इस्लामी शरीयत के खिलाफ है एक बार में तीन तलाक

इस्लामी शरीयत के खिलाफ है एक बार में तीन तलाक

 इलाहाबाद हाईकोर्ट एक ही बार में तीन तला़कों के मामले में जो टिप्पणी की है उसको मुस्लिम समाज में महिलाओं के पारिवारिक सशक्तीकरण के लिए अच्छी पहल माना जा सकता है। अदालत ने हिना और पहली पत्नी को तीन बार तलाक देकर उससे विवाह करने वाले उसके पति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं के प्रति यह अमानवीय व्यवहार के साथ-साथ यह पवित्र कुऱान और पैग़ंबर मोहम्मद की भावना के भी विपरीत है।
हालाँकि कोर्ट ने यह भी कहा है कि तीन तलाक़ का प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने के कारण यह उसकी केवल राय है और वह तीन तलाक़ की वैधता पर कोई फ़ैसला नहीं दे रहा है, फिर भी उसका यह ऑब्ज़र्वेशन ग़ौर करने लायक है। इस्लामी नुक्तेनजऱ से भी देखें तो एक ही बार में तीन तलाक़ देना उचित नहीं है। इस्लाम के वजूद में आने के पंद्रह सौ वर्ष बाद तलाक का मामला इतनी तेज़ी से उभरेगा, यह मुस्लिम समाज के ठेकेदारों ने कभी सोचा नहीं था।
उत्तराखंड राज्य के काशीपुर नगर की सायरा बानो, जिसके पति ने स्पीडपोस्ट से तलाक़ देकर रिश्ता तोड़ लिया था, ने फरवरी 2016 को इसके खि़लाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। सायरा बानो और उनकी जैसी अन्य प्रगतिशील एवं जागरुक महिलाओं ने जता दिया कि वे केवल उपभोग की वस्तु मात्र नहीं हैं। उनका भी अपना पूरा वजूद है। यह सब हुआ धर्म को ठेकेदारी के क़ब्ज़े से बाहर निकाल कर उसके वास्तविक उद्देश्य की खोज से जिसपर धर्म के ठेकेदारों ने यह कहकर पाबंदी लगा रखी है कि धर्म में मीनमेख निकालने वाले जहन्नुम में जाएंगे। सीधी सी बात है कि अगर धर्म है तो उसकी सार्थकता और औचित्य समाज के हित में ही है, उससे बाहर नहीं। इसी साहसिक विचार ने तलाक़ के नाम पर हो रहे महिलाओं के उत्पीडऩ पर बहस छिड़वा दी।
इस मामले पर इस्लाम धर्म के कट्टरपंथी ठेकेदार जो शोरगुल मचा रहे हैं वह सिर्फ़ तलाक़ के लिए ही नहीं बल्कि इसलिए भी है कि महिलाओं का अपने शोषण के खि़लाफ़ यह संघर्ष मुस्लिम समाज को उनके चंगुल से आज़ाद कर देने की नज़ीर न बन जाए। यह भय ठीक उसी तरह है जैसे कि मौत का एक बार घर का रास्ता देख लेने का भय। इसी भय से दूर रहने के लिए तलाक़ के संबंध में विरोध किया जा रहा है लेकिन यह विरोध मुस्लिम महिलाओं के विरोध में तो है ही, साथ ही शरीयत (इस्लामी संविधान) के भी विरोध में है। हदीस ( पैग़ंबर हजऱत मुहम्मद द्वारा दिए गए निर्देश) अबू दाऊद में तलाक़ को वैध मानते हुए भी पसंद नहीं किया गया है। जहां तक संभव हो, सुलह को प्राथमिकता देते हुये तलाक़ से बचने को कहा गया है।
कुऱान और पैग़ंबर हजऱत मुहम्मद द्वारा हदीस के रूप में दिये गये निर्देर्शों पर आधारित इस्लामी शरीयत में तलाक़ का शाब्दिक अर्थ है पत्नी से छुटकारा लेकिन यह छुटकारा इतना आसान नहीं है जितना मुस्लिम समाज में प्रचलित है। यह बहुत कठिन काम है। प्रचलित तलाक़ की व्यवस्था में एक ही समय में तीन बार ‘तलाक’ कहते हुए महिला को घर से निकाला जाता रहा है। यह तरीक़ा सामाजिक तौर पर ही नहीं, शरीयत के भी विरूद्ध है।
शरीयत में मतभेद हो जाने पर पति-पत्नी द्वारा आपस में बातचीत से ग़लतफ़हमी दूर करके एक दूसरे के प्रति विश्वास पैदा करने और परिवारों के मुखिया सदस्य और संभ्रात नागरिकों द्वारा सुलह कराने का भरपूर प्रयास करने का हुक्म है। कुऱान की सूरा (भाग) अन-निसा की आयत संख्या 35 और 128 में पति-पत्नी के बीच सुलह के लिए आदेश है। शरीयत में तलाक़ एक बार में नहीं बल्कि तीन बार में दिए जाने का आदेश है और वह भी अलग-अलग समय पर। अलग-अलग समय पर दी जाने वाली तीन तलाक़ों के बीच दो इद्दत (दो मासिक धर्म के बीच की अवधि यानी लगभग 28 दिन) गुज़ारना ज़रूरी है।
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शरीयत में तलाक़ केवल उसी स्थिति में वैध है जब सुलह के सभी रास्ते बंद हो जाएँ। ऐसी स्थिति की मजबूरी में शरीयत का हुक्म है कि पति पत्नी को पहला तलाक़ दे और पति अपने ही घर पर रखकर पत्नी के इद्दत की अवधि में उसका भरण-पोषण करे। क़ुरान सूरा अत-तलाक़ की आयत संख्या 1 और 6 में तलाक़ पाई महिला को घर से बाहर नहीं निकाले जाने तथा इद्दत की अवधि में अपने ही घर में रखने का आदेश दिया गया है। अगर पहली तलाक़ के बाद इद्दत के दौरान दोनों के बीच संबंध हो जाते हैं तो तलाक़ निरस्त हो जाएगा और वे पहले की तरह पति-पत्नी के रूप में रह सकते हैं। अगर पहले तलाक़ और उसके बाद सुलह हो जाने के बाद फिर से पति-पत्नी के बीच विवाद और सुलह न हो पाने की स्थिति आ जाए तो पति दूसरी बार तलाक़ दे। दूसरी बार तलाक़ के बाद भी इद्दत के दौरान संबंध बन जाने पर सूरा अत-तलाक़ की आयत संख्या 2 और सूरा अल-बकऱा की आयत संख्या 229, 230, 231 और 232 के आदेशानुसार दोनों चाहें तो पति-पत्नी बने रह सकते हैं।
अगर दूसरी बार तलाक़ के बाद भी विवाद की स्थिति बनी रहे तो पति पत्नी को तीसरी बार तलाक़ देगा। इसके बाद दोनों के बीच संबंध बनाने और फिर से पति-पत्नी के रिश्ते में लौटने की छूट समाप्त हो जाएगी और स्थाई व अंतिम रूप से तलाक़ हो जाएगा और दोनों के बीच अलगाव हो जाएगा। ऐसे में पति को दूसरी महिला से और पत्नी दूसरे पुरूष से विवाह करने की स्वतंत्रता मिल जाती है। पहले दो तलाक़ों को रजई (संबंध स्थापित करने की गुंजाइश वाली) तथा तीसरी तलाक को बाइन (स्थाई रूप से अलग करने वाली) तलाक़ कहा गया है।
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शरीयत में पहली और दूसरी तथा दूसरी और तीसरी तलाक़ों के बीच लगभग 28-28 दिन की इद्दतकी अवधि में पत्नी द्वारा पति के घर में ही गुज़ारने की व्यवस्था इस बड़े उद्देश्य से की गई है ताकि यह पता चल सके कि दोनों के बीच प्रेम और सुलह की थोड़ी सी भी संभावना बची है या नहीं। क्रोध या छोटे विवादों के कारण दिये गये तलाक़ के बाद लंबे समय एक साथ रहने पर उनके बीच नाराजग़ी दूर हो जाने और फिर से एक हो जाने की स्थिति बन सकती है और घर टूटने से बच सकता है। दो इद्दतों की लगभग 56 दिन की अवधि तक साथ रहते हुए भी पति-पत्नी के आपस में नहीं मिलने पर स्पष्ट हो जाता है कि अब दोनों के बीच न तो प्रेम बाकी बचा है और न ही सुलह की गुंजाइश। ऐसी स्थिति में घुटनभरी जि़ंदगी जीने या फिर आत्महत्या और हत्या जैसी स्थिति आने से बेहतर है कि दोनों अलग हो जाएँ और चाहें दूसरे साथी के साथ नया जीवन शुरू करें। इस रूप में तलाक़ बिलकुल उचित है।
स्पष्ट है कि तलाक़ कोई सुविधा नहीं बल्कि उस स्थिति में अलग होने का वह अंतिम उपाय है जब पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई गुंजाइश ही बाक़ी न बचे और वह भी तमाम कठोर शर्तों के साथ। शरीयत में तलाक़ से घर टूटने की बहुत कम संभावना छोड़ी गई है लेकिन मुस्लिम समाज में उसका दुरूपयोग किया जा रहा है और वो भी शरीयत के विरुद्ध। यह भी देखना होगा कि सरकार द्वारा दख़ल देने और अतिरिक्त रुचि लेने से बेवजह राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का तवा भी गरम हो गया है। सरकार को अगर तलाक़ में रुचि है तो उसे अकेले मुस्लिम समाज की महिलाओं का ठेकेदार बनने के बजाए सभी धर्मों और समाजों में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में आना चाहिए। एकतरफ़ा रुचि और हस्तक्षेप से तो बात बिगड़ेगी ही और सरकार राजनीति करने के आरोपों के घेरे में आएगी ही। बेहतर हो कि मुस्लिम समाज स्वयं सुधार कर इसका समाधान करे और दूसरों के हस्तक्षेप का मौका ही न दे।
– असलम कोहरा

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