आखिर वादों की उम्मीद के सहारे कब तक जिएं किसान? : सत्यम सिंह बघेल

आखिर वादों की उम्मीद के सहारे कब तक जिएं किसान? : सत्यम सिंह बघेल

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की आत्महत्या पर चिन्ता व्यक्त करते हुए केंद्र, राज्य सरकारों और रिजर्व बैंक से किसानों की आत्महत्या की वजह के बारे में चार हफ्ते में रिपोर्ट सौंपने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि फसलों की बर्बादी, कर्ज और प्राकृतिक आपदा से किसानों की रक्षा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें एक समग्र नीति क्यों नहीं ला रही हैं। दरअसल देश के तमाम राज्यों में किसान फसलों की बर्बादी और कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या करने को मजबूर हैं। 30 दिसंबर 2016 को किसानों की आत्महत्या पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों से इस बात का खुलासा हुआ है कि वर्ष 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्या की, जो वर्ष 2014 में आत्महत्या करने वाले 5650 किसानों की संख्या की तुलना में 42 फीसदी अधिक है। हालांकि, इस दौरान कृषि श्रमिकों की खुदकुशी दर में 31 फीसदी से अधिक की कमी भी दर्ज की गई। वर्ष 2014 में जहां 6710 कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की थी, वहीं वर्ष 2015 में 4595 कृषि श्रमिकों ने जीवन त्याग दिया। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट के तथ्य नये सिरे से इस आशंका को पुष्ट करते हैं कि कर्जदारी और दिवालिया होना किसान-आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह है, मतलब किसानों और खेतों में काम करने वाले मजदूरों की आत्महत्या का कारण कर्ज, कंगाली, और खेती से जुड़ी दिक्कतें हैं और आत्महत्या के शिकार किसानों में सबसे ज्यादा संख्या छोटे और सीमांत किसानों की है।
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गौरतलब है कि किसानों की स्थिति के आकलन पर केद्रित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या बीते दस सालों (2003-2013) में 48.6 प्रतिशत से बढ़कर 52 प्रतिशत हो गई है और हर कर्जदार किसान परिवार पर औसतन 47 हजार रुपये का कर्ज है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में रोजाना औसतन चार किसान जान दे रहे थे, जो 2016 में बढ़कर छह हो गए। जबकि कई राज्यों में किसानों की आत्महत्या करने का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। इनमें बिहार, पश्चिम बंगाल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, मिजोरम, नगालैंड और उत्तराखंड शामिल हैं। पांच साल में किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के बीच किसानों की बदहाली की यह एक बेहद दुखद तस्वीर है जो सामने आई है। भारत देश को कृषि प्रधान देश माना जाता है, देश की आजादी के बाद से ही भारतीय किसान को मजबूत व् सशक्त बनाने के नारे दिए जा रहे हैं और वादे किए जा रहे हैं लेकिन वादे और नारे सिर्फ भाषण तक ही सिमित रह गये हैं। किसानों की दयनीय स्थिति किसी से छिपी नही है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी आधुनिकता के इस युग में भी किसान आत्म हत्या करने के लिए बेबस हैं। वहीं मध्यप्रदेश की बात करें तो राज्य सरकार ने हाल ही में प्रदेश के कई जिलों बड़े-बड़े समारोह को माध्यम से अपना प्रचार-प्रसार कर किसानों को फसल बीमा योजना के रूप में राशि बांटी लेकिन शर्मनाक और दुखद बात यह है कि मिली राशि ऊंट के मुंह में जीरा जैसे थी।
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कई जिलों में किसानों को सिर्फ दो रुपये और 200 रुपये से लेकर दो हजार रुपये तक की न्यूनतम बीमा राशि मिली। मध्यप्रदेश लगातार चार वर्षों से कृषि कर्मण पुरुस्कार जीत रहा है, तो निश्चित ही किसानों की औसत पैदावार अच्छी रही होगी। तभी तो प्रदेश ने कृषि उत्पादन का रिकार्ड बनाया और इसी के आधार पर प्रदेश को कृषि कर्मण अवार्ड मिला। अब सवाल यह उठता है कि जब पैदावार अच्छी थी तो किसानों को बीमा राशि ऊंट के मुंह में जीरा के जैसी क्यों मिली? अगर किसानों की पैदावार कम थी तो सरकार को चार साल तक कृषि कर्मण अवार्ड कैसे मिला? या तो राज्य सरकार की ओर से कृषि कर्मण पुरुस्कार लेने के लिए केन्द्र के पास उत्पादन के जो आंकड़े भेजे वे फर्जी थे या फिर प्रदेश के किसानों को फसल बीमा के लाभ से वंचित करने के लिए जानबूझकर औसत पैदावार कम बतायी गयी जिसके कारण किसानों को फसल बीमा की राशि का पर्याप्त लाभ नही मिल पाया। आखिर गलती किस स्तर पर किसने की और क्या गलती करने वालों के तार फसलों का बीमा करने वाली बीमा कंपनियों से जुड़े थे। इसके पीछे का सच क्या है? किसान पुत्र मुख्यमंत्री को तलाशना होगा, क्योंकि खामियाजा तो किसानों को भुगतना पड़ रहा है। किसान के लिए उसके खेत खलिहान और उसकी फसल ही उसका भविष्य, उसकी तरक्की, उसके अरमान, उम्मीदें, सबकुछ होती हैं।
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जब सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि या फिर किसी कारणवश किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाता है, उसकी उम्मीदें बिखर जाती हैं, सपने चूर-चूर हो जाते हैं और सरकारों के वादे-इरादे केवल कागजी आंकड़े बनकर रह जाते हैं। ऐसा नही है कि किसानो की यह स्थिति केवल वर्तमान समय में है। किसानों की यह दयनीय दशा हमेशा से बनी हुई है। चाहे वह कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की सरकार सभी के कार्यकाल में किसानों का शोषण हुआ है, उन्हें अनदेखा किया गया है, उनकी दयनीय दशा पर हमेशा से राजनीति हुई है। जब से देश आजाद हुआ तब से अपनी समस्याओं के चलते किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रुक नहीं रहा है। हम लोग हमेशा से यही कहते-सुनते आ रहे हैं, भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह देश किसानों का देश है, इस देश के किसान भारत की जान हैं, शान हैं, किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें करते हैं और सुनते हैं। इन बातों को अख़बारों, किताबों में पढ़ते-पढ़ते और भाषणों, समाचार चैनलों में सुनते सुनते वर्षों बीत गये, कई पीढियां गुजर गईं, फिर भी आज इस देश में जो स्थिति किसानों की है, वह किसी से छिपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है। आखिर आज भी भारतीय किसान वादों-बयानों और घोषणाओं की उम्मीदों के सहारे कब तक जिए।

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