आप को निहत्था कर पंजाब को नया चेहरा देने निकले कैप्टन

आप को निहत्था कर पंजाब को नया चेहरा देने निकले कैप्टन

बात जरा पुरानी है। आपातकाल के दौर में पंजाब के मुख्यमंत्री थे ज्ञानी जैल सिंह। विपक्षी था अकाली दल। ज्ञानी जी जानते थे कि अकाली सिख धर्म को अपना सियासी हथियार बनाते हैं, सो उन्होंने गुरुपर्वों पर गुरुद्वारों में जाकर धार्मिक प्रवचन देना शुरु कर दिया। दशम पातशाह गुरु गोबिंद सिंह महाराज द्वारा दिए गए उपदेशों के स्थानों को आपस में जोड़ कर 400 किलोमीटर लंबे गुरु गोबिंद सिंह मार्ग का सड़क निर्माण करवाया। सिखी के जन्मस्थल आनंदपुर साहिब से पंजाब की पश्चिमी सीमा तक फैली इस सड़क पर धार्मिक यात्रा निकाली। गुरु साहिब के नीले घोड़े की नस्ल के घोड़ों को उस यात्रा में शामिल किया। कांग्रेसी मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने अकालियों के हथियार धर्म का इस्तेमाल करके उनकी फूंक निकाल कर रख दी।
इस घटना के चार दशक बाद पंजाब में एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी ज्ञानी जी की राह पर हैं पर मोहरे बदल चुके हैं। ज्ञानी जी ने अकालियों के हथियार को उनसे छीन लिया था पर पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने नवबौद्ध सियासी दल आम आदमी पार्टी का धनुष छीन कर उससे अपनी निशानी वाले सियासी तीर चलाने शुरु कर दिये हैं। शायद उनकी सोच है कि आप के सारे मुद्दे छीन कर उन्हें पंजाब में सियासी कंगाल बना दिया जाए।
यह देश की सियासत में बदलाव के संकेत दिखने जैसा मामला है। चुनाव जीत कर सदा मनमानी करने वालों के हाथों में ताकत देकर जनता को भेड़ बकरियां समझने की मानसिकता से सियासी दल दूर होते दिख रहे हैं। पंजाब में यह आम मान्यता रही है कि कैप्टन अमरेंद्र सिंह सियासतदान तो हैं पर राजनेता होने से पहले वे एक महाराजा हैं। कम से कम उनके 2002 से 2007 के कार्यकाल से यह तो स्पष्ट रहा कि वे सीएम होकर भी सत्ता चलाने में टैक्नोक्रेट्स का सहारा लेते लेते सत्ता का संचालन भरत इन्द्र सिंह चाहल जैसे आदमी के हाथ में सौंप चुके थे जिसे उस दौर में पंजाब का सुपर सी.एम माना जाता था पर अब दौर बदल गया
है।ये जातीय संघर्ष ठीक नहीं
इसे सत्ता से दस साल के बनवास के कारण मानें, अकालियों के कुशासन भरे दौर के जवाब में पंजाब की जनता का एकतरफा फतवा मानें या फिर नए अंदाज की सियासत करने वाले आम आदमी पार्टी के नेताओं की उन प्रचारित नीतियों के कारण मानें जिनमें पैसे खर्च करने के स्थान पर जनता को कायदे से सम्मान देकर ही उनके दिल जीतने की कोशिश छुपी है।
जो भी हो पर इस बार सरकार बदले बदले दिखाई पड़ रहे हैं। लाव लश्कर के सदा शौकीन रहे महाराजा अमरेंद्र सिंह ने पहली केबिनेट बैठक में पंजाब के पटड़ी से उतरे माली हालात में लोकलुभावन फैसले सुनाने के बजाए कुछ ऐसे फैसले किए जिसके चलते प्रदेश की जनता छह महीने तक तो सरकार से कुछ और आशा रखने की मानसिकता से ही बाहर रहेगी। मसलन जनता को नेताओं व अफसरों की हूटर बजाने वाली गाडिय़ों व लाल बत्ती वाले कल्चर से हमेशा नफरत रही है। केबिनेट के फैसले में पहली गाज लाल बत्ती कल्चर पर गिराई गई। मजे की बात यह रही कि चुनाव घोषणा पत्र में मुख्यमंत्री को लाल बत्ती कल्चर से मुक्त रखा गया था पर पहलकदमी दिखाते हुए केबिनेट के प्रस्ताव में मुख्यमंत्री ने खुद को भी उस दायरे में ला दिया व फैसले की अधिसूचना जारी होने से पहले ही खुद को भी लाल बत्ती कल्चर से मुक्त कर दिया। जब बड़े साहिब को लाल बत्ती से मुक्त होते देखा तो मंत्रियों व अफसरों में से भी किसी ने अधिसूचना जारी होने का इंतजार नहीं किया। पंजाब लाल बत्ती कल्चर से मुक्त हो गया है। जनता में इसका बहुत अच्छा संदेश गया है।
कहने में संकोच न करें…ज़रूर कहें अपने दिल की बात…!
दूसरी गाज गिरी अकाली सरकार द्वारा शुरु की गई एक गैर संवैधानिक परंपरा पर यानी हलका इंचार्ज सिस्टम पर। पंजाब के चुनावी दौर में जहां कांग्रेसी नेताओं ने अकालियों के हारे हुए विधायकों की हलका इंचार्ज के रूप में की गई मनमानियों को अपने निशाने पर रखा, वहीं आप के निशाने पर व्यक्ति नहीं, व्यवस्था थी। आप नेता हलका इंचार्ज सिस्टम के खिलाफ बोलते रहे चुनावी रैलियों में, सो केबिनेट में इस व्यवस्था को भी सिरे से खारिज करके हलका इंचार्ज नाम की मशीनरी को पंजाब से चलता कर दिया गया है।
इसके अलावा आम आदमी पार्टी का लोकपाल प्रेम भला किससे अछूता है। प्रेम कोई भी करे पर उसे अपने फैसले के तौर पर पहली केबिनेट में ही अपना कर कैप्टन ने आम आदमी पार्टी को पंजाब में सियासी कंगाल बना दिया है क्योंकि जिन मुद्दों पर आप वाले पंजाब में शोर मचा सकते थे, उसको सरकार ने अपने फैसले के कपड़े पहना कर उन्हें लागू भी कर दिया है।
इसके अलावा कैप्टन ने समस्त मंत्रियों व विधायकों को निर्देश दिए हैं कि वे पुलिस व प्रशासन के काम में रोजमर्रा हस्तक्षेप न करें। प्रदेश के समस्त पुलिस कप्तानों को अपनी मर्जी के अधीनस्थ रखने की छूट दी गई है व नतीजे बेहतर दिखें, इसकी जिम्मेवारी पुलिस कप्तानों के सिर पर लाद दी गई है। जाहिर है पंजाब के प्रशासनिक कामकाज में जत्थेदारी दखल वाला कल्चर भी बर्खास्त हो गया है।
– अर्जुन शर्मा

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