आत्मिक संतुष्टि के लिए हंसना जरूरी

आत्मिक संतुष्टि के लिए हंसना जरूरी

B  हास्य चिकित्सा स्वयं में एक विशिष्ट किस्म की चिकित्सा है। इसमें बगैर कुछ खर्च किए ही चिकित्सा सेवा प्राप्त हो जाती है। हास्य हमारी प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है।
सच कहें तो हंसना एक कला है। लोग हंसने में भी कंजूसी करते हैं। हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति चुंबकीय आकर्षण से परिपूर्ण होता है। जिनके चेहरे पर सदैव मुस्कान रहती है वे विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं डिगते। जापान के लोग जिंदादिल कहे जाते हैं क्योंकि वे हंसना जानते हैं। दिल खोलकर हंसते हैं। आज की इस आपाधापी की दुनियां में चेहरा हंसी को तरस जाता है। समस्याओं की कमी नहीं है। आए दिन एक नई समस्या हमें झकझोरने को तैयार रहती है। प्रतिस्पर्धा के इस युग में तनाव बढ़ रहा है। तनाव के साथ ही बढ़ रही हैं नई-नई बीमारियां।
कुछ लोग इस युग में भी तनावों को हावी नहीं होने देते। स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखते हैं और अनुशासित जीवन जीना पसंद करते हैं। सुबह की सैर का वे लुत्फ उठाते हैं। बाग-बगीचों में सुबह-सुबह अच्छी खासी चहल-पहल रहती है। लाफ्टर क्लबों की बढ़ती हुई संख्या इस बात का सबूत है कि लोगों को हास्य चिकित्सा की उपयोगिता अनुभूव हो रही है।
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हंसना फायदेमंद है। हंसी हमारे शरीर को मानसिक तनाव के दौरान असीम शक्ति प्रदान करती है। मनोबल बरकरार रहता है। मरीज को भी वही चिकित्सक ज्यादा अच्छे लगते हैं जिनके चेहरे पर मुस्कुराहट होती है। कहते हैं कि डाक्टर का चेहरा और उसका चुंबकीय व्यक्तित्व मरीज का आधा दर्द दूर कर देता है। गुस्सैल चेहरे को भला कौन पसंद करेगा।
हंसना एक कवायद है। इससे मांसपेशियां ढीली हो जाती हैं। शरीर में एक नई ऊर्जा, उत्साह, उमंग एवं स्फूर्ति संचारित होती है। खुशियां बांटने से बढ़ती हैं। हंसते-हंसते जीवन जीने को जीने की कला कहते हैं। तन के साथ ही साथ मन भी प्रफुल्लित रहना चाहिए। दिल खोलकर हंसने से मांसपेशियों की ताकत बढऩे के साथ ही उनके बीच बेहतर सामंजस्य और संतुलन भी स्थापित होगा, तभी नर्वस सिस्टम सही रहेगा।
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फेफड़े और रक्त संचार की व्यवस्था दुरूस्त होने से शरीर में चुस्ती फुर्ती का विकास होता है। बिना तनाव के हंसते रहने से आप हमेशा तंदुरूस्त रहेंगे। आपका मन शांत रहेगा। आप अपने मन में गंदे विचारों को आने ही नहीं देंगे। आप अगर दूसरे से हंसते हुए बात करते हैं तो सामने वाला व्यक्ति कितना भी कठोर क्यों न हो, आपके साथ सभ्यता से पेश आयेगा।
शरीर तो हमारा प्रतिदिन स्नान करता है लेकिन जरूरी है मन का स्नान करें ताकि दुर्भावनाएं न हो सकें। आत्मिक संतुष्टि के लिये हर पल मुस्कुराते रहना चाहिए। परिस्थितियां कैसी भी क्यों न रहें, हमें हर पल हंसते मुस्कुराते और वाणी पर संयम रखते हुए ही सभी चुनौतियों का सामना करना चाहिए।
– दीपक लालवानी

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