आखिर किसानों को गुस्सा क्यों आया… ?

आखिर किसानों को गुस्सा क्यों आया… ?

हाल ही में सरकारी स्तर पर सामने आई जानकारी से पता चला है कि सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.1 फीसदी रह गई है। अलबत्ता लंबे समय से संकटग्रस्त रहे कृषि क्षेत्र में बढ़त दर्ज की गई है। तीसरी तिमाही में कृषि विकास दर बढ़कर 5.2 प्रतिशत हो गई है। तय है, इस उपलब्धि को हासिल करने में अच्छे मानसून के साथ-साथ किसानों की मेहनत भी रंग लाई है। बावजूद देश के किसान और किसानी से जुड़े मजदूर किस हाल में हैं, इसकी तस्वीर महाराष्‍ट्र, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात में चले किसान आंदोलनों से सामने आई है। आंदोलन की शुरूआत महाराष्‍ट्र के अहमदनगर जिले के कोपरगांव से हुई।
यहां संपूर्ण कर्ज माफी के लिए 200 किसान एकजुट हुए और अपना आक्रोश जताते हुए हिंसा पर उतर आए। नतीजतन अशोक मोरे नाम के एक किसान की मौत भी हो गई। किसानों ने जहां दूध और फसलों से भरे वाहनों में आग लगा दी, वहीं लाखों लीटर दूध सड़कों पर बहा दिया। महाराष्‍ट्र में किसानों की प्रमुख मांग शत-प्रतिशत कर्ज माफी है, वहीं मध्यप्रदेश के किसान फसल के न्याय संगत मूल्य की मांग कर रहे हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व महाराष्‍ट्र में किसान क्रांति जन आंदोलन और मध्यप्रदेश में भारतीय किसान संघ ने संभाला हुआ है। हालांकि महाराष्‍ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने तुरंत बैठक बुलाकर अक्टूबर 2017 तक समस्या के निराकरण का भरोसा दिलाकर किसानों के गुस्से को काबू किया है, वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ वार्ता के बावजूद आंदोलन इंदौर व उज्जैन संभागों में जारी है।
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किसानों की ऋृणमाफी के सिलसिले में केंद्र और प्रदेश की सरकारों का विरोधाभासी पहलू यह है कि औद्योगिक घरानों के कर्ज तो लगातार बट्टे खाते में डाले जा रहे हैं, जबकि किसान कर्जमाफी की मांग पर सरकार और कथित अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था बद्हाल हो जाने का रोना रोने लगते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ योगी सरकार ने किसान कर्ज माफी का निर्णय लेकर एक मिसाल पेश की है।
देश का अन्नदाता लगातार संकट में है। नतीजतन हर साल विभिन्न कारणों से 8 से लेकर 10 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह बैंक और साहूकारों से लिया कर्ज है। इस परिप्रेक्ष्य में कुछ समय पहले गुजरात में किसानों पर मंडरा रहे संकट और उनकी आत्महत्याओं को लेकर स्वयं सेवी संगठन ‘सिटीजन्स रिसोर्स एंड एक्शन इनीशिएटिव‘ ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि ‘यह बेहद गंभीर मसला है। लिहाजा किसानों की आत्महत्याओं के परिप्रेक्ष्य में राज्यों द्वारा उठाए जाने वाले प्रस्तावित प्रावधानों की जानकारी से अदालत को अवगत कराएं।‘ इसे अदालत का संवेदनशील रुख कहा जा सकता है, क्योंकि अदालत ने एक प्रदेश की समस्या को समूचे देश के किसानों की त्रासदी के रूप में देखा और विचारणीय पहलू बना दिया। यदि ऐसी ही संवेदना का परिचय केंद्र और प्रदेश सरकारें दे रही होतीं तो शायद किसानों को दुर्दशा का शिकार होकर खुदकुशी जैसा आत्मघाती कदम उठाते रहने को मजबूर नहीं होना पड़ता। हालांकि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इस नजरिए से एक अपवाद के रूप में पेश आई है। मुख्यमंत्री योगी ने किए चुनावी वादे को अमल में लाते हुए महज दो माह के भीतर ही प्रदेष के दो करोड़ 51 लाख छोटे और सीमांत किसानों में से 2 करोड़ 15 लाख किसानों के एक लाख रुपए तक के कर्ज माफ करने का ऐतिहासिक निर्णय ले लिया। इस माफी पर करीब 36 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे, जो राज्य के कुल राजस्व का लगभग आठ प्रतिशत है। देश में कर्ज में डूबे छोटी जोत के किसान सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं। हालांकि कर्जमाफी का लाभ उन्हीं किसानों को मिलता है, जिन्होंने सरकारी और सहकारी बैंकों से कर्ज लिया होता है।
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निजी ऋणदाताओं से कर्ज लेने वाले किसान इस लाभ से वंचित रह जाते है़ं। योगी यह कर्जमाफी सरकारी खर्चों में कटौती करके करेंगे। इस दिशा में अहम् पहल करते हुए योगी ने उन सभी उच्चाधिकारियों की विदेश यात्राओं को खारिज कर दिया, जो विभिन्न प्रशिक्षणों के बहाने गर्मियों में परिवार सहित विदेशों में मौज-मस्ती के लिए यात्राएं करते थे। ऐसी संवेदनाविहीन यात्राओं पर सभी प्रदेश सरकारों को रोक लगाने की जरूरत है।
भाजपा ने लोकसभा चुनाव के घोषणा-पत्र में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने और किसानों को उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने का वादा किया था। नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल बीत जाने के बावजूद इस दिशा में कोई उल्लेखनीय पहल नहीं हुई। इसके उलट विभिन्न फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले की तुलना में कम ही बढ़े हैं। यही नहीं, जहां खाद्य तेलों का निर्यात बड़ी मात्रा में कर और दालों की पैदावार अफ्रीकी देशों को सब्सिडी देकर कराने का फैसला लेकर किसानों की कमर तोड़ने का काम किया है। किसान को उसकी उपज का बाजिब मूल्य दिलाने और किसान को न्यूनतम आय की गारंटी की बात तो दूर की कौड़ी ही रही, किसान को बेची हुई फसल का भुगतान प्राप्त करना भी मुश्किल हो रहा है। चीनी मिलों पर गन्ने का बकाया इस नजरिए से जाना-पहचाना उदाहरण है। साफ है ये उपाय कृषि और किसान के संकट के अहम् कारण तो है ही, देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी शुभ संकेत नहीं है। यही वजह है कि खेती घाटे का धंधा बनी हुई है। मौसम की मार या अन्य किसी कारण से फसल चैपट होती है तो भी किसान को विकट कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में किसान अपने को ठगा हुआ महसूस न करे तो क्या करे ?
देश में 70 फीसदी आबादा खेती-किसानी और उससे जुड़े काम-काज से आजीविका आर्जित करती है। यही वह आबादी है, जो संकटग्रस्त रहते हुए भी देश की एक अरब 25 करोड़ आबादी को भोजन उपलब्ध कराती है। साथ ही शक्कर, चावल, कपास और अनेक किस्म के आमों को निर्यात के लिए व्यापारियों को उपलब्ध कराकर अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा आर्जित करने का साधन बनती है। बावजूद जब भी किसान के ऋण माफी की बात आती है तो कापोर्रेट घरानों के पक्षधर दलाल प्रवृत्ति के अर्थशास्त्री दलील देते हैं कि किसान कर्जमाफी से देश का वित्तीय अनुशासन बिगड़ जाएगा। इसके विपरीत चंद बड़े उद्योगपतियों की ऋणमाफी और विभिन्न करों में छूट देने पर यही अर्थशास्त्री मौन रहते हैं। सरकारी कर्मचारियों को छठा और सातवां वेतनमान देने पर भी इनकी चुप्पी हैरानी का सबब बनती है, जबकि ये उपाय आर्थिक असमानता का बड़ा कारण बन रहे हैं। यदि वाकई किसानों की ऋणमाफी अर्थवयव्स्था की बद्हाली का कारण है तो फिर किस बूते पर बैंकों ने पिछले तीन साल में पूंजीपतियों के 1.14 लाख करोड़ रुपये के कर्जां को बट्टे खाते में डाल दिया ? पिछले 15 साल के भीतर के आंकड़े बताते है कि पूंजीपतियों के तीन लाख करोड़ रुपये के ऋण बट्टे खाते में डाले गए हैं। बैंक की तकनीकी भाषा में ये वे कर्ज हैं, जिनकी वसूली की उम्मीद शून्य हो गई है।
हैरानी इस बात पर भी है कि बैंकों के कुल ऋण में उद्योगपतियों की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी है, जबकि किसानों की महज 13.49 प्रतिशत ही है। जाहिर है, उद्योगपतियों में ही बैंकों का ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। यही वजह है कि पिछले 17 महीनों में बैंकों का एनपीए बढ़कर दोगुने से ज्यादा हो गया है। कारोबारियों के इन डूबे कर्जों को न्यायसंगत ठहराते हुए रिर्जव बैंक की दलील है कि आर्थिक बद्हाली के कारण कारोबारी कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं। कालांतर में आर्थिक विकासदर में सुधार होगा तो एनपीए में कमी आएगी और वसूली बढ़ जाएगी, लेकिन यही लाभ किसानों को देने के संदर्भ में न तो बैंक सोचते हैं और न ही सरकारें। बावजूद उद्योगपतियों के नाम और ऋण की राशि छिपाई जाती है, जबकि किसान को कुर्की का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि बीते दो साल में कर्ज में डूबे दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके है।
नबंवर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपला ने राज्यसभा में कृषि कर्ज से जुड़े आंकड़े पेश करते हुए बताया था कि 30 सितंबर 2016 तक देश के 9 करोड़ किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज हैं। राज्यसभा में ही केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार ने स्पश्ट किया कि 30 जून 2016 तक 50 करोड़ रूपये से अधिक का ऋण लेने वाले उद्योगपतियों के 2071 एनपीए खातों में कुल 3 लाख 88 हजार 919 करोड़ रुपए की राशि है, जो डूबंत खाते में चली गई है। इनमें भी 10 ऐसे औद्योगिक समूह हैं, जिन पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। विजय माल्या जैसे नौ हजार करोड़ के कर्जदार के भाग जाने के बावजूद सरकार इन उद्योगपतियों से कर्ज वसूली की कोई अहम् पहल नहीं कर रही है।
हालांकि राजग सरकार ने किसान हित में फसल बीमा योजना में 13 हजार 240 करोड़ रुपये, दूध प्रसंस्करण निधी में आठ हजार करोड़ और सिंचाई एवं मृदा प्रयोगशालाओं के लिए 5000 करोड़ रुपये दिए हैं। साथ ही जिन किसानों ने सहकारी बैंकों से कर्ज लिया है, उन्हें 60 दिनों की बैंक ब्याज में छूट भी दी गई है। लेकिन ये उपाय किसानों के आसूं पोंछने जैसे है। ये सभी उपाय अप्रत्यक्ष लाभ से जुड़े हैं। अच्छा है कि केंद्र और राज्य सरकारें योगी आदित्यनाथ से प्रेरणा लेते हुए उन सभी 95 प्रतिशत सीमांत, लघु और छोटे किसानों की पूर्ण कर्जमाफी की पहल करें, जिनके पास 1 से लेकर 5 हेक्टेयर तक कृषि भूमि है। देश की कुल कृषि योग्य भूमि का यह 68.7 प्रतिशत हिस्सा है। यदि सरकारें ऐसा करती है तो उनकी किसान व मजदूर के प्रति संवेदना तो सामने आएगी ही, किसान देश की अर्थव्यवस्था में भी उमंग व उत्साह से भागीदारी करेंगे ?-प्रमोद भार्गव

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