‘आप’ से दरकता विश्वास, आत्ममुग्धता से बाहर आएं केजरीवाल

‘आप’ से दरकता विश्वास, आत्ममुग्धता से बाहर आएं केजरीवाल

कहा जाता है कि ऊंचाई की तरफ चढऩे वालों को बराबर ताकत के साथ आगे बढऩा पड़ता है क्योंकि थोड़ी भी ढील हुई तो इंसान दुगनी गति से नीचे की तरफ गिरता है और आजकल ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है दिल्ली की सर्वाधिक चर्चित राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी में। जी हाँ 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से जीत के घोड़े पर सवार आम आदमी पार्टी के लिए हालिया चुनाव काफी दर्दनाक साबित हुए हैं। तब दर्द और बढ़ गया जब अपने ही गढ़ में नगर निगम के चुनाव में पार्टी धराशायी हो गयी।
कहना गलत नहीं होगा कि ‘आप’ के लिए निकाय चुनाव को जीतने का मौका भी था और दस्तूर भी क्योंकि जिस तरह दिल्ली की जनता ने 70 में से 67 सीटों को सौंप कर अरविन्द केजरीवाल पर विश्वास जताया था और लगातार नगर निगम में खराब प्रदर्शन से बीजेपी के प्रति लोगों में नाराजगी थी तो उस लिहाज से दिल्ली में केजरीवाल की हार अच्छे संकेत नहीं हैं। बावजूद इसके कि अपनी ऐसी स्थिति की समीक्षा की जाये, केजरीवाल के रणबाँकुरे आपस में ही लड़ बैठे।
ओखला से विधायक अमानतुल्ला खान द्वारा सीधा- सीधा भाजपा से मिला होने का आरोप लगाए जाने के बाद एक बार के लिए कुमार विश्वास का पार्टी छोडऩे का निर्णय तक सामने आया था मगर समय रहते केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने स्थिति को संभालते हुए अमानतुल्ला खान को पार्टी से सस्पेंड किया और विश्वास को राजस्थान का प्रभारी बनाकर पार्टी में रोक लिया। फिलहाल के लिए तो यह मामला टल गया मगर कब तक ऐसे विवादों को टालते रहेंगे केजरीवाल क्योंकि लगातार हो रही शिकस्त की वजह से पार्टी में दबे सुर में आवाज उठने लगी है हार की जिम्मेदारी के सन्दर्भ में लेकिन केजरीवाल अभी भी इस विषय पर अपनी मनमानी नीति अपनाये हुए हैं और हार का जिम्मा कभी ईवीएम तो कभी जनता के ऊपर थोप रहे हैं। केजरीवाल के खास कहे जाने वाले कुमार ने खुलेआम यह आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल को चाटुकारों की मंडली घेरे है। आपको याद होगा कुछ समय पूर्व योगेंद्र यादव ने भी ऐसे ही विचार रखे थे केजरीवाल के लिए जिसकी सजा उन्हें पार्टी से निकल कर दी गयी। कुछ दिन पूर्व ही विधायक वेद प्रकाश ने भी यह कहते हुए पार्टी से इस्तीफा दे कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं। विधायक ने इल्जाम लगाया कि अरविंद केजरीवाल को कुछ लोगों ने घेर लिया है और वो सिर्फ उन्हीं की बात सुनते हैं। उन्हें पता ही नहीं कि पार्टी में क्या हो रहा है। अब जब बहुत सारे लोग एक ही बात को बोल रहे हैं तो इस बात को एक सिरे से कैसे नकारा जा सकता है और ऊपर से खुद केजरीवाल ने अपने बदलते रवैये से अक्सर अपने तानाशाही होने का परिचय भी कराया है। सत्ता में आने से पहले जो काम करने का जज्बा और जूनून था वो गायब है और है तो सिर्फ और सिर्फ अपना महिमा मंडन।
दिल्ली की जनता ने 2015 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल के नए वादे फ्री वाई- फाई और मुफ्त बिजली पानी के नारे के साथ सत्ता की चाबी सौंप दी थी। खास बात यह थी कि दूसरी बार केजरीवाल को सरकार बनाने के लिए किसी की मदद की भी जरुरत नहीं थी लेकिन इतनी बड़ी सफलता को केजरीवाल सिर्फ अपनी सफलता मान बैठे हैं। उन्हें लगता था कि लोग उनके चेहरे को देख कर वोट देते हैं। वैसे अभी -अभी संपन्न हुए गोवा और पंजाब के चुनाव के नतीजे जितने निराशाजनक निकले, उससे सबक लेने की बजाय केजरीवाल अभी भी और राजनीतिक पार्टियों की तरह ही परम्परागत राजनीति करने में ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं।
रहें टेंशन फ्री..टेंशन फ्री रहने के कुछ कारगर उपाय..!

जैसा कि सब जानते हैं पंजाब में केवल 2० सीटें मिलीं, वहीँ पार्टी ने गोवा में खाता भी नहीं खोला। दिल्ली में मिली सफलता को दुहराने के उद्देश्य से आम आदमी पार्टी ने इन दोनों राज्यों में खूब हाथ -पांव मारे लेकिन जनता इतनी बेवकूफ नहीं है। लोगों को पता है कि दिल्ली वालों के दिल खोल कर वोट देने के बावजूद केजरीवाल पूरे टाइम प्रधानमंत्री और दिल्ली के गवर्नर के खिलाफ दोषारोपण करते रहे या आपराधिक मामलों में अपने विधायकों का बचाव करते रहे हैं। लोग वो दिन कैसे भूल सकते हैं जब केजरीवाल कहते थे कि वो राजनीति की गन्दगी को साफ करने के लिए कीचड़ में उतरे हैं। गन्दगी साफ करना तो दूर दिल्ली में इन्हीके विधायकों ने गंद मचा रखा है। सोमनाथ भारती से लेकर संदीप कुमार, दिनेश मोहनिया, या फिर धर्मेन्द्र सिंह कोली किसी न किसी महिला के साथ दुव्र्यवहार के मामले में फंसे और केजरीवाल उनके बचाव में उतरे। अगर ऐसा ही था तो पुरानी पार्टियां क्या बुरी थीं। ‘आप’ में ऐसा क्या खास है। केजरीवाल को नहीं भूलना चाहिए कि उनकी पार्टी की असली पहचान क्या थी। जनता ने उन्हें रातों -रात सिर आँखों पर क्यों बैठाया था। महज दो- चार साल में ही पार्टी अपना वजूद खो देगी, ऐसा अनुमान लगाना कठिन था लेकिन ताजा मामलों से तो ऐसा ही लग रहा है। ‘आम आदमी पार्टी’ सिर्फ नाम की आम है लेकिन गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस पार्टी में वही लोग हैं जो अन्य पार्टियों में नहीं जा सके और ये लोग वही राजनीति कर रहे हैं जो दूसरी पार्टियां करती है और जिसकी निंदा अक्सर केजरीवाल करते हैं।
कांग्रेस बदलाव की राह पर…!

खैर, अब जब चारों तरफ हाँथ -पैर मारने के बाद केजरीवाल को अपनी लोकप्रियता का अंदाजा लग चुका है तो उम्मीद करते हैं कि उनको दिल्ली वालों की कद्र समझ में आनी चाहिए। अभी भी बचे हुए तीन सालों में इन्होंने गंभीरता पूर्वक काम नहीं किया तो नि:संदेह आने वाला विधानसभा चुनाव केजरीवाल और इनकी पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर देगा और तब वाकई दु:ख की बात होगी जब देश को तीसरे विकल्प का सपना दिखा कर आम आदमी पार्टी यूँ हाशिये पर आ जायेगी। एक बात और केजरीवाल को समझनी चाहिए कि आपकी चापलूसी करने वाले कभी भी आपको सही रास्ता नहीं दिखाएंगे, इसलिए कुछ अप्रिय बोलने वालों को भी साथ रखें जिससे सही -गलत का फर्क समझा जा सके। वैसे भी कहा गया है कि … ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय’
– विंध्यवासिनी सिंह

Share it
Share it
Share it
Top