आखिरकार टीपू ही बने सुल्तान, नये दौर में नयी अग्निपरीक्षा : मृत्युंजय दीक्षित

आखिरकार टीपू ही बने सुल्तान, नये दौर में नयी अग्निपरीक्षा : मृत्युंजय दीक्षित

समाजवादी पार्टी में चल रहा सत्ता संघर्ष और असमंजस का दौर अब लगभग समाप्त हो चुका है। निर्वाचन आयोग की दहलीज पर समाजवाद के नये सितारे अखिलेश यादव ने साइकिल का चुनाव चिह्न व पार्टी को अपने नाम करवाने में सफलता हासिल कर ली है। अब यह तय हो गया है कि टीपू ही सपा के नये सुल्तान बने रहेंगे। चुनाव आयोग का फैसला आते ही अखिलेश खेमे की चमक वापस लौट आयी है और अब वह बिहार की तर्ज पर महागठबंधन के सहारे एक बार फिर 2017 में अपने अगले मिशन को फतह करने के लिए निकल पड़े हैं। समाजवाद की राजनीति में बड़ा से बड़ा दांव चलाने में माहिर राजनीति के पुरोधा सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव को उनके ही बेटे ने चारों खाने चित्त कर दिया है। अब यह देखना है कि साजवादी दल पर कब्जा करने वाले अखिलेश यादव क्या विकास, महाठबंधन और मुस्लिमपरस्ती के सहारे फिर से सत्ता पर काबिज हो पाने में सफल हो पाएंगे कि नहीं। अब यह भी तय हो गया है कि यादव परिवार की कलह एक प्रकार से परिवार का ड्रामा था। उप्र की राजनीति में इस समय काफी दिलचस्प व मनोरंजक परिवर्तन हो रहे हैं तथा लगातार होते जा रहे हैं। सभी भाजपा विरोधी हर हाल में भाजपा को रोकना चाह रहे हैं। विगत दो साल से विशेषकर बिहार में महागठबंधन के सहारे भाजपा को रोकने में सफल रहने वाली कांग्रेस अब साइकिल की सवारी करने के लिए उतावली हो रही है। यह गठबंधपन वाकई बड़ा दिलचस्प होने जा रहा है।
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उप्र की रणनीति प्रशांत किशोर के हवाले करने के बाद कांग्रेस ने 27 साल यूपी बेहाल का नारा दिया था और अब वह साइकिल का दामन थामने जा रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरे प्रदेश में खाट सभा का आयोजन किया, राहुल गांधी ने किसान यात्रा की,पूरे प्रदेश में अपने परम्परागत वोटबैंक को वापस लाने के लिये दलित सम्मेलन, मुस्लिम सममेलन और अतिपिछड़ों को 22 फीसदी आरक्षण जैसी बात करने वाली कांग्रेस,भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी है और उप्र की सत्ता में अब वह बैकडोर की राजनीति करकेे सत्ता में वापसी का मार्ग खोज रही हैं। उप्र में कांग्रेस ने दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताया था। अब वह अपने कदमों को वापस खींच रही हैं। कांग्रेस का संगठन प्रदेश में बहुत कमजोर था तथा उम्मीदवारों की भारी कमी थी। वहीं सबसे बड़ी बात यह है कि यदि कांग्रेस भी सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ जातीे तो मुस्लिम वोटों का और अधिक विभाजन होता। अब अखिलेश की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है कि जो मुस्लिम समाज असमंजस के दौर मे समाजवाद से अलग हो रहा था, क्या उसे किसी तरह से फिर सपा में वापस ला पायेेंगे। अब यह भी देखना है कि क्या मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पूर्व बाहुबली मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देंगे या फिर अवैध खनन के आरोपी गायत्री प्रसाद प्रजापति को फिर से उनके पुराने सम्मान को लौटा सकेंगे? अखिलेश खेमे के पक्ष में निर्वाचन आयोग का फैसला आते ही अखिलेश समर्थक चौतरफा जश्न में डूब गये। सोशल मीडिया व ट्विटर पर भी अखिलेश यादव छा गये हैं। समाजवादी दंगल में इस समय सबसे बुरी हालत चाचा शिवपाल व उनके समर्थकों की हो गयी है। उनके पास अब चुनाव मैदान में जाने का एकमात्र विकल्प या तो वह निर्दलीय हो जायें या फिर उन दलों का रास्ता चुन लें जहां पर अभी भी टिकटों का वितरण या व बदलाव चल रहा है।
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चुनाव आयोग का फैसला आते ही अखिलेश यादव ने नारा दिया है कि साइकिल चलती जायेगी ,आगे बढ़ती जायेगी। दबंगई व कानून के सहारे अखिलेश यादव ने साइकिल पर कब्जा तो कर लिया है लेकिन जिस प्रकार हथकंडे अपनाये उससे वह नैतिकता के आधर पर पराजित भी हो रहे हैं। अभी कुछ समय पहले यही सब लोग आडवाणी के बहाने भाजपा पर हमला बोलते थे लेकिन सपा में तो हालात बहत ही दयनीय हो गये। बेटे ने पूरी तरह से मुगलकालीन राजनीति की और अपने पिता को सत्ता से पूरी तरह से बेदखल कर दिया। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम वोटबैंक के चक्कर में सपा मुखिया मुलायम सिंह अब अपने बेटे को मुस्लिम विरोधी बता रहे हैं। अखिलेश की सबसे बड़ी परीक्षा यह भी है कि वह अपने कार्यकताओं में फिर से नया उत्साह भरें व जनमानस के बीच सपा जिस प्रकार से प्रचार की दौड़ में काफी पीछे हो गयी है, उसे फिर से ठीक करें। इस समय जनता की नजरों में समाजवादी दंगल छाया हुआ है तथा जनमानस को यह लग रहा है कि हो न हो, यह यादव परिवार की आपसी मिलीभगत है। सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह अपने बेटे को येनकेन प्रकारेण राजनीति मे स्थापित करना चाह रहे हैं। वहीं सपा के नये मुखिया अखिलेश यादव लालू- नीतीश की राजनीति के तर्ज पर प्रदेश में भाजपा को रोकना चाह रहे हैं। महागठबंधन होने के बाद भी प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बसपा को यह उम्मीद है कि अब मुस्लिम मतों का झुकाव बसपा की ही ओर होगा। इधर, भाजपा का अनुमान है कि गठबंधन के चलते मुस्लिम मतों और अन्य वर्गो के मतोें का जितना विभाजन होगा, उसका लाभ भाजपा को मिलेगा। इस गठबंधन के बाद भाजपा और बसपाके समीकरणों में व्यापक परिवर्तन आने की पूरी संभावना है तथा दोनों ही दल इसे अपने मनमाफिक मानकर चल रहे हैं। समाजवादी दंगल में सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह व उनके भाई शिवपाल यादव की भारी पराजय हुई है। इस समय कम से कम शिवपाल यादव अपने अपमान का घूंट पीकर रह रहे हैं। यह बात भी बिलकुल सही है तथा इससेे अनजान नहीं रहा जा सकता कि जब अखिलेश का महागठबंधन हो जायेगा, तब वह एक बड़ी राजनैतिक ताकत व चुनौती बनकर भी उभर सकते हैं तथा विरोधी दलों को अपनी रणनीति बदलने पर विचार करना पड़ सकता हैं।
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साइकिल का चुनाव निशान अखिलेश को मिलने के बाद इसका असर सपा पर तो पड़ने जा ही रहा है। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इसका सीधा असर भाजपा पर पड़ने जा रहा है। महागठबंधन बनने के बाद अब यह चुनाव सभी दलों पर व्यापक असर करने जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि जाति और साम्प्रदायिकता के साथ – साथ महागठबंधन विकास के नारे के साथ गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, क्षेत्रीय असंतुलन और नोटबंदी से पैदा हुई दुश्वारियों को लेकर जनता के बीच जायेगा। सपा के नये मुखिया और सीएम अखिलेश यादव पहले से ही स्मार्टफोन देने का पंजीकरण करवा चुके हैं तथा तमिलनाडु की पूर्व सीएम स्व. जयललिता के नक्शे कदम पर चलते हएु कई नये लोकलुभावन पिटारों को अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल करने वाले हैं। गठबंधन के चलते राजनीतिक समीकरण बदलने के साथ ही अब यह चुनाव किसी के लिए केकवॉक नहीं रह गया है अपितु अब लड़ाई बराबर की होने जा रही है। अब उम्मीदवारों का चयन सभी दलों के लिए बेहद खास हो गया है तथा जरा सी भी गलती किसी के लिए भी भारी पड़ने वाली है। फिर वह चाहे भाजपा हो, बसपा हो या फिर महागठबंधन। सबसे बड़ी बात यह है कि अभी तक सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह के तेवर नरम नहीं पड़े हैं तथा चाचा शिवपाल यादव अपने राजनीतिक कैरियर को संवारने के लिए कौन सा कदम उठाने वाले हैं यह भी तय नहीं है।
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वहीं बसपा नेत्री मायावती का मानना है कि अखिलेश यादव चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, अबकी बार मुजफ्फरनगर के दंगों सहित 400 से अधिक छोटे- बड़ें दंगों के लिए प्रदेश का मुसलमान सपा को माफ नहीं करने वाला। यही बात प्रदेश भाजपा के रणनीतिकार ओम माथुर का भी कहना है कि सब लोग चुनाव मैदान में आ जायें, इस बार भाजपा ही जीतेगी। प्रदेेश की जनता बदहाल कानून व्यवस्था के लिए सपा को कभी माफ नहीं करेगी । खबरें यह भी हैं कि अब सपा के नये मुखिया अखिलेश यादव ने अपना चुनावी प्रचार तूफानी बनाने के लिए तैयारी कर ली है। नये पोस्टरों में अपने पिता को संरक्षक मानकर उन्हें पूरा सम्मान प्रदान करते हुए उनकी साइकिल को लगातार आगे बढ़ाने का वादा भी किया है। नये विज्ञापनों में सपा के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह की फोटो अखिलेश यादव से बड़ी दिखाई गयी है। एक विज्ञापन में कहा गया है कि आगे बढ़ें। इन विज्ञापनों के माध्यम से पिता और पुत्र के एकसाथ होने का संदेश निहित है। प्रदेश की राजनीति में महागठबंधन का असर पड़ सकता है क्योंकि प्रदेश की कई सीटें ऐसी हैं, जहां मात्र एक फीसदी के वोट स्विंग से पूरा का पूरा नजारा ही बदल जाता है। यही कारण है कि अब किसी भी दल के लिए लड़ाई आसान नहीं रह गयी है।

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