आपसी गुटबाजी से मुक्त हो कांग्रेस : सुधांशु द्विवेदी

आपसी गुटबाजी से मुक्त हो कांग्रेस : सुधांशु द्विवेदी

देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर अभी से गंभीर नजर आ रही है तथा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा इस दिशा में अभी से रणनीतिक जमावट को अंजाम दिये जाने के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेतागण अपने राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। इसके बावजूद पार्टी की गुटबाजी कहीं न कहीं इन तमाम राजनीतिक कवायदों पर भारी पड़ रही है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के लिए यह नितांत आवश्यक है कि वह पहले गुटबाजी के मकडज़ाल से खुद को मुक्त करे तथा पार्टी के बड़े नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में आपसी सदाशयता बलवती होने के साथ-साथ उनमें काफी हद तक त्याग की भावना का विकास होना जरूरी है। किसी भी राजनीतिक संगठन से जुड़े हुए लोगों में जब तक नि:स्वार्थ भाव से काम करने की भावना का विकास नहीं होगा, तब तक उस संगठन के लिए सफलता के सोपान तय करना बहुत मुश्किल है। पार्टी में पद- प्रतिष्ठा तथा चुनावी टिकट आदि ऐसे मुद्दे हैं जो पार्टी के बड़े नेताओं को ही एक दूसरे के खिलाफ खड़े कर देते हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩे के साथ ही उनके मन में भी जल्द से जल्द बड़ा पद पाने की उत्कंठा बलवती होने लगती है।
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सच यह है कि कांग्रेस पार्टी का अभी जमीनी आधार मजबूत करने की सख्त जरूरत है। आज स्थिति तो यह हो गई है कि कांग्रेस पार्टी का अगर कोई दलीय कार्यक्रम हो तो उसमें मंच पर बैठने के लिए नेताओं का हुजूम उमड़ पड़ता है जबकि कार्यकर्ताओं की कमी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। देश के विभिन्न राज्यों में तमाम गुटों में विभाजित कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं को भी यह समझना बेहद जरूरी है कि विचारधारा की उर्वरता ही पार्टी की राजनीतिक जमीन को उपजाऊ बनाने का काम करेगी तथा पार्टी की विचारधारा का व्यापक प्रचार-प्रसार व जनता-जनार्दन के बीच उसकी अधिकाधिक स्वीकार्यता ही नेताओं के राजनीतिक भाग्य व भविष्य का निर्धारण करेगी। अभी मुंबई महानगरपालिका के चुनाव हैं, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि अगर कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस यह चुनाव मिलकर लड़ें तो काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आ सकते हैं। मुंबई कांग्रेस में तो आपसी सिर फुटौव्वल इतना ज्यादा है तथा पार्टी नेताओं का आपसी झगड़ा खत्म कराने में ही बड़े नेताओं को इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है तो फिर एनसीपी के साथ चुनावी तालमेल कैसे हो पायेगा, यह कह पाना मुश्किल है। महाराष्ट्र विधानसभा के पिछले चुनाव में अगर राज्य कांग्रेस नेताओं ने आपसी तालमेल का परिचय देकर चुनाव लड़ा होता तथा शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी से कांग्रेस का गठबंधन हो गया होता तो राज्य के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को शानदार सफलता मिली होती।
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 गुटबाजी के चलते ही पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा था। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम और पार्टी के वरिष्ठ नेता गुरुदास कामत की आपसी तनातनी खत्म कराने में पार्टी के विशेष पर्यवेक्षक हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को भी सफलता नहीं मिल पा रही है। वैसे हुड्डा के गृह राज्य हरियाणा में भी पार्टी के अंदरूनी झगड़े कम नहीं हैं क्यों कि अभी कुछ माह पूर्व ही हरियाणा कांग्रेस में हुड्डा गुट व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर के समर्थकों के बीच मरपीट हो गई थी। इसका शिकार खुद तंवर भी हुए तथा उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हरियाणा में कांग्रेस पार्टी की स्थिति बहुत मजबूत रही है तथा प्रदेश में जब-जब कांग्रेस की सत्ता आई है तो राज्य का चहुंमुखी विकास भी हुआ है। इसके बावजूद अगर पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा तो इसके लिये गुटबाजी ही तो जिम्मेदार थी। कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी की समस्या को लेकर नेताओं-कार्यकर्ताओं द्वारा समय-समय पर चिंता भी जताई जाती रहती है लेकिन इस समस्या को दूर करने की दिशा में कारगर प्रयास नहीं किये जाते। अभी कुछ दिन पूर्व ही कांग्रेस पार्टी का मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें कई बड़े नेता तो पहुंचे ही नहीं और जो नेता उक्त कार्यक्रम में शामिल हुए, वह आपसी एकजुटता के माध्यम से कार्यकर्ताओं को ऊर्जित व उत्साहित करने के बजाय खुद एक-दूसरे पर निशाना साधते नजर आये। किसी ने पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष बदलने की मांग कर डाली तो किसी ने छोटे पदाधिकारियों को ही अपमानित कर दिया। कांग्रेस पार्टी के यदि ईर्ष्या और अवसादग्रस्त होने का दौर इसी तरह चलता रहा तो फिर पार्टी के लिये स्वर्णिम दौर कैसे लाया जा सकेगा, यह कह पाना मुश्किल है।
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वैसे राजनीतिक बिरादरी के लोगों में पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की लालसा होने में किसी को कोई ऐतराज नहीं है क्यों कि यह लालसा ही आखिर उनकी निरंतर सक्रियता का आधार बनती है लेकिन उसके लिए आपसी सद्भाव एवं एकजुटता का होना भी बेहद जरूरी है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान ही कांग्रेस पार्टी में अगर गुटबाजी की इस तरह की खबरें सामने आ रही हैं तो इस स्थिति को पार्टी हितों के लिहाज से कैसे उपयुक्त कहा जा सकता है?
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उत्तरप्रदेश में पार्टी के नेताओं ने अगर अपने सियासी कौशल व सूझबूझ का इस्तेमाल करके सपा के साथ चुनावी गठबंधन किया है तथा पंजाब में भी पार्टी को सत्ता की प्रमुख दावेदार मानने के साथ-साथ उत्तराखंड की स्थिति को भी पार्टी के लिये उत्साहजनक बताया जा रहा है तो फिर पार्टी को इसका चुनावी फायदा भी तो मिलना चाहिये। कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक पुनरुत्थान का मार्ग तभी प्रशस्त हो सकता है जब आपसी घात-प्रतिघात व गुटबाजी की समस्या पर रोक लगेगी। 

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