आप हमेशा युवा बनी रह सकती हैं…जानिए कैसे..?

आप हमेशा युवा बनी रह सकती हैं…जानिए कैसे..?

परिवर्तन जीवन का अदम्य हिस्सा है। परिवर्तन तो सभी में होता है चाहे पेड़ हों, फूल हों या छाया हो, चाहे उगते सूर्य की लालिमा हो या छिपते भानु की शीतलता। बच्चा जन्म लेता है, रोता है, चिल्लाता है। धीरे-धीरे युवावस्था से गुजरकर प्रौढ़ावस्था में आता है। ऐसे ही कीचड़ में कमल खिलता है, फिर समयानुसार उसी की गोद में समा जाता है।
पक्षी अण्डों को सेते हैं, उनसे बच्चे निकलकर कुछ दिनों बाद उड़ान भरने लगते हैं और सदा के लिए यह भूल जाते हैं कि उनके मां-बाप कौन थे? अगर एक छुई-मुई के पौधे में लगे फूल को देखें या उस पौधे को देखें तो उसमें क्षणिक परिवर्तन तो उसे छूने मात्र से ही पता चल जाता है। वह भी एक दिन पृथ्वी मां की गोद में समा जाता है।
नदी की ओर देखें तो यही पाते हैं कि सारे वर्ष बहने वाली नदी में भी पानी कभी-कभी कम हो जाता है, कभी पहले से भी ज्यादा। समुद्र की लहरें भी कभी कम गहरी होती हैं तो कभी किनारे पर खड़े लोगों को भी पीछे हटने पर मजबूर कर देती हैं।
07 मई: आज प्रख्यात कवि रवींद्र नाथ टैगोर का जन्म हुआ

सजीव और निर्जीवों में इस परिवर्तन को देखकर यही कहा जायेगा कि सच तो सार्थक है, अमर है। संसार परिवर्तनशील है लेकिन संसार की इस परिवर्तनशीलता की बात को कुछ नारियां नाहक झूठा साबित करने की कोशिश करती हैं अपनी ढलती उम्र को कम बता कर, जवां दिखने के चक्कर में । आखिर क्यों?
शायद ऐसा कहने मात्र से उन्हें आत्म संतोष मिलता है। उनके मन में हर वक्त युवावस्था में जीने की तृष्णा बनी रहती है। यह इस सत्य का दूसरा प्रमाण हो सकता है पर इन बातों से तो यही साबित होता है कि वे अपने सामने वाले विपरीत लिंग को यह अहसास दिलाती हैं कि वे अभी खूबसूरत हैं लेकिन इस तर्क से यथार्थ को ठुकराया नहीं जा सकता। उम्र छिपाने की बात पर कभी कभी पास पड़ोस व्यंग्य करते ही सुने जाते हैं- चालीस वर्ष की हो गई है पर श्रंृगार करके यौवन चाहती है। उम्र से जुड़ा एक मुहावरा भी प्रसिद्ध है ‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम।
बाल कथा: मुफ्त का काम

अब जरा आप सोचें, अगर ऐसी बातें आपके लिए भी हों तो आपको कैसा लगेगा। हम आपका जवाब जानते हैं। आप कहेंगी तमीज नहीं है। कैसी बातें करते हो। सच तो यह है कि सत्य कड़वा ही होता है। यह आवश्यक नहीं है कि मात्र यौवन प्राप्त नारी ही दूसरे के आकर्षण का कारण बनती है। युवावस्था से गुजरकर जब नारी प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करती है तब उसका रूप आकर्षण की ओर नहीं बल्कि व्यक्तित्व के गुणों की ओर ध्यान दीजिए। निस्संदेह आप पुरूष प्रधान समाज की भी प्रशंसा ही पायेंगी।
यदि आप भी इस अवस्था में पहुंच चुकी हैं या पहुंचने वाली हैं तो चेहरे की सुंदरता की बजाए अपने चारित्रिक गुणों को निखारें। आप भी प्रशंसा की पात्र बनी रहेंगी। चेहरे की सुन्दरता निखारने के चक्कर में तो आपका अस्तित्व मिट सकता है। तब आप दूसरों की प्रशंसा पात्र बनने का स्वप्न भी कैसे देख पायेंगी।
राजेन्द्र सिंह सैनी

Share it
Share it
Share it
Top