ईद पर विशेष: उठो, जागो, हक के लिए अहद करो

ईद पर विशेष: उठो, जागो, हक के लिए अहद करो

Rajeev Ranjan Tiwaमुसलमानों! उठो, जागो और अपने हक के लिए अहद करो। इस ईद यह संकल्प लो कि हम भी दुनिया के प्रगतिशील देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे। दुनिया में अमन कायम रखेंगे। अपने बारे में फैल रहे भ्रम को दूर करेंगे। दुनिया में इस वक्त सभी छोटे-बड़े धर्मों को मिला दिया जाए तो इनकी संख्या 300 से ज्यादा हो जाएगी। इसलिए आतंकवाद और धर्म को अलग-अलग रखना चाहिए। इन्हें जोडऩा ठीक नहीं है। पिछले दिनों ढाका में जो भी हुआ उसे देख इस बात की पुष्टि होती है कि कुछ सिरफिरे धर्म के नाम पर युवाओं को आतंकवाद के रास्ते पर झोंक सकते हैं। हम सबको यह सोचना होगा कि हमारे देश का मीडिया और राजनीतिक सिस्टम आतंकवाद को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच भेदभाव क्यों करता है। अब वक्त आ गया है कि जो लोग इस्लाम को एक शांतिप्रिय धर्म के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं, वो आगे आएं। ये ऐसा समय है जब दुनिया के 57 इस्लामिक देशों और सैकड़ों मुस्लिम संगठनों को जागने की ज़रूरत है। इन ताकतों को आगे आकर आतंकियों के खिलाफ कदम उठाने चाहिए। अगर अब भी इस्लाम के तमाम ठेकेदार चुप रहे व आतंकी हमले होते रहे तो ये निगेटिव मार्केटिंग होती रहेगी। विकीपीडिया के मुताबिक, राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक लक्ष्यों के लिए हिंसा के इस्तेमाल को आतंकवाद कहा जाता है। ये अंतरराष्ट्रीय परिभाषाएं बता रही हैं कि आतंकवाद की परिभाषा में किसी खास धर्म का जि़क्र नहीं है। मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में जिस तरह का आतंकवाद फैला है उसमें ज़्यादातर में इस्लाम का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक तरह से इस्लाम की निगेटिव मार्केटिंग हो रही है। इसके लिए वही लोग जि़म्मेदार हैं जो इस्लाम व कुरान का इस्तेमाल आतंक और दहशत फैलाने के लिए करते हैं।
दरअसल, मुसलमानों का इतिहास एक सामंती और पतनशील मूल्यों से निकला इतिहास है। यह सामंतशाही 1857 में खत्म हो गई। उसके पतन का कारण भी खुद था, क्योंकि उसमें दूरदर्शिता का अभाव था। उसके बाद का समय सर सैयद अहमद का था। वे मुसलमानों को शिक्षा के जरिये आगे लाना चाहते थे। सर सैयद अहमद को इस बात का अंदाजा था कि आने वाला समय अंग्रेजों का है। हालांकि, अलीगढ़ मुस्लिम विवि ने विभाजन में बड़ी भूमिका निभाई। अगर अलीगढ़ आंदोलन में मुसलमानों की बौद्धिक तैयारी धर्मनिरपेक्षता की रक्षा कर पाने में सक्षम होती तो शायद आम मुसलमान पाकिस्तान का समर्थन नहीं करता। अगर उस समय मुसलमानों का बौद्धिक तबका सही भूमिका निभाने में सक्षम होता तो खिलाफत आंदोलन नहीं चला होता, जिसकी भारत में कोई जरूरत नहीं थी। समस्या यह है कि मुसलमान खुद अपनी समस्याओं को लेकर चिंतित नहीं है। कहने को अल्पसंख्यक आयोग है, कई सारी योजनाएं भी रेवड़ी की तरह बंट रही हैं। सवाल है कि इसका विरोध कौन करे, क्योंकि जो मठाधीश इसका लाभ ले रहे हैं वे न इसका विरोध करेंगे और न ही करने देंगे। संख्या के आधार पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक मानने से भी क्या होगा। असल समस्या तो आर्थिक और सामाजिक है। जब तक इन बातों को आधार नहीं बनाया जाता तबतक अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याएं बनी रहेंगी। देश के विभाजन के बाद से ही यहां ऐसी बहसें चलती रही हैं कि मुसलमान यहां सुरक्षित हैं या नहीं। उनके धर्म, भाषा, संृस्कृतिए पहचान और जीविका संबंधी उनके अधिकार स्वतंत्रता की हद तक सुरक्षित हैं या नहीं।
आंकड़े बेईमान नहीं होते, लेकिन उनमें इतनी ताकत भी नहीं होती की वे अपना मनमाना इस्तेमाल रोक सकें। बीते वर्ष बिहार में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आए जनगणना-2011 के आंकड़ों का धार्मिक खंड कई मामले में इसी त्रासदी से गुजर रहा है। इन आंकड़ों को मुख्य रूप से इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे हिंदू आबादी घट रही हो और मुस्लिम आबादी बढ़ रही हो, जबकि सच्चाई यह है कि 2001 से 2011 के बीच मुसलमानों की तुलना में हिंदुओं की आबादी चार गुना बढ़ी है। इस दशक में मुसलमानों की संख्या में 3.4 करोड़ और हिंदुओं की संख्या में 13.8 करोड़ का इजाफा हुआ। इससे स्पष्ट है कि भारत की आबादी में इस दशक में जितने मुसलमान जुड़े हैं उससे चार गुना हिंदू जुड़े हैं। यह भी कहा जाता है कि मुस्लिम आबादी के बढऩे की रफ्तार हिंदू आबादी बढऩे की रफ्तार से तेज है। तमाम भ्रांतियों के बावजूद इतना तो तय है कि मुसलमान भी पहले से कम रफ्तार से आबादी बढ़ाने के फलसफे से सहमत हैं। मीनमेख निकालने वाले पूछ सकते हैं कि आखिर मुसलमान उसी तेजी से जनसंख्या पर ब्रेक क्यों नहीं लगा रहे हैं, जिस तरह हिंदू। उन्हें सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढऩी चाहिए। रिपोर्ट में कई मामलों में भारत के मुसलमानों की दशा दलितों की आर्थिक सामाजिक दशा से गई गुजरी बताई गई है। सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी भी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। जनसंख्या नियंत्रण व आर्थिक सामाजिक स्तर में उठान का सीधा रिश्ता है। भारत में अशिक्षित और गरीब समाज मध्यमवर्गीय परिवारों की तुलना में जनसंख्या के बारे में अलग धारणा रखता है। सरकार भविष्य में जब जाति आधारित जनगणना के आंकड़े जारी करेगी तब पता चलेगा कि वंचित जाति और संपन्न जाति में जनसंख्या को लेकर किस तरह के ट्रेंड हैं। रोजमर्रा के अनुभव से तो यही दिखता है कि गरीब परिवार आज भी उस धारणा से पूरी तरह कट नहीं पाया है कि जितने हाथ होंगे उतनी कमाई।
अंतरराष्ट्रीय संस्था इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में पूरी दुनिया में 452 आतंकी हमले हुए, जिनमें से 450 हमले मुस्लिम कट्टरपंथियों ने किए थे। यानी 99.5 प्रतिशत हमलों में इस्लाम का गलत इस्तेमाल किया गया। अलग-अलग दौर में राजनेताओं ने अपने फायदे के लिए आतंकवाद को धर्म से जोड़ा है और वोटों की फसल काटी है। इसी के चलते हिंदू और मुस्लिम आतंकवाद शब्द की रचना हुई। वैसे यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि हम इन दोनों शब्दों के खिलाफ हैं। आतंकवाद को अपनी सुविधा और एजेंडे के अनुसार धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता। अगर जोडऩा ही है तो फिर ऐसा सबके साथ होना चाहिए। अगर कोई मुस्लिम आतंकी हमले का जि़म्मेदार है तो फिर उसे मुस्लिम आतंकवाद कहा जाएगा और अगर कोई हिंदू आतंकी हमले का जि़म्मेदार है तो उसे हिंदू आतंकवाद कहा जाएगा। इस तरह क्रिश्चियन व सिख आतंकवाद सहित तरह-तरह के आतंकवाद पैदा होंगे। जामिया जैसे विवि में आप देख सकते हैं कि सभी प्रोफेशनल और अच्छे कोर्सेस के टापर गैर-मुस्लिम विद्यार्थी हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विवि का भी हाल सब जानते हैं। सही मायने में मुसलमानों में आज समाज सुधार की सख्त जरूरत है। अन्य समुदायों की भांति मुस्लिम समाज में भी क्रीमी लेयर है। किसी भी तरह के आरक्षण का फायदा यही तबका उठाता है। आरक्षण से गरीब मुसलमान को कोई फायदा नहीं होता। इन मसलों को लेकर कोई मुसलमान नेता आगे नहीं आता। मुसलिम समाज में कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन नहीं दिखता। यहीं नहीं, मुसलिम समाज में धर्म, संस्कृति, भाषा, सामाजिक समस्याओं आदि को लेकर कोई विमर्श भी नहीं दिखता। भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक संरचना और उद्योग जगत में मुसलमानों की भागीदारी नगण्य है। ऐसी स्थिति में धर्म और धर्म की आड़ में तथाकथित धार्मिक मूल्यों ने मुसलमानों को बड़े भारतीय समाज से अलग कर दिया है।
मुस्लिम समाज की पृष्ठभूमि पर लिखे अपने उपन्यास आधा गाँव में राही मासूम रज़ा एक जगह कहते हैं, मर्द हैं तो ताक-झांक भी करेंगे, रखनियां भी रखेंगे। ये पंक्तियां लिखी तो मर्दों के लिए गई हैं, पर ये मुस्लिम समाज में औरतों की हैसियत को बयां करने के लिए पर्याप्त है। मुसलमानों की स्थिति में तभी सुधार संभव है जब मुस्लिम नारियों की दशा में सुधार आएगा। उत्तर भारत के मुस्लिम परिवारों में औरत की हैसियत को जानने के लिए अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास झीनी-झीनी बीनी चदरिया पढऩा जरूरी है। इसमें मेहनतकश मुसलमान परिवारों का चित्रण है। जहां नारी दूसरे या कहें कि तीसरे दर्जे के इंसान के रूप में रहती है। इसमें एक जगह लेखक एक पात्र से कहलवाता है कि औरत की आखिर हैसियत ही क्या है। औरत का इस्तेमाल ही क्या है। चूल्हा-हांड़ी करे, साथ में सोये, बच्चे जने और पाँव दबाये। इनमें से किसी काम में कोई गड़बड़ की तो बोल देंगे तलाक- तलाक-तलाक। सात नदियाँ, एक समन्दर उपन्यास में खालिद कहते हैं कि इन औरतों की बातें समझ में नहीं आतीं। जुल्म सहेंगी मगर जालिम को जालिम नहीं कहेंगी।
जो मूर्ति इनके मन में किसी की बन जाती है वह जिन्दगी भर बनी रहेगी। बहरहाल, पाक माह-ए-रमजान के बाद पडऩे वाले इस ईद पर मुस्लिमों को यह अहद करना संकल्प लेना चाहिए कि वे भी अब अपने हक के लिए आवाज बुलंद करेंगे। उन्हें यह मानना होगा कि वे किसी से कम नहीं हैं। वे भी अपने बच्चों को शिक्षित कर ऊंचे ओहदे तक पहुंचाएंगे। इस माह-ए-रमजान में अन्य दलों की बात तो छोड़ें, कट्टर हिन्दुवादी संगठन आरएसएस ने भी इफ्तार का आयोजन किया। मुसलमानों पर अक्सर जिनकी नजरें टेढ़ी रहती हैं, उन्होंने भी अपने कैम्प में बुलाकर मुसलमानों का रोजा खुलवाया। क्या इफ्तार के रूप में होने वाली सियासी गतिविधियों से देश के मुसलमान वाकिफ नहीं हैं।
राजीव रंजन तिवारी

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