आज का मनुष्य नहीं है सुखी…अशांत मन से पैदा होती हैं बीमारियां..!

आज का मनुष्य नहीं है सुखी…अशांत मन से पैदा होती हैं बीमारियां..!

 आज संसार के सभी व्यक्ति सुख-सुविधा के भौतिक साधनों को जुटाने में लगे हुए हैं। बहुत सारी वस्तुएं व सुख-सुविधा के आधुनिक साधनों को जुटाकर भी आज का मनुष्य सुखी नहीं है। जो कुछ उसके पास है, उससे वह संतुष्ट नहीं है और जो उसके पास नहीं है, उसे पाने के लिए जी तोड़ परिश्रम कर रहा है। जो कुछ प्राप्त कर लिया है उससे भी मनुष्य का मन शांत नहीं, अशांत ही बना हुआ है। आज का मनुष्य शारीरिक और मानसिक तौर पर रूग्ण है और तनावग्रस्त जीवन जी रहा है।
आखिर ऐसा क्यों है? सबकी जड़ मनुष्य की अधिक प्राप्त करने की हवस है। अधिक प्राप्त करने की होड़ में मनुष्य प्रकृति से काफी दूर हो गया है। आज मनुष्य जितना साधन सम्पन्न होता जा रहा है उतना ही प्रकृति से दूर होता जा रहा है।
प्रत्येक व्यक्ति की आंतरिक शक्ति बड़ी गहराई के साथ और अच्छे संतुलन के साथ प्रकृति से संबद्ध है अर्थात मनुष्य की आंतरिक प्रकृति और बाहरी प्रकृति में काफी गहरा संबंध है, इसलिए किसी भी तरह का परिवर्तन प्रकृति में या मनुष्य के चारों ओर के प्राकृतिक वातावरण में होता है उसके अच्छे या बुरे गुणों के अनुसार उसका प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। बाहरी प्रकृति या वातावरण से मनुष्य का स्वभाव, व्यवहार और प्रकृति, सभी प्रभावित होते हैं।
हमारे प्राचीन ऋषि, मुनि और संत मनुष्य की आंतरिक और बाहरी प्रकृति के संबंध को समझते थे इसलिए उन्होंने मनुष्य को हर तरह से समझाने-बुझाने का प्रयास किया लेकिन मनुष्य उन सबको भूल चुका है। उसे कुछ भी याद नहीं है। आज के वैज्ञानिक प्रकृति और मनुष्यों के संबंध पर कार्य कर रहे हैं लेकिन उनका ध्यान प्रकृति की उन अकूत संपदाओं पर केन्द्रित है जो मानव जाति की सुख-सुविधा के लिए आवश्यक हैं। मानव मात्र की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक सम्पदाओं को जुटाने में वैज्ञानिकों की रूचि नहीं है। वैसे तो विज्ञान मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्यरत है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। विज्ञान तो प्रकृति का भंडार खाली कर चुका है। विज्ञान देख ही नहीं रहा कि प्रकृति का इतना दोहन किया जा चुका है कि पृथ्वी के गर्भ में उन तत्वों की कमी हो गई है जो मनुष्य व अन्य जीवों के लिए काफी जरूरी है।
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मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंधों को आज के मनुष्यों को समझना होगा। मनुष्य और प्रकृति के बीच जो गहरा भावनात्मक संबंध है, यह जब टूटता है तो इसका प्रभाव मनुष्य के शरीर पर और उसके अंदर की प्रकृति पर पड़ता है, फलत: मनुष्य अनेकों शारीरिक और मानसिक रोगों से ग्रसित हो जाता है। उसके अंदर आक्रामकता बढ़ जाती है जिसके कारण वह हिंसक बन जाता है और अपराध करने लगता है।
प्राकृतिक स्रोतों का अंधाधुंध दोहन, जंगलों की कटाई, गलत स्थानों पर कारखानों की स्थापना, अनियमित जीवन शैली और आधुनिकता का अंधानुकरण आदि कारणों से मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। इससे मनुष्य और प्रकृति के बीच असंतुलन के कारण ही मनुष्य तरह-तरह के रोगों का शिकार होता है और समाज भी रोगग्रस्त हो जाता है।
प्रकृति के साथ मनुष्य का संतुलन जरूरी है। दोनों के बीच असंतुलन के कारण मनुष्य की जेनेटिक संरचना प्रभावित होती है, ऐसा जेनेटिक विशेषज्ञों का कहना है।
प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने से ओजोन परत की मोटाई घट रही है। उसमें जगह-जगह छेद भी हो गए हैं। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों से जीवों की रक्षा करता है। ओजोन परत की क्षति के कारण ही स्किन कैंसर जैसे रोग पैदा हो रहे हैं।
सुपरसोनिक विमान, कारखानों से निकलते रसायनों के धुएं, रेडियोधर्मिता, अंतरिक्ष यान, बहुत से रसायन व गैस आदि ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ओजोन परत के छिजने का ही नतीजा है कि धरती का तापमान बढ़ रहा है जिससे धु्रवों पर जमी बर्फ पिघल रही है। मौसम का मिजाज बदल रहा है। जमीन की उर्वरता प्रभावित हो रही है। आने वाली पीढिय़ां जेनेटिक बीमारियों से ग्रसित होंगी।
आज धड़ल्ले से कीटनाशक रसायनों का कीड़े-मकोड़े व अन्य जीवों को मारने के लिए प्तप्रयोग हो रहा है। अनुसंधान के नाम पर असहाय पशु-पक्षियों की हत्या की जा रही है। इससे प्रकृति का चक्र असंतुलित हो रहा है।
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इलेक्ट्रानिक्स उपकरण अभी तो बहुत अच्छे लग रहे हैं लेकिन इन उपकरणों से उत्सर्जित होती इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणों से मनुष्य की जींस प्रभावित हो रही हैं। अभी तो नहीं लेकिन बाद में इसका दुष्परिणाम परिलक्षित होगा। असमय होने वाले प्रसव और गर्भपातों के पीछे भी इन किरणों का हाथ हो सकता है।
कल-कारखानों और वाहनों के कारण जल और वायु प्रदूषित हो रहे हैं। कारखानों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले व अनुपयोगी पदार्थ पर्यावरण को बिगाड़ रहे हैं। इससे फेफड़ों व हृदय की बीमारियां बढ़ रही हैं। पेड़ों की कटाई के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है जिसके कारण आनेवाली पीढिय़ां अनेकों बीमारियों से ग्रसित हो सकती हैं।
ध्वनि प्रदूषण से भी प्रकृति के साथ संतुलन बिगड़ रहा है। ध्वनि प्रदूषण का मानसिक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। नवजात शिशुओं और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्वनि, वायु और जल प्रदूषण का बुरा असर पड़ता है।
फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए स्वाद और कीटनाशकों के रूप में रसायनों का काफी अधिक उपयोग हो रहा है। इससे भी मनुष्य का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। कीड़ों को खाने वाले पक्षियों को मनुष्यों ने मार दिया है। अगर वे पक्षी नहीं मारे गए होते तो कीटनाशकों के उपयोग की नौबत ही नहीं आती।
आज नई-नई बीमारियां पैदा हो रही हैं जिनका उपचार खोजने में वैज्ञानिक और डॉक्टर जुटे हुए हैं। ये बीमारियां विज्ञान और प्राकृतिक असंतुलन के कारण ही पैदा हो रही हैं। अनिद्रा, मानसिक तनाव व फ्रस्टे्रशन आदि प्राकृतिक असंतुलन के ही परिणाम हैं। प्राकृतिक स्रोतों के थक जाने के कारण ही कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की स्थिति पैदा हो रही है।
यदि मनुष्य स्वयं स्वस्थ रहना चाहता है, आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ देखना चाहता है, मनुष्य को प्राकृतिक आपदाओं से बचाना चाहता है तो उसे प्रकृति के नियमों के अनुसार चलना पड़ेगा अन्यथा उसे रोग, बीमारी व प्राकृतिक आपदाओं के रूप में प्रकृति के कोप को सहना पड़ेगा।
– भवनीश चंद वैद्य

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