहीं चला और उनके घर से वोट भाजपा की झोली में गिर गए। यादवों के साथ भी कमोवेश ऐसा ही हुआ। यादव अपना नेता मुलायम सिंह यादव को मानते रहे हैं और मुलायम सिंह यादव ने केवल तीन प्रत्याशियों शिवपाल यादव, अपर्णा यादव और पारसनाथ यादव के पक्ष में प्रचार किया। कुल जमा चार जनसभाएं कीं। मतलब साफ था कि जब अखिलेश यादव से मुलायम सिंह ही नाराज हैं तो वे अखिलेश को अपना मत क्यों दें? जहां उन्हें लगा कि अखिलेश यादव की पार्टी नहीं जीत रही है, वहां उन्होंने बसपा के प्रति अपना विश्वास जाहिर करने की बजाय भाजपा का समर्थन कर दिया। अखिलेश यादव को अपने पिता मुलायम सिंह यादव को उस बात पर गौर करना चाहिए कि हम जनता को अपनी बात समझा नहीं पाए लेकिन अखिलेश यादव ने उसका भी गलत अर्थ निकाला। उन्होंने यहां तक कह दिया कि उत्तर प्रदेश की जनता समझने से नहीं, बहलाने से वोट देती है। यह जनता-जनार्दन का अपमान भी है और उसके विवेक पर सवाल भी। अखिलेश यादव को अपनी बात बतानी चाहिए कि वे ईवीएम से संतुष्ट हैं या नहीं। दरअसल यह ईवीएम में गड़बड़ी का नहीं, जनता की पसंद और नापसंद का मामला है। हालिया चुनाव नतीजे ने मायावती की राज्यसभा जाने की संभावना पर भी ब्रेक लगा दिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव का भी राजनीतिक गणित गड़बड़ा गया है। उनके सामने मनचाहे ढंग से अपने लोगों को राज्यसभा में भेजने का संकट तो है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में वे नेता प्रतिपक्ष भी खुद बन पाने की हैसियत में नहीं हैं। आजम खान और शिवपाल यादव में वे इस पद के लिए किसे तरजीह देंगे, यह उनके समक्ष बड़ी चुनौती है। ईवीएम में खोट तलाश रहे नेताओं को अपना कार्येतिहास जानना चाहिए और आत्ममूल्यांकन करना चाहिए। अपनी आत्मा से बड़ा और बेहतर परीक्षक दूसरा नहीं होता। काश, राजनीतिक दल हार पर सही मंथन कर पाते।-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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