ईवीएम में खोट तलाशना जनादेश की भावना पर चोट

ईवीएम में खोट तलाशना जनादेश की भावना पर चोट

आठ राज्यों की दस विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजे आ गए हैं। पांच विधानसभा सीटों पर भाजपा, तीन पर कांग्रेस, एक पर झारखंड मुक्ति मोर्चा और एक सीट पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव जीत गए हैं। भाजपा एक बार फिर फायदे में रही है। दिल्ली के राजौरी गार्डेन सीट से आम आदमी पार्टी को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा है। आप उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई है। मध्यप्रदेश की भिंड जिले की अटेर विधानसभा क्षेत्र की ईवीएम में गड़बड़ी का मामला जोर-शोर से उठा था। उस सीट पर भाजपा प्रत्याशी का चुनाव हार जाना इस बात का स्पष्टीकरण है कि गड़बड़ी इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन में नहीं, राजनीतिक दलों के दिमाग में है। अगर ईवीएम में भाजपा को ही वोट पड़ने की व्यवस्था होती तो कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और झारखंड में हुए विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी हारते ही क्यों? कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और झामुमो प्रत्याशियों का जीतना इस बात का परिचायक तो है ही कि संशय के इस कुरोग की कोई औषधि नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तो यहां तक कहा है कि अगर ईवीएम में तकनीकी गड़बड़ी होती तो वे मुख्यमंत्री नहीं बनते। कांग्रेस की विचारधारा के प्रतिकूल कमोवेश यही बात कर्नाटक के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली ने भी कही है। यह अलग बात है कि कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी, विरोधी दलों नेताओं के साथ राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत कर चुकी हैं। सवाल इस बात का है कि ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत वही लोग क्यों कर रहे हैं जिन्हें जनता ने हरा दिया। अगर अटेर की ईवीएम भाजपा के पक्ष में ही पर्ची निकाल निकाल रही थी तो वहां से भाजपा प्रत्याशी उपचुनाव क्यों हारा? इस सवाल का जवाब ईवीएम विरोधियों के पास कदाचित नहीं है।
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उनका तर्क हो सकता है कि विरोध के बाद ईवीएम बदल दी गई। जिन पांच सीटों पर भाजपा जीती है, वहां ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप देर-सबेर लगाए तो कदाचित आश्चर्य नहीं होगा। वोटिंग मशीन में खामी का मतलब होता है कि सभी मत किसी खास दल को मिल जाए। दूसरे दलों को वोट मिले ही नहीं लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर ईवीएम को खलनायक बना दिया। उनकी देखादेखी अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और सोनिया गांधी को भी ईवीएम में खोट नजर आने लगी। अरविंद केजरीवाल ने तो ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर से नगर निगम चुनाव कराने की मांग कर डाली। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के नेता भी चाहते हैं कि लखनऊ नगर निगम का चुनाव बैलेट पेपर से कराया जाए। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब ऐसी संभावना है कि यूपी के निकाय चुनाव ईवीएम की जगह पर बैलेट पेपर से कराए जा सकते हैं।  उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने बैलेट पेपर के लिए टेंडर भी जारी कर दिया है। दरअसल राज्य निर्वाचन आयोग ने कहा है कि उसके पास मौजूद ईवीएम वर्ष 2006 से पहले के हैं और इन पुराने ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से वोटिंग कराना बेहतर है। उसने इस संबंध में केंद्रीय चुनाव आयोग को चिट्ठी लिख कर अपनी राय से अवगत करा दिया है। अपनी चिट्ठी में राज्य निर्वाचन आयोग ने पुरानी ईवीएम के इस्तेमाल को खारिज किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मौका चाहिए। इस मामले में उन्होंने अपनी सुविधा का संतुलन तुरंत तलाश लिया। लगे हाथ उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की राय का समर्थन कर दिया। दिल्ली राज्य निर्वाचन आयोग को भी अपनी रीढ़ का प्रदर्शन करना चाहिए। उन्हें यह भी तो सोचना चाहिए कि अब देश में जहां कहीं भी चुनाव हो रहे हैं, वे 2011 की जनगणना के आधार पर हो रहे हैं।निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के हालात भी बदले हैं, ऐसे में यह सामान्य सोच का बिंदु है कि 2011 की अपडेट ईवीएम से ही चुनाव कराए जाएंगे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव जब नई ईवीएम से हुए हैं तो नगर निगम के चुनाव पुरानी मशीन से कैसे होंगे? ऐसे में बैलेट पेपर के लिए टेंडर जारी करना उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की जल्दबाजी तो नहीं। इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
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गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के भिंड जिले की अटेर उपचुनाव से पहले वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) मशीन को लेकर विवाद उठा था। इसके बाद भिंड के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को हटा दिया गया था। इसके बाद कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में मतपत्रों के जरिए चुनाव कराने की मांग की थी। बाद में अरविंद केजरीवाल ने भी ईवीएम पर सवाल उठाया था। इस पर चुनाव आयोग ने कहा था कि उपचुनाव में यूपी विधानसभा चुनाव में प्रयुक्त ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होगा। भारतीय निर्वाचन आयोग ने अरविंद केजरीवाल को चुनौती दी है कि मई के बाद उन्हें ईवीएम दी जाएगी, उसमें वह छेड़छाड़ करके दिखाएं। भारतीय निर्वाचन आयोग अनेक बार यह कह चुका है कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव नहीं है। इसे हैक इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें किसी भी तरह का इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता लेकिन विपक्ष ईवीएम में खोट तलाशने के अपने नजरिए को बदल नहीं पा रहा है।  केंद्रीय निर्वाचन आयोग के इस दावे को पलीता उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ही लगा रहा है। इस देश में केजरीवाल सरीखे जन प्रतिनिधि भी हैं जिन्हें दूसरों की रीढ़ की हड्डी देखने की आदत हो गई है। उनकी अपनी रीढ़ में हड्डी है भी या नहीं, इस बावत तो उन्होंने कभी सोचा ही नहीं। ईवीएम में गड़बड़ी के मुद्दे को उठाने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 8 मई तक केंद्रीय निर्वाचन आयोग जवाब मांगा है। बसपा के वकील पी चिदंबरम हैं। गौरतलब है कि उनके वित्तमंत्री रहते ही उक्त ईवीएम खरीदी गई थीं। अब वे तर्क दे रहे हैं कि निर्वाचन आयोग के कई बार बताए जाने के बावजूद सरकार ने ईवीएम के साथ वीवीपीएटी लगाने के लिए धनराशि आवंटित नहीं की। उनका मानना है कि ईवीएम के साथ वीवीपीएटी जोड़े जाने के लिए निर्वाचन आयोग को 3,000 करोड़ रुपये की जरूरत है, पर केंद्र सरकार यह धनराशि आवंटित नहीं कर रही है। सवाल यह उठता है कि जब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तो उसने इस तरह की पहल क्यों नहीं की? औरों को उपदेश देना आसान होता है और सिद्धांतों पर अमल करना कठिन। विरोध के लिए विरोध करना और सकारात्मक विरोध करने में जमीन-आसमान का फर्क होता है। कपिल सिब्बल का तर्क है कि दुनिया के कई विकसित देश चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं करते। इसलिए भारत में भी ईवीएम का प्रयोग नहीं होना चाहिए। ईवीएम से चुनाव में कितनी सहूलियत हो गई है, इस पर कांग्रेस नेता विचार नहीं करना चाहते।
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राजनीतिक दलों को मतपेटिकाओं को लूटने में सहूलियत होती थी। मतगणना में भी अधिकारियों, कर्मचारियों की मिलीभगत से कुछ गुणा-गणित हो जाती थी लेकिन ईवीएम में ऐसा संभव नहीं है। यही वजह है कि पराजित दल ईवीएम के विरोध में खड़े हो गए हैं। दुनिया इक्कीसवीं सदी में जा रही है। हाईटेक हो रही है और भारत के नेता हैं कि बाबा आदम के युग से आगे बढ़ना ही नहीं चाहते। जनादेश पर अंगुली उठाना इस देश की जनता का अपमान है। इस बावत सोचा जाना चाहिए। जनता सब जानती है। वह दंड भी देती है तो बहुत सलीके से। जिस दिन राजनीतिक दल इस बात को जान जाएंगे, वे जनता के समग्र हित की बात सोचेंगे। जनता के विकास में ही अपना विकास तलाशेंगे।  जो जनता का विकास करता है, उसे अपने विकास की चिंता नहीं होती। काम, दाम और नाम तीनों अन्योन्याश्रित हंै लेकिन नेता काम किए बगैर ही दाम और नाम दोनों हासिल कर लेना चाहते हैं जबकि उन्हें यह सोचना होगा कि दाम और नाम काम के पीछे चलते हैं। काम इन दोनों के पीछे नहीं चलता।
-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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