आत्म निर्भरता की उद्घोषणा करती सेल्फी… फोटो कला के लिये प्रेरणा है सेल्फी!

आत्म निर्भरता की उद्घोषणा करती सेल्फी… फोटो कला के लिये प्रेरणा है सेल्फी!

‘स्वावलंबन की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की ये पंक्तियां सेल्फी फोटो कला के लिये प्रेरणा है। यह और बात है कि कुछ दिल जले कहते हैं कि सेल्फी आत्म मुग्धता को प्रतिबिंबित करती हैं। ऐसे लोग यह भी कहते हैं कि सेल्फी मनुष्य के वर्तमान व्यस्त एकाकीपन को दर्शाती है। जिन्हें सेल्फी लेनी नहीं आती, ऐसी प्रौढ़ पीढ़ी सेल्फी को आत्म प्रवंचना का प्रतीक बताकर अंगूर खट्टे हैं वाली कहानी को ही चरितार्थ करते दिखती हैं।
अपने एलबम को पलटता हूं तो नंगधड़ंग नन्हें बचपन की उन श्वेत श्याम फोटो पर दृष्टि पड़ती है जिन्हें मेरी माँ या पिताजी ने आगफा कैमरे की सेल्युलर रील घुमा घुमा कर खींच रहा होगा। अपनी यादों में खिंचवाई गई पहली तस्वीर में मैं गोल मटोल सा हूं और शहर के स्टूडियो के मालिक और प्रोफेशनल फोटोग्राफर कम शूट डायरेक्टर लड़के ने घर पर आकर चादर का बैकग्राउंड बनवाकर सैट तैयार करवाया था। हमारी फैमिली फोटोग्राफ के साथ ही मेरी कुछ सोलो फोटो भी खिंची थीं। मुझे हिदायत दी थी कि मैं कैमरे के लैंस में देखूं। वहाँ से चिडिय़ा निकलने वाली है।
घर के कम्पाउंड में वह जगह चुनी गई थी जिससे सूरज की रोशनी मुझ पर पड़े और पिताजी के इकलौते बेटे का बढिय़ा सा फोटो बन सके। फोटो अच्छा ही है क्योंकि वह फ्रेम करवाया गया और बड़े सालों तक हमारे ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाता रहा। अब वह फोटो मेरी पत्नी और बच्चों के लिये आर्काईव महत्त्व का बन चुका है।
यादों के एलबम को और पलटें तो स्कूल, कालेज के वे ग्रुप फोटो मिलते हैं जिन्हें हार्ड दफ्ती पर माउंट करके नीचे नाम लिखे होते थे कि बायें से दायें कौन कहां खड़ा है। मानीटर होने के नाते मैं मास्साब के बाजू में सामने की पंक्ति पर ही सेंटर फारवर्ड पोजीशन पर मौजूद जरूर हूं पर यदि नाम न लिखा हो तो शायद खुद को भी आज पहचानना कठिन हो।
वैसे सच तो यह है कि मरते दम तक हम खुद को कहाँ पहचान पाते हैं। प्याज के छिलकों या कहें गिरगिटान की तरह हर मौके पर अलग रंग रूप के साथ हम खुद को बदलते रहते हैं। आफिस के खुर्राट अधिकारी भी बीबी और बास के सामने दुम दबाते नजर आते हैं। शादी में जयमाला की रस्मों के सूत्रधार फोटोग्राफर ही होते हैं। वे चाहें तो गले में पड़ी हुई माला उतरवा कर फिर से डलवा दें। शादी का हार गले में क्या पड़ता है, पत्नी जीवन भर शीशे में उतारकर फोटू खींचती रहती है। यह और बात है कि वे फोटू दिखती नहीं, जीवन शैली में ढल जाती हैं।
कालेज के दिन वे दिन होते हैं जब आसमान भी लिमिट नहीं होता। अपने कालेज के दिनों में हम स्टडी ट्रिप पर दक्षिण भारत गये थे। ऊटी के बाटनिकल गार्डन के सामने खिंचवाई गई उस फोटो का जिक्र जरूरी लगता है जिसे निगेटिव प्लेट पर काले कपड़े से ढांक कर बड़े से ट्रिपाईड पर लगे कैमरे के सामने लगे ढक्कन को हटाकर खींचा गया था और फिर केमिकल ट्रे में धोकर कोई घंटे भर में तैयार कर हमें सुलभ करवा दिया गया था। कालेज के दिनों में हम फोटोग्राफी क्लब के मेम्बर रहे हैं। डार्क रूम में लाल लाइट के जीरो वाट बल्ब की रोशनी में हमने सिल्वर नाट्रेट के सोल्यूशन में सधे हाथों से सैल्युलर फिल्में धोई और याशिका कैमरे में डाली हैं। आज भी वे निगेटिव हमारे पास सुरक्षित हैं पर शायद ही उनसे अब फोटो बनवाने की दुकानें हो।
डिजिटल टेक्नीक की क्रांति नई सदी में आई। पिछली सदी के अंत में तस्करी से आये जापानी आटोमेटिक टाइमर कैमरे को सामने सैट करके रख कर मिनिट भर के निश्चित समय के भीतर कैमरे के सम्मुख पोज बनाकर सेल्फी हमने खींची है पर तब उस फोटो को सेल्फी कहने का प्रचलन नहीं था। सेल्फी शब्द की उत्पत्ति मोबाइल में कैमरों के कारण हुई। यूं तो मोबाइल बातें करने के लिये होता है पर इंटरनेट, रिकार्डिग सुविधा और बढिय़ा कैमरे के चलते अब हर हाथ में मोबाइल, कम्प्यूटर से कहीं बढ़कर बन चुके हैं।
जब हाथ में मोबाइल हो, फोटोग्राफिक सिचुएशन हो, सिचुएशन न भी हो तो खुद अपना चेहरा किसे बुरा दिखता है। ग्रुप फोटो में भी लोग अपना ही चेहरा ज्यादा देखते हैं। लगे न फिटकरी रंग चोखा आये की शैली में सेल्फी खींचो और डाल दो इंस्टाग्राम या फेसबुक पर और लाइक ही लाइक बटोर लो।
दुर्व्यवहार की शिकार न बनें…फ्रेंडली रिलेशन रखें.!

अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ साधन है सेल्फी। मेरे फेसबुक डाटा बताते हैं कि मेरी नजर में मेरे अच्छे से अच्छे व्यंग्य को भी उतने लाइक नहीं मिलते जितने मेरी खराब से खराब प्रोफाइल पिक को लोड करते ही मिल जाते हैं। शायद पढऩे का समय नहीं लगाना पड़ता, नजर मारो और लाइक करो इसलिये। शायद इस भावना से भी कि सामने वाला भी लाइक रेसीप्रोकेट करेगा।
यूं लड़कियों को यह प्रकृति प्रदत्त सुविधा है कि वे किसी को लाइक करें न करें, उनकी फोटो हर कोई लाइक करता है।
सेल्फी से ही रायल जमाने के तैल चित्र बनवाने के मजे लेने हों तो अब आपको घंटों एक ही पोज पर चित्रकार के सामने स्थिर मुद्रा में बैठने की कतई जरूरत नहीं है। प्रिज्मा जैसे साफ्टवेयर मोबाइल पर उपलब्ध हैं। सेल्फी लोड करिये और अपना राजसी तैल चित्र बना लीजीए वह भी अलग अलग स्टाइल में मिनटो में।
जब सस्ती सरल सुलभ सेल्फी टेक्नीक हर हाथ में हो तो उसके व्यवसायिक उपयोग कैसे न हों। कुछ इनोवेटिव एम बी ए पढ़े प्रोडक्ट मैनेजर्स ने उनके उत्पाद के साथ सेल्फी लोड करने पर पुरस्कार योजनायें भी बना डालीं। परसाई जी, शरद जी, श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य लिखते रहे।
बुजुर्गों की सक्रियता बढ़ाता है चुकंदर…!

हम आप ज्ञान चतुर्वेदी,आलोक पुराणिक, अनूप शुक्ल और टैग किये गये सारे व्यंग्यकारों सहित कई मित्र व्यंग्य लिख रहे हैं पर व्यंग्य को हास्य में ढालकर रुपये बना रहे हैं कपिल शर्मा अपने टीवी शो के जरिये। वे भी लावा सेल्फी धड़ल्ले से खींचे जा रहे हैं। तो अपनी ढेर सी शुभकामनायें। सेल्फी युग में सब कुछ हो।
भगवान से यही दुआ है कि हम सैल्फिश होने से बचें और खतरनाक सेल्फी लेते हुये किसी पहाड़ की चोटी, बहुमंजिला इमारत, चलती ट्रेन, या बाइक पर स्टंट की सेल्फी लेते किसी की जान न जावे।
– विवेक रंजन श्रीवास्तव

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