आश्चर्यजनक सत्य: जहां एक पत्नी के पांच-पांच पति होते हैं..!

आश्चर्यजनक सत्य: जहां एक पत्नी के पांच-पांच पति होते हैं..!

महाभारत की कथा में एक प्रकरण आता है पांचाली का। पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के साथ जब अर्जुन गान्धर्व विवाह करके अपने पांचों भाई सहित माता कुन्ती के पास पहुंचे, उस समय कुन्ती पाकशाला में व्यस्त थीं। पांचों भाइयों ने माता से कहा – ‘माते! देखिए हम क्या लाए हैं?’ कुन्ती ने बिना देखे ही कह दिया – ‘पांचों आपस में बांट लो।’ माता के आदेश को ठुकराया नहीं जा सकता था और द्रोपदी पांचों पाण्डवों की पत्नी कहलाने लगी।
यह कथा महाभारत काल की थी, किन्तु यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि स्वतंत्र भारत में जहां महिलाओं को पुरूषों के बराबर संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है, वहां आज भी पांच-पांच पतियों के बीच एक पत्नी को अपना जीवन बिताना पड़ रहा है।
राजस्थान के धौलपुर नामक स्थान के पास बहुरी नामक गांव है। इस गांव के सभी लोग मजदूरी करके अपना निर्वाह करते हैं। कंगाली से ग्रस्त इस गांव में प्राय: प्रत्येक परिवार में एक ही औरत विवाह करके लायी जाती है जो परिवार के सभी पुरूषों की पत्नी कहलाती है तथा बारी-बारी से उसे सबके साथ हमबिस्तर होना पड़ता है।
भवानी देवी की उम्र 45 वर्ष है। उसकी शादी सात वर्ष की उम्र में ही कर दी गई थी। उसके भी तीन देवर हैं, जिनके साथ उसे नियमित सोना होता है। शादी के कुछ वर्षों के बाद उसके एक देवर ने और जन्म लिया। सास के मर जाने के बाद भवानी ने देवर को बच्चे की तरह पाला। उन्नीस वर्ष का वह देवर भी अपनी पारी के अनुसार अब मां सरीखी के साथ हम बिस्तर होता है।
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यह उस गांव के एक-दो परिवारों की ही कहानी नहीं है बल्कि उस गांव के हर घर की महिलाओं के साथ ऐसा ही होता है। वास्तव में उस गांव में कंगाली का यह आलम है कि उस गांव के लड़कों की शादी नहीं हो पाती है। कर्जा लेकर किसी एक लड़की को परिवार का बड़ा लड़का खरीदकर ले आता है। वह अपनी ब्याहता को पत्नी का दर्जा देता है। उस कर्जे की रकम सभी भाई मिलकर चुकाते हैं जिसके एवज में वे सभी नियमित रूप से उस औरत के साथ अपनी हवस शांत करते रहते हैं। औरत भी शुरू में इसका विरोध करती है किंतु इसे अपनी नियति मानकर वह स्वयं को एडजस्ट कर लेती है।
उस गांव में लड़कियों की संख्या बहुत ही कम है क्योंकि लड़की को या तो गर्भ में ही मार दिया जाता है या फिर जन्म लेने के बाद गरीबी के कारण वे लड़की की शादी नहीं कर पाते हैं, इसी कारण उसकी हत्या कर देते हैं। जो औरत बार-बार लड़की को ही जन्म देती है उसे परिवार वाले अनेक प्रकार की यातनाएं देते हैं। इसके बाद ‘नाता प्रथा’ के तहत किसी दूसरी स्त्री को खरीद कर ले आते हैं।
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गांव की जिस स्त्री पर भी पुरूष का मन आ जाता है, उसके पति को पचास-साठ हजार रूपया देकर उस स्त्री को परिवार में ले आने की प्रथा को नाता प्रथा कहा जाता है। वह लाई गई स्त्री सबके साथ हमबिस्तर होती है किंतु उसे उस परिवार में पत्नी का दर्जा नहीं मिल पाता। परिवार में आने वाले अतिथियों के साथ भी उसे सोना पड़ता है। अनेक पुरूषों के साथ शारीरिक संबंध बनाये जाने के कारण जब स्त्री बीमार पड़ती है तो उसका इलाज देशी दवाओं या पूजा-पाठ के माध्यम से ही किया जाता है।
आज जब महिला सशक्तिकरण की बातें की जा रही हैं, महिलाओं को बराबरी हिस्सा देने की बातें कही जा रही हैं, उस समय बहुरी गांव की महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को सुनकर हार्दिक चोट पहुंचती है। स्वतंत्र भारत में महिलाओं की इस स्थिति का जिम्मेवार कौन है?
वहां की महिलाओं को जागरूक बनाना होगा और उन्हें इस घृणित प्रथा से मुक्त करना होगा। खुशहाल भारत के सपना दिखाने वाले राजनीतिज्ञों को उस क्षेत्र की महिलाओं की स्थिति देखनी होगी।
– पूनम दिनकर

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