इतिहास रहा है.. उत्तर प्रदेश में गठबंधन सफल नहीं रहे..!

इतिहास रहा है.. उत्तर प्रदेश में गठबंधन सफल नहीं रहे..!

उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि जब चुनाव के दौरान जिन पार्टियों ने गठबंधन किया वह कभी सफल नहीं रहे। 1989 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्र देश के मुख्यमंत्री बने थे, तब भाजपा का समर्थन उनके साथ था, वे संयुक्त मोर्चा से मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद 1990 में जब राम मंदिर आंदोलन के दौरान लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोका गया तब भाजपा ने केंद्र और राज्य सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद में 1991 की राम लहर में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। मगर 1992 में जब विवादित ढांचा ध्वस्त हुआ तब कल्याण सिंह की बीजेपी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। सपा समर्थकों ने घेरा था मायावती को इसके बाद में 1993 में जब चुनाव हुए थे तब पहली बार बसपा और सपा का गठबंधन हुआ था। जिसमें छह-छह महीने के लिए मुख्यमंत्री बनाने का फार्मूला सामने आया और पहली बार में मायावती मुख्यमंत्री बनीं। मगर 1994 में जब मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने का नंबर आया तब मायावती ने उनसे समर्थन वापस ले लिया था।
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जिसके बाद में दो जून 1994 को वीआईपी गेस्टहाउस में मायावती को सपा के लोगों ने घेर लिया था। जहां भाजपा नेता ब्रम्हदत्त द्विवेदी ने उनको सुरक्षित बाहर निकाला था। इसके बाद बीजेपी के समर्थन से मायावती दोबारा मुख्यमंत्री बनी थी। यहां एक नया गठबंधन हो गया था। मगर कुछ समय बाद बसपा से 22 विधायक अलग हुए थे और तब उन विधायकों ने भाजपा को समर्थन देकर कल्याण सिंह को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया। मगर ये गठबंधन भी लंबा नहीं चला। आखिरकार 2001 में राजनाथ सिंह जब यूपी के मुख्यमंत्री थे, तब जब चुनाव हुए तो कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन हुआ था। मगर बसपा को कोई लाभ नहीं हुआ, जबकि कांग्रेस ने चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव को समर्थन देकर उनकी सरकार बनवा दी। इसके बाद 2007 में और फिर 2012 में पूर्ण बहुमत की सरकारें प्रदेश में बनती रहीं। 2012 में रालोद और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था, मगर उसका कोई भी सकारात्मक परिणाम नहीं आया। दोनों दलों ने मिला कर मात्र 28 सीटें ही जीतीं। 

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