आंखें ही आधा संसार हैं…एेसे रखें अपने अनमोल आंखों का ध्यान

आंखें ही आधा संसार हैं…एेसे रखें अपने अनमोल आंखों का ध्यान

Close up image of female brown eyes संसार में दृश्य और अदृश्य प्रत्येक प्राणी के शरीर में नेत्रों का विशेष महत्त्व है। आंखें ही आधा संसार हैं। प्रकृति की सुन्दरता का अवलोकन आंखों के बिना संभव नहीं है। आंखों की सुरक्षा का उपाय नियमित रूप से करना आवश्यक होता है। आयुर्वेद का सिद्धान्त है कि रोगों की उत्पत्ति न हो, इसके लिये स्वास्थ्य के नियम, दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतु अनुकूल चर्या का आचरण करना नितान्त आवश्यक है। इसके लिए निरोग व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य की रक्षा तथा रोगी को रोग निवारण का उपाय करते रहना चाहिए। जनसाधारण को चाहिए कि अपनी संतानों के लिये नेत्रों की रक्षा का उपाय गर्भधारण के पश्चात् से ही शुरू कर दें। माता को सात्विक आहार-विहार की योजना बनाकर लाल मिर्च, नींबू, खटाई, तेज गर्मी, तेज प्रकाश, अधिक गर्म खान-पान, मदिरा, गर्म मसाले, अधिक दस्तावर पदार्थ, वनस्पति घी, सोंठ, गुड़, अचार, शरीर में अधिक गर्मी बढ़ाने वाली औषधियों का त्याग कर देना चाहिए।
ऐसे रखें सौंदर्य को बरकरार…किशोरियों व युवतियों के लिए भी सौंदर्य के प्रति सतर्क रहना जरूरी
गर्भवती महिला को उदरस्थ बालक व अपने नेत्रों की रक्षा के लिये असली घी, दूध, दही, सरसों का तेल, सूरजमुखी का तेल, भीगे बादाम, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज, काशीफल के बीज आदि का सेवन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में करते रहना चाहिए।
गरी गोला, सूखे बादाम, नारियल पानी, मौसमी, चिरौंजी, आदि के साथ ही मुनक्का, मीठी किशमिश, संतरा, मौसमी, अनार, अमरूद, मेवा, अंगूर आदि का सेवन अच्छी मात्र में करना चाहिए। खजूर, छुहारे का सेवन थोड़ी मात्रा में करना चाहिए। गर्भवती को अंजन व काजल नहीं लगाना चाहिए। जब शिशु जन्म ले ले तो उसके पश्चात भी माता को शुद्ध घी, उत्तम गुड़, मिश्री आदि का अल्प मात्र में सेवन करना चाहिए। दशमूल का क्वाथ या अर्क, देशी अजवायन, पीपलामूल, सौंठ और प्रसूतरोग नाशक वस्तुओं का सेवन प्रसूता को आवश्यक रूप में करते रहना चाहिए। अधिक मिर्च, मसाला व खटाई का त्याग करके कम ठण्डे जल को ग्रहण करते रहना चाहिए। जब तक माता अपने शिशु को दूध पिलाती है, दूध ही शिशु का मुख्य आहार होता है। इन दिनों में मां को नेत्र हितकारी वस्तुओं का सेवन करते रहना चाहिए। काली मिर्च, शुद्ध घी, गाय का दूध, गेहूं का दलिया, मूग-मसूर की दाल आदि का सेवन नियमित रूप से करते रहना चाहिए तथा खटाई का त्याग कर देना चाहिए।
OMG : टैक्सी ड्राइवर के खाते में आए 9,800 करोड़ !

बालक की आंखों की सुरक्षा के लिये माता का दूध अमृत तुल्य होता है। बालक की आंखों में दो-चार बूंद अपना (माता का) दूध दिन में तीन बार तक अवश्य ही डालना चाहिए। आंखों में मैल आना, लालिमा, खुजली, आंखें आना, पीड़ा होना आदि जैसी कोई चीज अगर हो तो दिन से लेकर रात में चार-पांच बार अपने आंचल से दूध की बूंदों को बच्चे की आंखों में डालने से शत-प्रतिशत लाभ होता है पर मां का स्वस्थ होना आवश्यक है। आयुर्वेद ग्रंथों में माता के दूध का निषेचन नेत्रों की सुरक्षा के लिए-बहुत उत्तम लिखा है। पथ्य सेवी मां का दूध सभी प्रकार के बालकों के नेत्रों के लिए श्रेयस्कर होता है। छोटे बच्चों को सूर्य, बिजली, गैस आदि के तीव्र प्रकाश के सामने नहीं बैठने देना चाहिए क्योंकि उनकी कोमल आंखें प्रकाश की चमक से निर्बल हो जाती हैं और दृष्टिक्षय का खतरा बना रहता है। सभी प्रकार के धुएं, धूल, आंधी आदि से भी नेत्रों को निर्बलता और दृष्टि-दोष का सामना करना पड़ता है, अतएव इन हानिकारक तत्वों से भी बच्चों को बचाना चाहिए।काजल या नेत्रंजन आंखों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। शुद्ध वाष्पित गुलाब जल की दो-चार बूंदें आंखों में प्रतिदिन तीन-चार बार तक टपकाने से नेत्र स्वच्छ हो जाते हैं। अगर आंखें लाल हो गई हों तो शुद्ध गुलाब जल में एक रत्ती गुलाबी फिटकरी डालकर पूरी तरह घुल जाने के बाद 2-2 बूंद कई बार तक डालते रहना चाहिए। प्रात: काल ठण्डे जल से बारी-बारी से दोनों आंखों में छीटों को मारना चाहिए। प्रतिदिन सुबह-दोपहर एवं रात्रि को भोजन एवं नाश्ते के बाद हाथों को धोकर हथेलियों को घिसकर लगभग 2०-25 बार तक आंखों पर स्पर्श करते रहने से आंखों के रोग उत्पन्न नहीं होते। इससे अंधत्व की शंका मिट जाती है।
त्रिफला, शुद्ध घी एवं मधु का कुछ अंश मिलाकर प्रात: एवं रात्रि में खाने से नेत्रों की रक्षा होती है तथा कोई व्याधि नहीं होती। एक तोला त्रिफला को रात में किसी मिट्टी, कांसे या तांबे के पात्र में रखकर भिगो दें। प्रात: उस पानी को छानकर उससे आंखों को खोलते हुए छींटा देते रहने से आंखें संक्र मित नहीं होती।
add-royal-copy
पुनर्नवा की जड़ को अच्छी तरह साफ पानी से धोकर उसे पानी या शहद के साथ घिसकर आंखों में लगाते रहने से आंखों की रक्षा होती है। काली मिर्च के ग्यारह दानों को लेकर उसके साथ मीठे-बादाम की गिरी 5 नग, मुनक्का 5 नग को पीसकर शुद्ध घी में भूनकर मिश्री मिलाकर पीने से नेत्र शक्ति सम्पन्न होती है।
शुद्ध मधु को रात में सोते समय आंखों में अंजन की तरह लगाते रहने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। मुंह में पानी भरकर आंखों पर शीतल व स्वच्छ जल के छीटों को मारते रहने से दृष्टि बरकरार रहती है। 6 तोला उत्तम गुलाब के अर्क में पांच रत्ती फिटकिरी, 5 रत्ती कपूर की डली डालकर उसमें से 2-2 बूद प्रात: व रात्रि को डालते रहने से नेत्र रोग नहीं होते।
नीम के फूल, रसौंत, कपूर डली तथा नीम की गिरी, सबको 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें। इनको शुद्ध रुई की बत्ती के बीच में लपेटकर 150 ग्राम सरसों के तेल में डुबोकर जलायें। इसके ऊपर कांसे का बर्तन या मिट्टी के कच्चे दीप को थोड़ा ऊपर रखकर काजल जमा कर लें। इसमें थोड़ा गाय का घी मिलाकर गीला कर लें। इस काजल को नित्यप्रति आंखों में लगाते रहने से सभी प्रकार के नेत्र रोगों से रक्षा होती रहती है। 

Share it
Share it
Share it
Top